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यूरोपियन यूनियन के सांसदों के कश्मीर दौरे का नाहक विरोध

31/10/2019

सियाराम पांडेय 'शांत'

यूरोपियन यूनियन के सांसदों का कश्मीर जाना, वहां के हालात से अवगत होना विपक्ष को रास नहीं आया है। कांग्रेस ने 'गैरों पर रहम, अपनों पर सितम' जैसे जुमले उछालने आरंभ कर दिए हैं। विपक्षी सांसदों को कश्मीर जाने से रोकने संबंधी भारत सरकार के निर्णय पर भी तंज कसा है। उसने इसमें केंद्र सरकार का अनोखा राष्ट्रवाद देखा है। जम्मू-कश्मीर मामले के अंतरराष्ट्रीयकरण का आरोप लगाया है। असदुद्दीन ओवैसी तो इस मामले में शाब्दिक मर्यादा की लक्ष्मण रेखा ही लांघ गए। उन्होंने कश्मीर पहुंचे यूरोपियन यूनियन के सांसदों को नाजी लवर तक कह दिया।
 'अतिथि देवोभव:' की परंपरा में यकीन रखने वाले भारत के किसी नेता का यह बयान कदाचित भारतीय संस्कृति के अनुरूप नहीं है। अतिथि का सम्मान हर भारतीय का दायित्व है। रही बात कश्मीर मामले के अंतरराष्ट्रीयकरण की तो यह काम देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने संयुक्त राष्ट्रसंघ में इस मामले को ले जाकर ही कर दिया था। इसलिए जम्मू-कश्मीर मुद्दे के अंतरराष्ट्रीयकरण का आरोप लगाने का कांग्रेस को हरगिज अधिकार नहीं है। सच तो यह  है कि नेहरूजी जम्मू-कश्मीर के राजा हरी सिंह के साथ नहीं थे। वे हरी सिंह के मुखर विरोधी रहे शेख अब्दुल्ला के साथ थे। वजह चाहे जो भी रही हो। इसमें शक नहीं कि भाजपा सांसद सुब्रह्मण्यम स्वामी भी यूरोपियन यूनियन के सांसदों के जम्मू-कश्मीर आने से खुश नहीं हैं और इस पूरी कवायद को अनैतिक करार दे रहे हैं। ऐसा करनेवाले वे देश के पहले और अंतिम भाजपा नेता हैं। 
जम्मू-कश्मीर दौरे के बाद यूरोपियन यूनियन के सांसदों के दल ने भारत को न केवल शांतिप्रिय देश करार दिया है बल्कि यह भी कहा है कि भारत से कश्मीर वासियों को काफी उम्मीदें हैं। उन्होंने अपने दौरे को राजनीतिक नजर से देखने को भी अनुचित करार दिया है। उनकी नजर में अनुच्छेद 370 भारत का आंतरिक मामला है। भारत-पाकिस्तान को इस बाबत आपस में बात करनी चाहिए। ओवैसी के नाजी लवर शब्द से यूरोपियन सांसद बेहद आहत नजर आए हैं। उनका मानना है कि अगर वे नाजीवादी रहे होते तो उन्हें भारत भेजा ही क्यों जाता? उन्होंने आतंकवाद के खिलाफ जंग में भारत का साथ देने की तो बात कही है। 
कश्मीर में जिस तरह से यूरोपियन यूनियन के सांसदों ने स्थानीय नेताओं, अधिकारियों और सरपंचों से मुलाकात की। उन्होंने सैन्य अधिकारियों से पूछताछ की और जिस तरह उनके दौरे के दौरान कुलगाम में आतंकियों ने पांच बांग्लादेशी मजदूरों को मार दिया, उससे उनके मानस में जम्मू-कश्मीर को लेकर, खासकर वहां चल रही आतंकवादी हरकतों को लेकर क्या तस्वीर बनी होगी, इसका आंकलन सहज ही किया जा सकता है। प्रतिनिधिमंडल में शामिल अधिकांश सांसदों का मानना है कि उनके दौरे की अनावश्यक आलोचना कर, उन्हें नाजीवादी बताकर, उनकी छवि बिगाड़ने की कोशिश की गई है। फ्रांस के हेनरी मेलोसे की मानें तो 'अनुच्छेद 370 भारत का आंतरिक मामला