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आदित्य के चुनाव लड़ने के निहितार्थ

02/10/2019

डॉ. प्रभात ओझा

शिवसेना ने अपनी युवा सेना के प्रमुख आदित्य ठाकरे को अब सीधे मैदान में उतार दिया है। आदित्य ठाकरे ने इसी जुलाई में महाराष्ट्र के विभिन्न क्षेत्रों में जन आशीर्वाद यात्रा निकाली तो यह पक्का हो गया था कि ठाकरे परिवार की तीसरी पीढ़ी अब राजनीति के फ्रंट फुट पर खेलेगी। आदित्य अपने दादा और कभी मराठी स्वाभिमान के प्रतीक बन गये बाला साहब ठाकरे के समय से ही मंचों पर दिखने लगे थे। फिर भी यह घोषणा एकदम से अलग तरह की थी कि आदित्य अब विधानसभा का चुनाव भी लड़ेंगे। अलग तरह की घोषणा इसलिए भी कि यह पहला मौका होगा, जब इस परिवार का कोई सदस्य सीधे चुनावी मैदान में होगा। शिवसेना संस्थापक बाला साहब और उनके पुत्र वर्तमान प्रमुख उद्धव ठाकरे के नेतृत्व में पार्टी ने सत्ता में भागीदारी तो की, पर स्वयं चुनावी मैदान में नहीं उतरे। फिर भी तीसरी पीढ़ी के नये कदम को इतना भर समझना ठीक नहीं होगा। इसे पूरा करने के लिए वर्तमान शिवसेना प्रमुख और आदित्य के पिता उद्धव ठाकरे के बयान को भी जोड़कर देखना चाहिए। जिस दिन आदित्य ने अपने चुनाव लड़ने की घोषणा की, उसके दो दिन पहले उद्धव ठाकरे ने कहा, मैंने बाला साहब से वादा किया था कि एक दिन शिवसेना का मुख्यमंत्री बनाकर रहूंगा। सवाल है कि क्या शिवसेना अब भारतीय जनता पार्टी के मुकाबले राज्य की सबसे बड़ी कुर्सी पर दावा ठोंकने जा रही है। इस प्रश्न का जवाब बहुत जल्दबाजी में देना ठीक नहीं होगा। इसके बावजूद, यह तो तय हो चला है कि शिवसेना अब पार्टी की ताकत बढ़ाने को हरसंभव कदम उठाने जा रही है।

देशभर में जहां भी क्षेत्रीय पार्टियां हैं, करीब-करीब सभी ने अपने राज्यों में सरकारें बनायी। इनमें डीएमके, एआईएडीएमके, समाजवादी पार्टी, वाईएसआर, टीआरएस, टीएमसी, पीडीपी, नेशनल कॉन्फ्रेंस, जेडीयू, आरजेडी के नाम लिए जा सकते हैं। इसके विपरीत शिवसेना को अपने 52 साल के इतिहास में कभी कोई मौका नहीं मिला, जब अकेले उसने अपने दम पर सरकार बनायी हो। यह जरूर था कि कभी वह बीजेपी से बड़ी पार्टी हुआ करती थी। अभी 90 के दशक तक जब बाला साहब सक्रिय थे, भारतीय जनता पार्टी अपने साथी दल शिवसेना से अधिक सीटों की मांग करती थी। सिर्फ 20 साल में फर्क यह आया है कि शिवसेना अब बीजेपी से समझौता करने को मजबूर रहती है। कारण भी साफ है कि 2009 में सिर्फ 45 सीटें जीतने वाली बीजेपी पांच साल बाद 2014 में 122 सीटें हासिल कर शिवसेना से काफी आगे निकल गई। तब दोनों ने अलग-अलग चुनाव लड़ा था। बाद में सरकार बनाने के लिए शिवसेना ने बीजेपी को समर्थन दे दिया। इसके पहले लोकसभा चुनाव से लेकर ताजा लोकसभा चुनाव के बीच पांच साल में नरेंद्र मोदी की छत्रछाया में बीजेपी ने महाराष्ट्र में भी अपना विस्तार कर लिया है। यही कारण है कि इस बार विधानसभा चुनाव में शिवसेना के लिए समझौते में सीटों की संख्या के साथ उन्हें जीतने की हर जुगत पर ध्यान देना होगा।

बहरहाल, शिवसेना ने फिर से अपनी ताकत बढ़ाने के लिए हर जुगत आजमाना शुरू कर दिया है। आज पार्टी नेताओं के रणनीतिक बयान इसकी ओर इशारा करते हैं। किसी शिव सैनिक को सीएम बनवाने का उद्धव ठाकरे का बाला साहब को दिया वचन भी इसी रूप में देखा जाना चाहिए। एक और बयान भी इसी तरह का है। हाल में मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने कहा था कि सरकार में उप मुख्यमंत्री की कुर्सी खाली है। उनका इशारा शिवसेना से गठबंधन कायम रखने पर साथी दल को यह पद देने की ओर था। इस पर शिवसेना नेता संजय राउत ने ताल ठोंककर कहा कि हमने महाराष्ट्र के छावा (शेर के बच्चे) को मैदान में उतार दिया है। आदित्य ठाकरे डिप्टी सीएम नहीं, सीएम बनेंगे। ऐसे में गठबंधन के भविष्य पर सवाल लाजिमी है। वैसे, गठबंधन के बारे में अभी से किसी तरह की आशंका भी ठीक नहीं होगी। इसे आदित्य के ही एक और बयान में देखा जा सकता है। आदित्य ठाकरे ने एक आयोजन में चीफ मिनिस्टर के पद को लेकर कहा था कि मैं अपने ही बारे में बात करूंगा तो लोग मुझे पागल समझेंगे। भाग्य में जो लिखा होता है तो वह कोई और नहीं, जनता ही देती है। आदित्य के बयान के अगले वाक्य में बहुत कुछ छिपा हुआ है। उन्होंने जोड़ा था कि सीएम और उद्धव साहब मेरे लिए पद तय करेंगे। बहरहाल, अब चुनाव परिणाम पर भी बहुत कुछ निर्भर करेगा। अभी तो शिवसेना अपनी ताकत को वहां तक बढ़ाना चाहती है, जहां वह मनमाफिक पद मांग सके। हर दिन एक नया बयान भी उसी दिशा में दिया जाता है। फिलहाल तो भाजपा भारी दिखती है। बहुत कुछ राकांपा के शरद पवार और कांग्रेस गठबंधन के हाल पर भी निर्भर करेगा।

(लेखक हिन्दुस्थान समाचार की पाक्षिक पत्रिका ‘यथावत’ के समन्वय संपादक हैं।)


 
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