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राजनीति में धर्म-साधना

01/07/2019

भारी जीत के साथ आंध्रप्रदेश की सत्ता संभालने के पहले से ही जगनमोहन रेड्डी सबको साधने में लगे हैं। भारी जीत के बाद मंदिरों-मजारों पर शीश नवाने का मामला हो या शपथ के बाद सर्वधर्म प्रार्थना का आयोजन, जगन अपनी व्यक्तिगत धार्मिक पहचान से इतर एक सर्वधर्म समभाव वाले शासक की छवि गढ़ते नजर आ रहे हैं। मंत्रिमंडल में सर्व समाज की भागीदारी सुनिश्चित करने हेतु एकसाथ पांच डिप्टी सीएम की बहाली को भी इसी सामाजिक संतुलन को साधने की कड़ी का विस्तार माना जा रहा है। जगन ने बेहद अप्रत्याशित और ऐतिहासिक कदम बढ़ाते हुए एक साथ पांच उप-मुख्यमंत्री के पद सृजित किए। उन्होंने एससी, एसटी, बैकवर्ड, अल्पसंख्यक और कापू बिरादरी से पांच उपमुख्यमंत्री बना दिये। इसके पहले आंध्र में चन्द्रबाबू नायडू ने दो डिप्टी सीएम रखे थे, जिनमें एक कापू और दूसरे पिछड़ी जाति के थे।

ईसाई मतावलंबी वाईएसआर ने अपने शासन काल में सरकारी सहायता से येरुशलम की यात्रा शुरू करायी थी। अपने पिता के विपरीत जगन मोहन रेड्डी ने चुनाव जीतने के तुरंत बाद भगवान बालाजी का दर्शन किया, फिर कडप्पा के ऐतिहासिक मजार पर चादर चढ़ाई। वहां के प्रसिद्ध चर्च में जाकर प्रार्थना भी की।

जगन ने जिस कापू समुदाय से एक डिप्टी सीएम बनाया है, उसकी गिनती अगड़ी जाति में होती है। आंध्रप्रदेश में इस जाति की आबादी सर्वाधिक (25-27 फीसदी) है। पूर्ववर्ती टीडीपी के शासन काल में कापू आंदोलन काफी चर्चित हुआ था। शिक्षा और रोजगार में आरक्षण की मांग को लेकर कापुओं के हिंसक आंदोलन ने तब की नायडू सरकार की नींद हराम कर दी थी। आंदोलन के दबाव और वोट के चक्कर में नायडू ने कापू आरक्षण के प्रस्ताव को केन्द्रीय स्वीकृति दिलाने की बात चुनाव अभियान में जोर शोर से उठायी। लेकिन जगन मोहन ने आरक्षण की बात को बेमानी करार देते हुए साफ तौर पर मना कर दिया था। हां जगन ने कापू कारपोरेशन के बजट को पांच हजार करोड़ से बढ़ाकर 10 हजार करोड़ करने की घोषणा जरूर की है। जगन अविभाजित आंध्रप्रदेश के दो बार मुख्यमंत्री रहे दिवंगत वाईएस राजशेखर रेड्डी के बेटे हैं। बी.कॉम पास जगनमोहन की शादी भारती रेड्डी से हुई है। उनकी दो बेटियां हैं।

जगन की एकलौती बहन वाईएस शर्मिला हैं, जिन्होंने जगन के जेल जाने के बाद सूबे में सघन पदयात्रा की और अपने भाई के लिए जनआशीर्वाद मांगा। शर्मिला ने अनिल कुमार नामक एक शादीशुदा ब्राह्मण युवक से प्रेमविवाह किया है। कहते हैं कि शादी के बाद वाईएसआर ने दबाव डालकर अनिल कुमार को ईसाई धर्म अपनाने के लिए मजबूर किया। आज की तारीख में अनिल को लोग ब्रदर अनिल कुमार के नाम से जानते हैं और वे ईसाई धर्म के चर्चित प्रचारक हैं। वाईएसआर के मुख्यमंत्री रहते सिकंदराबाद में उन्होंने एक बड़ा जलसा आयोजित किया था, जिसकी चर्चा पूरे ईसाई जगत में हुई थी। जगन की मां विजय लक्ष्मी भी ईसाई मत में दीक्षित हैं। कहते हैं विजय लक्ष्मी हर समय बाइबिल अपने साथ ही रखती हैं। इस परिवार के बारे में कहा जाता है कि जगनमोहन के परदादा सबसे पहले बर्मा (म्यांमार) में रहने के दौरान किसी ईसाई पादरी के संपर्क में आए थे। तब से ही रेड्डी परिवार ईसाईयत के प्रभाव में रहा है। लेकिन अधिकांश लोग जगन के दादा और वाईएसआर के पिता राजा रेड्डी द्वारा पहले पहल ईसाई धर्म अपनाने की बात कहते हैं। राजा रेड्डी की गिनती रायलसीमा के इलाके में दबंग और बाहुबली की थी।

