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आजादी की मूल भावना को समझें.

14/08/2019

(स्वतंत्रता दिवस, 15 अगस्त पर विशेष) 
 
योगेश कुमार गोयल
र वर्ष की भांति 15 अगस्त का दिन कैलेंडर की घूमती तारीख की तरह एक बार फिर सामने है। जहां सरेआम लोकतंत्र की धज्जियां उड़ाने वाले कुछ जनप्रतिनिधि हर साल स्वतंत्रता के प्रतीक तिरंगे के नीचे खड़े होकर देश की रक्षा एवं प्रगति का संकल्प लेते हैं। देश को आजाद हुए सात दशक से भी अधिक हो चुके हैं। लेकिन आजादी के इन 72 वर्षों में लोकतंत्र के पवित्र स्थल संसद एवं विधानसभाओं के हालात किस कदर बदले हैं, किसी से छिपा नहीं है। जहां अभद्रता की सीमा पार करते हमारे जनप्रतिनिधि गाली-गलौच, उठापटक से लेकर कुर्ता फाड़ की राजनीति तक उतर आते हैं। राजनीति की भाषा का स्तर दिन-ब-दिन इतना घिनौना होता जा रहा है, जिसकी बदसूरत तस्वीर पिछले सात दशकों में भी देखने को नहीं मिली थी।
हालांकि इस बार के स्वतंत्रता दिवस का जश्न मनाने से चंद दिनों पहले जिस प्रकार मोदी सरकार ने जम्मू कश्मीर को सही मायनों में आजादी दिलाई है, वह अपने आप में बेमिसाल कदम है। साथ ही जम्मू कश्मीर में आजादी की मांग के नारे लगाने वाले अलगाववादियों के गाल पर करारा तमाचा भी है। जो कश्मीर की भारत से आजादी की मांग के नाम पर कश्मीरी युवाओं को भड़काते और गुमराह करते थे। देश की सूरत और सीरत बदलने के लिए आज देश में ऐसे ही कठोर कदमों और दृढ़ संकल्पों की जरूरत है। साथ ही जरूरत है ऐसे लोगों पर नकेल कसने की, जो देश का माहौल बिगाड़ते हैं और विकास की गति को बाधित करते हैं। आतंक के खिलाफ सर्जिकल स्ट्राइक हो या जम्मू कश्मीर के मसले पर उठाया गया दिलेरी भरा कदम, कुछ राजनीतिक दलों के नेताओं को राष्ट्र की अस्मिता तथा एकता और अखण्डता से जुड़े ऐसे तमाम मसलों पर भी जब घृणित राजनीति करते देखा जाता है तो उनकी ऐसी हरकतों पर सिर शर्म से झुक जाता है। यह वही लोग हैं जो देश से गरीबी हटाओ का नारा देकर अकूत संपदा के स्वामी हो गए 
आज देश के लगभग हर राजनीतिक दल में ऐसे नेताओं की भरमार है, जिनकी भूमिका प्रायः राजनीति के नाम पर अपने स्वार्थ की रोटियां सेंकने तक ही सीमित रहती है। वर्षों की गुलामी के बाद मिली आजादी को हम किस रूप में संजोकर रख पाए हैं, सभी के सामने है। आजादी के दीवानों ने कभी सपने में भी नहीं सोचा होगा कि जिस देश को आजाद कराने हेतु वे इतनी कुर्बानियां दे रहे हैं, उसकी यह दुर्दशा होगी। नेता भ्रष्ट हो जाएंगे और आजादी की तस्वीर ऐसी होगी। अपराधों की बढ़ती सीमा को देख बुजुर्ग तो अब कहने भी लगे हैं कि गुलामी के दिन तो आज की आजादी से कहीं बेहतर थे। तब अपराधियों के मन में कानून का खौफ होता था। अब कड़े कानून बना दिए जाने के बावजूद अपराधियों के मन में किसी तरह का भय नहीं दिखता। देश के कोने-कोने से बच्चियों व महिलाओं के साथ हो रहे अपराधों के बढ़ते मामले आजादी की बड़ी शर्मनाक तस्वीर पेश कर रहे हैं। देश में महंगाई सुरसा की तरह बढ़ती जा रही है। आतंकवाद की घटनाएं पैर पसार रही हैं। आरक्षण की आग देश को जला रही है। इस तरह के हालात निश्चित तौर पर देश के विकास के मार्ग में बाधक बने हैं। अगर कभी आतंक के खिलाफ कड़े कदम उठाने की पहल होती है तो उन कदमों का सत्ता के ही गलियारों में कुछ लोगों द्वारा पुरजोर विरोध किया जाने लगता है। हर कोई सत्ता के इर्द-गिर्द राजनीतिक रोटियां सेंकता नजर आ रहा है। देशभर में कोई सत्ता बचाने में लगा है तो कोई गिराने में। ऐसे बदरंग हालातों में यह सवाल रह-रहकर सिर उठाने लगता है कि आखिर कैसी है ये आजादी?
