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जांच की आंच से घबराई कांग्रेस

28/08/2019

जांच की आंच से घबराई कांग्रेस

रामबहादुर राय

कांग्रेस के नेताओं पर भ्रष्टाचार के आरोप कोई नए नहीं हैं। नया सिर्फ यह है कि अब उन्हें जांच का सामना करना पड़ रहा है। उससे गुजरना पड़ रहा है। अदालत में खड़े होकर सफाई देनी पड़ रही है।

राजीव गांधी का 75वां जन्म दिन कुछ खास हो सकता था। दिन था गुरुवार। फिर भी बुद्धिदाता वृहस्पति के आशीर्वाद से कांग्रेस वंचित रह गई। उस दिन दो बातें हुई। सोनिया गांधी ने कांग्रेस के अतीत को गलत ढंग से रखा। बेवजह शेखी बघारी। उनके कहे को अगर नई पीढ़ी मान ले तो वह गुमराह हुए वगैर नहीं रहेगी। यह नहीं कह सकते कि सोनिया गांधी ने इरादतन गुमराह करने की कोशिश की। जो कहा वह उनकी समझ का फेर भी हो सकता है। यह भी हो सकता है कि लिखे हुए भाषण को वे दोहरा रही हों, जैसा कि वे राजनीति में कदम रखने के बाद से करती रहीं हैं। इससे उनका दोष कम नहीं हो जाता।
इस पर विचार अगली पंक्तियों में करेंगे कि उन्होंने कहा क्या और जो कहा वह तथ्य के विपरीत कैसे है। कैसे कांग्रेस अध्यक्ष अनर्थ का प्रसार कर रहीं हैं, यह जानने-समझने का विषय है। दूसरी बात का संबंध पी. चिदंबरम से है। वे पूछताछ से बचने के लिए हर चाल चल रहे थे। जो उल्टी पड़ती गई। किसी मनोवैज्ञानिक से उनकी अगर जांच कराई जाए तो पता चलेगा कि वे अतीत के बोझ तले दबे हुए हैं। जितना अधिक बोझ अपने अतीत का वे ढो रहे हैं उतना ही उनका अहंकार उन्हें घायल कर रहा है। वे भूलना नहीं चाहते कि कभी गृहमंत्री थे। मनमोहन शासन के सूत्रधार थे। जो चाहते थे वह होता था।

ऐसा व्यक्ति जब जवाबदेही का सामना करता है तो उसकी प्रतिक्रिया जैसी होनी चाहिए वैसी ही पी. चिदंबरम की है। लेकिन यह तो नियम है। जो साधारण या शातिर अपराधी मनोवृति के व्यक्ति पर लागू होता है। पी. चिदंबरम को अपवाद होना चाहिए। इसलिए क्योंकि वे प्रबुद्ध राजनेता माने जाते हैं। अपने इस आचरण से उन्होंने अपनी ही दोहरी क्षति की है। जिस पी. चिदंबरम को एक-एक तथ्य तोल कर बोलने और उनके हर शब्द के चमत्कारिक प्रभाव को अनुभव करने के लिए संसद की दीर्घाओं में लोग सांस रोक लेते थे उस राजनेता ने अपनी कैसी गति बना ली है! यह अफसोस नाक है। वे वह मार्ग भी चुन सकते थे जिसका उन्होंने सीबीआई कोर्ट में दावा किया। कहा कि सीबीआई ने सिर्फ एक बार बुलाया। वे गए। जांच में सहयोग दिया।
उनका यह दावा एक मजाक बनकर रह गया। किसी को भी यकीन नहीं आया। यकीन करने का कोई कारण भी नहीं था। वे चाहते तो यकीन करने के लिए पर्याप्त आधार प्रस्तुत करते। ऐसा करने के लिए उनको अपना अहंकार त्यागना पड़ता। इससे तब उनकी गरिमा बची रहती। उन्हें मीडिया का उपदेश, आरोप और ताने नहीं सुनने पड़ते। मीडिया माध्यम है। लोग जो सोचते हैं वही मीडिया प्रस्तुत करने की कोशिश करती है। पी. चिदंबरम पर मीडिया न मेहरबान थी न हमलावर। वस्तुपरक थी। पी. चिदंबरम को चाहिए था कि वे आरोपों से घिरे हैं इसलिए सहज रीति से खुद को जांच के लिए सौंप दें। सीबीआई पर जो भी दाग लगे हों, पर यह तो सभी मानते हैं कि उसकी जांच प्रक्रिया मानवीय होती है। जिसकी वह छानबीन कर रही होती है उससे उसके सम्मान का ख्याल कर सवाल पूछती है। उसकी मिजाजपुर्शी में कोई कमी नहीं रखती। वह पुलिसिया डंडे नहीं बरसाती।

नरेंद्र मोदी की सरकार आजादी के बाद पहली सरकार है जो भ्रष्टाचार से लड़ने का दिखावा नहीं कर रही है वास्तव में भ्रष्टाचार के खात्मे के लिए कमर कसे हुए है।