है। हमारी चिंता का विषय आतंकवाद है, जो दुनियाभर में परेशानी का सबब है। इस लड़ाई में हमें भारत के साथ खड़ा होना चाहिए। ब्रिटेन के न्यूटन डांस दौरे को आंखें खोलने वाला बताते हैं। वे भारत को दुनिया का सबसे शांतिपूर्ण देश बनता देखने के हिमायती हैं। उनके मुताबिक जो कुछ भी उन्होंने धरातल पर देखा है, उस पर अपनी संसद में बात रखेंगे। यहां आने के बाद पोलैंड के सांसद रेजार्ड जारनेकी को लगता है कि अंतरराष्ट्रीय मीडिया की रिपोर्ट पक्षपातपूर्ण रही है। फ्रांस के ही एक अन्य सांसद थियेरी मारियानी ने कहा कि हमें फासीवादी कहकर हमारी छवि को खराब किया जा रहा है। बेहतर होता कि हमारी छवि खराब करने से पहले हमारे बारे में अच्छे से जान लिया गया होता। निकोलस फेस्ट ने कहा कि मुझे लगता है कि यदि आप यूरोपियन यूनियन के सांसदों को जाने देते हैं, तो आपको भारत के विपक्षी राजनेताओं को भी जाने देना चाहिए। यह असंतुलित व्यवहार है। भारत सरकार को इसका समाधान करना चाहिए।
राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल के साथ यूरोपियन यूनियन के सांसदों की मुलाकात भी मोदी विरोधियों के गले नहीं उतर पा रही है। कांग्रेस इस पूरे प्रकरण को 'कूटनीतिक त्रासदी' बता रही है। उसे लगता है कि केंद्र सरकार यूरोपियन यूनियन के सांसदों को कश्मीर में सैर-सपाटा और दखलंदाजी की इजाजत दे रही है। वह इसे त्रुटिपर्ण जनसंपर्क का प्रयास बता रही है और केंद्र सरकार पर ऐसे व्यक्तियों को प्रायोजित करने का आरोप लगा रही है जिनकी विश्वसनीयता पर सवाल है। पहले कांग्रेस को अनुच्छेद-370 देश का आंतरिक विषय नहीं लगता था लेकिन हाल के कुछ दिनों में उसने भी यह स्वीकारना आरंभ कर दिया है कि अनुच्छेद-370 भारत का आंतरिक मामला है।
 उधर, जम्मू कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती के ट्विटर अकाउंट से उनकी बेटी ने ट्वीट किया है कि यूरोपियन प्रतिनिधिमंडल जम्मू-कश्मीर के तीन पूर्व मुख्यमंत्रियों से क्यों नहीं मिल सकता? अगर यूरोपियन यूनियन के प्रतिनिधिमंडल को कश्मीर घूमने की इजाजत दी जा सकती है तो फिर इससे पहले अमेरिकी सीनेटर के प्रतिनिधिमंडल को क्यों नहीं अनुमति दी गई? मतलब जितने मुंह, उतनी बातें हो रही हैं। प्रतिनिधिमंडल को किससे मिलना चाहिए, किससे नहीं मिलना चाहिए, यह उनके विवेक का मामला है। पाकिस्तान जिस तरह दुनियाभर में जम्मू-कश्मीर में मानवाधिकारों के हनन का सवाल उठा रहा है, ऐसे में केंद्र सरकार को क्या ' मौनं स्वीकार लक्षणं' की स्थिति में आ जाना चाहिए या बाहर के देशों को संदेश देना चाहिए कि पाकिस्तान का दुष्प्रचार निराधार है? विपक्ष का यह विरोध किसी भी तरह से न्यायसंगत नहीं है। उसे आत्ममंथन करना होगा कि उसे केंद्र सरकार ने कश्मीर क्यों नहीं जाने दिया? क्या कश्मीर को लेकर उसके दिमाग में पूर्वाग्रह नहीं था? जब तक विपक्ष अपने दिमाग से पूर्वाग्रह को दूर नहीं करता, उसे हर ओर शर्मिंदगी ही नजर आएगी।  
(लेखक हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)


 
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