आजादी का अर्थ क्या है? इस प्रश्न का उत्तर तब तक नहीं दिया जा सकता, जब तक कि यह न जान लिया जाए कि स्वतंत्र होना किसे कहते हैं। देश को, व्यक्ति को, समाज को, यह जान लेना अत्यंत जरूरी है कि क्या कुछ बुनियादी मानवाधिकारों से वंचित व्यक्ति, समाज या देश को स्वतंत्र कहा जा सकता है? क्या भोजन, कपड़ा व रहने की व्यवस्था, बीमारी से बचाव, भय, आतंक, शोषण व असुरक्षा से छुटकारा, साक्षर एवं शिक्षित होने के पर्याप्त अवसर मिलना और अन्य ऐसी ही कई बातें मानव के बुनियादी अधिकार नहीं हैं? क्या शोषण व उत्पीड़न से मुक्ति के संघर्ष को मानव का बुनियादी अधिकार नहीं माना जाना चाहिए? सामाजिक एवं आर्थिक आधार पर देश में कमजोर तबके का स्तर सुधारने की नीयत से लागू आरक्षण ने देश को उस चौराहे पर खड़ा कर दिया है, जहां समूचा देश रह-रहकर जातीय संघर्ष के बीच उलझता दिखाई देता है। स्वार्थपूर्ण राजनीति ने माहौल को इस कदर विकृत कर दिया है, जहां से निकल पाना संभव ही नहीं दिखता। राजस्थान हो या उत्तर प्रदेश, हरियाणा हो या गुजरात अथवा महाराष्ट्र आरक्षण के नाम पर उठते विध्वंसक आन्दोलनों की आग में समय-समय पर झुलसते रहे हैं।
आजादी के सात दशकों बाद भी भ्रष्टाचार एवं अपराधों का आलम यह है कि आम आदमी का जीना दूभर हो गया है। सरकारी दफ्तरों में बगैर लेन-देन के कोई काम कराना मुश्किल होता है। बड़े नेताओं की कौन कहे, छुटभैया नेताओं की भी चांदी हो चली है। आजादी के बाद लोकतंत्र के इस बदलते स्वरूप ने आजादी की मूल भावना को बुरी तरह तहस-नहस कर डाला है। यह आजादी का एक शर्मनाक पहलू है कि हत्या, भ्रष्टाचार, बलात्कार जैसे संगीन अपराधों का आरोप झेल रहे जनप्रतिनिधि सम्मानित जिंदगी जीते रहते हैं। देश के ये बदले हालात आजादी के कौन-से स्वरूप को उजागर कर रहे हैं? विचारणीय है। लोकतंत्र के हाशिये पर खड़ी जनता को इस दिशा में फिर से मंथन करना आवश्यक हो गया है कि वह किस तरह की आजादी की पक्षधर है? आज की आजादी, जहां तन के साथ-साथ मन भी आजाद है। सब कुछ करने के लिए, चाहे वह वतन के लिए अहितकारी ही क्यों न हो। या उस तरह की आजादी, जहां वतन के लिए अहितकारी हर कदम पर बंदिश हो। जहां स्वहित राष्ट्रहित से सर्वोपरि होकर देशप्रेम की भावना को लीलता जा रहा है, या वह आजादी, जहां राष्ट्रहित की भावना सर्वोपरि स्वरूप धारण करते हुए देश को आजाद कराने में गुमनाम लाखों शहीदों के मन में उपजे देशप्रेम का जज्बा सभी में फिर से जागृत कर सके।
आजादी के इस पावन पर्व पर सभी देशवासियों को इस तरह के परिवेश पर सच्चे मन से मंथन कर सही दिशा में संकल्प लेने की भावना जागृत करनी होगी। तभी आजादी के वास्तविक स्वरूप को परिलक्षित किया जा सकेगा। सरकार द्वारा जम्मू कश्मीर मामले में उठाए गए साहसिक कदमों की ही भांति अगर राष्ट्र की बेहतरी के लिए भविष्य में भी ऐसे ही कुछ कड़े कदम उठाए जाते हैं तो हमें उनमें मीन-मेख निकालने की बजाय खुले दिल से उनका स्वागत करना चाहिए। हमें अब आजादी की मूल भावना को समझते हुए स्वयं ही यह तय करना होगा कि हम आखिर किस प्रकार की आजादी के पक्षधर हैं?
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक हैं।)


 
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