सामंती जमाने के कोड़े नहीं फटकारती। वह तो फुसलाती है। अपने मेहमान को पुचकारती रहती है। आश्चर्य इसी बात पर है कि पी. चिदंबरम ने जो किया, जिसे उनका नाटक या महानाटक कहा जा रहा है, वह क्यों किया? इस प्रश्न में ही उत्तर भी छिपा हुआ है। वह यह कि वे अपना अपराध जानते हैं। निरपराध होते तो उनका व्यवहार दूसरा होता। यहीं पर यह समझने की जरूरत है कि सोनिया गांधी और पी. चिदंबरम क्यों अपनी बोली और व्यवहार में एक ही तरह से प्रतिक्रिया दे रहे थे। सोनिया गांधी स्टेडियम में बोल रही थीं तो पी. चिदंबरम अदालत में। ये दोनों भूल गए कि जनता ही सबसे बड़ी अदालत है। उसमें वे एक आरोपी हैं। किसी आरोपी का क्या दायित्व है? यही कि वह कानून और उससे बनी पद्धतियों का पूरा पालन करे। छोटे हों या बड़े अपराधी किस्म के लोग जैसा कुतर्क और चालें बचने के लिए चलते हैं वैसा ही कांग्रेस के नेताओं का इस समय रवैया है।

यह उनकी बौखलाहट है। गहरे पैठ गए भय की यह उपज है। निर्भय जो होगा वह जांच से क्यों डरेगा! पहले सोनिया गांधी की गलत बयानी पर नजर दौड़ाते हैं। राजीव गांधी के जन्म दिन पर उन्होंने कहा कि 1984 में कांग्रेस को भारी बहुमत मिला था। जिसका उपयोग उन्होंने विरोधियों को डराने के लिए नहीं किया। संस्थाओं की स्वायतता को उन्होंने नष्ट नहीं किया। साधारण दिनों में भी यह कथन उसे अटपटा लगेगा जो उस समय की राजनीति के तथ्यों से अवगत है। यह सच है कि 1984 में राजीव गांधी को रिकॉर्ड बहुमत मिला था। वैसा कभी जवाहरलाल नेहरू को भी नहीं मिला। लेकिन सोनिया गांधी यह बताना भूल गईं कि वह राजीव गांधी के व्यक्तित्व का चमत्कार नहीं था। इंदिरा गांधी की हत्या से उपजी सहानुभूति का वह चुनावी सुनामी थी। ऐसा चमत्कारिक था कि विपक्ष के दिग्गजों का भी सफाया हो गया। यह बात अलग है कि बाद में लोगों को उनके हारने पर अफसोस था।
उस विराट विजय को राजीव गांधी ने संभालकर नहीं रखा। जो उन्हें जानते हैं वे इसे बखूबी समझते हैं कि वे राजनीति के लिए बने ही नहीं थे। वंशवादी राजनीति के तकाजे को पूरा करने के लिए उन्हें वह कांटों का ताज पहनना पड़ा। थोड़े ही दिनों बाद उनकी अनुभवहीनता का उन लोगों ने फायदा उठाया जो भ्रष्टाचार के सौदागर थे। इसी से राजीव गांधी बोफोर्स कांड में आरोपों के तले आ गए। वे भ्रष्ट थे, इस पर यकीन नहीं होता। लेकिन यकीनन उनके सगे उनकी जानकारी में लूटपाट मचाते रहे। जिसे नरेंद्र मोदी देश को लूटना बताते हैं। जो सच भी है। सोनिया गांधी ने जिसे राजीव गांधी का बड़ा त्याग बताया है वह सरासर नासमझी का बयान है। 1989 के चुनाव में कांग्रेस नि:संदेह सबसे बड़ा दल था। लेकिन वह सरकार बनाने में समर्थ इसलिए नहीं हो सकता था क्योंकि चुनाव से पहले ही एक गठबंधन बन गया था। जिसके नेता विश्वनाथ प्रताप सिंह थे।
सोनिया गांधी यह कैसे बतातीं कि राजीव गांधी ने बोफोर्स जांच से बचने के लिए उस गठबंधन की सरकार को अपनी कुटिल चालों से तोड़ा। अपने वादे को भी तोड़ा। जो सरकार उन्होंने बनवाई उसे उन्होंने तेरह महीने चलाने का वचन जो मीडिया के सामने देश को दिया था उसे भी तोड़ा। कौन नहीं जानता कि विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार चलती रहती तो राजीव गांधी और क्वात्रोची को वैसी जांच का सामना अंतत: करना पड़ता जैसी जांच में पी. चिदंबरम पड़ गए हैं। न्याय का जिसने गला घोटा उसे सोनिया गांधी त्याग बता रही हैं। उनकी समझ को मुबारक। कांग्रेस के नेताओं पर भ्रष्टाचार के आरोप कोई नए नहीं हैं। नया सिर्फ यह है कि उन्हें जांच का सामना करना पड़ रहा है। उससे गुजरना पड़ रहा है। अदालत में खड़े होकर सफाई देनी पड़ रही है। ऐसा क्यों है? इसे सोनिया गांधी और पी. चिदंबरम जानते हैं। जो जानते हैं वह वे बोल नहीं सकते। अपने गले में फांस क्यों लगाए! वे बोलें भले ही नहीं, लेकिन हकीकत का उन्हें सही पता है। सिर्फ अंदाज नहीं है, पूरा पता है।
नरेंद्र मोदी की सरकार आजादी के बाद पहली सरकार है जो भ्रष्टाचार से लड़ने का दिखावा नहीं कर रही है वास्तव में भ्रष्टाचार के खात्मे के लिए कमर कसे हुए है। जांच एजेंसियां पहले भी थी। उनकी साख पर उस सयम कोई बट्टा नहीं था। वे दूध का दूध और पानी का पानी कर पाने के लिए जगत विख्यात थीं। लेकिन उन्हीं जांच एजेंसियों से जब भ्रष्टाचार के गुनाह पर पर्दा डलवाया जाने लगा तो जो गिरावट आ गई थी वह किसी को आश्चर्यचकित नहीं करती थी। जो भी इसे देखता था वह सत्ताधारी राजनीतिक नेतृत्व को कोसता था। इस समय कांग्रेस का नेतृत्व दया का पात्र है। वह दयनीय हो गया है। इसे ही समझ लेने से कांग्रेस की बौखलाहट का राज खुल जाता है। भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों से घिरने पर कांग्रेस को हर बार राजनीतिक अस्थिरता का फायदा मिल जाता था। इसके दो उदाहरण हर किसी को याद होगा ही। पहला इंदिरा गांधी का है।

राजीव गांधी की 75वीं जयंती पर सोनिया ने जो कुछ भी कहा वह यथार्थ से परे है। सच तो यह है कि उन्होंने बेवजह शेखी बघारते हुए कांग्रेस के अतीत को गलत ढंग से रखा।

जब आपातकाल के काले कारनामो और तानाशाही मिजाज से किए गए अपने जुल्मों के लिए इंदिरा गांधी जांच के घेरे में आर्इं तो उन्होंने उससे असहयोग किया। शाह आयोग बुलाता रहा वे नहीं गर्इं। उनका रवैया केवल असहयोग का नहीं था बल्कि राजनीतिक उद्दंडता भी उन्होंने दिखाई। जो उनके बेटे संजय गांधी की व्यूह रचना से बनी थी। वही समय है जब भारत की राजनीति में अपराध और अपराधी पुरष्कृत हुए। वे संसद भी पहुंचे। इंदिरा गांधी ने जनता पार्टी की सरकार को तोड़ा। उससे वे दोहरे फायदे में रहीं। सत्ता में आर्इं और अपराधों के आरोपों से बच गर्इं। राजीव गांधी ने वही तरकीब अपनाई। वे आधे रास्ते तक सफल रहे। जांच से बच गए। लेकिन सत्ता में नहीं लौट पाए। जिन्हें सत्ता मिली उस पीवी नरसिम्हा राव ने बोफोर्स सौदे का सबसे बड़ा जो दलाल था उसे देश से भागने दिया। वह सोनिया गांधी का पारिवारिक मित्र था। राजीव गांधी के राज में उस क्वात्रोची की सत्ता में तूती बोलती थी।
देश का मिजाज बदल गया है। समाज चाहता है कि भ्रष्टाचार पर रोक लगे। नरेंद्र मोदी को दूसरी बार जनादेश इस कारण भी मिला है कि वे भ्रष्टाचारियों को सजा दिलाएंगे। 2019 के चुनाव से पहले उन्होंने यह कहा भी था कि इन पांच सालों में भ्रष्ट नेताओं को मैंने जेल के दरवाजे पर पहुंचा दिया है। स्वाभाविक है कि दूसरी बार सत्ता में बड़े बहुमत से आने के बाद मोदी सरकार अपने वादे को निभाए। पी. चिदंबरम ने लोकसभा चुनावों के दौरान फेंक न्यूज के सहारे उम्मीद की थी कि नरेंद्र मोदी अगर प्रधानमंत्री बनेंगे भी तो उनकी सरकार खिचड़ी होगी। वह पतली होगी।
जिसमें उनकी दाल गल जाएगी। हुआ उल्टा। कांग्रेस इस यथार्थ को पचा नहीं पा रही है। जयराम रमेश चाहते हैं कि कांग्रेस नरेंद्र मोदी के अच्छे कामों को पहचाने। जिस कांग्रेस ने अपना होश-हवाश खो दिया हो वह ऐसी नेक सलाह भी कैसे सुन सकेगी! आचरण तो दूर रहा। इसी अर्थ में कांग्रेस नेतृत्व ने प्राप्त अवसर को गंवा दिया है।


 
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