केंद्र से मधुर रिश्ते की कोशिश

सत्ता मिलने से पहले ही जगन मोहन ने पड़ोसी राज्य तेलंगाना के मुख्यमंत्री और चंद्रबाबू नायडू के धुर विरोधी के. चन्द्रशेखर राव से अपने रिश्ते मधुर बना लिये हैं। अब वे केन्द्र की मोदी सरकार को भी साधने की जुगत में जुटे हैं। चुनावी विजय के तुरंत बाद दिल्ली दरबार में हाजिरी हो या प्रधानमंत्री मोदी के तिरुपति दौरे के दौरान पूरे समय साथ रहने की औपचारिकता, जगन हर समय मोदी के साथ छाये की तरह नजर आए। 9 जून को तिरुपति एयरपोर्ट पर स्वागत के दौरान दो बार मोदी के पैर छूने की कोशिश करते जगन की तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल हो चुकी हैं। जगन जानते हैं कि ढाई लाख करोड़ के कर्ज में चल रही आंध्रप्रदेश सरकार की माली हालत केवल और केवल केन्द्र सरकार ही सुधार सकती है। राज्य को ‘स्पेशल स्टेटस’ का दर्जा दिलाने की मांग से इतर जगनमोहन विशेष राहत पैकेज की गुहार लगाते ज्यादा नजर आ रहे हैं।

वे गैंगवार में ही मारे गये थे। आरंभिक दिनों में वाईएसआर की छवि भी दबंग की रही थी। वाईएसआर पर सीएम रहते ईसाई धर्म को संरक्षण देने और प्रचार- प्रसार में सहयोग करने के आरोप लगते रहे। उन्होंने अपने शासन काल में सरकारी सहायता से येरुशलम की यात्रा शुरू करायी थी, जिसकी काफी आलोचना हुई थी। माना जा रहा है कि भारी बहुमत से सत्ता में आए जगन अपने पिता से इतर अपनी नयी लकीर खींचना चाहते हैं। पिता की राजनीतिक विरासत भले इनको नहीं मिली लेकिन राजनीतिक स्टाईल वही रखा। ठीक पिता की तरह लोगों से आत्मीयता पूर्वक मिलते हैं। जनकल्याण की योजनाओं पर जोर देते हैं और चुनाव से पहले पदयात्राएं कर जनता से सीधा संवाद करते हैं। ठीक वैसे ही जैसा वाईएसआर ने 2004 में कर आंध्र की सत्ता पर कब्जा जमाया था। लेकिन धार्मिक मामले में जगन पिता से विपरीत एक नयी राह बनाते दिख रहे हैं। वे चुनाव जीतने के तुरंत बाद भगवान बालाजी का दर्शन करने तिरुपति गये। फिर कडप्पा के ऐतिहासिक मजार पर चादर चढ़ाई। वहां के प्रसिद्ध चर्च में जाकर प्रार्थना भी की।

शपथ ग्रहण के बाद मंच पर ईसाई, इस्लामी और हिन्दू पंडितों से जगन ने मां सहित आशीर्वाद लिया। जगन को लगता है कि भारी जनादेश का सम्मान तभी होगा, जब वे किसी खास मजहब के दायरे से अपने को निकाल कर सर्वग्राही बनेंगे। साल 2009 में एक हवाई दुर्घटना में वाईएसआर की मौत के बाद जगन ने पिता का राजनीतिक वारिस बनने की कोशिश की, लेकिन तब उनको सफलता नहीं मिली। जगन तब कडप्पा से रिकॉर्ड मतों से जीतकर लोकसभा पहुंचे थे। तब की यूपीए सरकार ने सीएम बनने की उनकी हसरतों पर पानी फेर दिया, जबकि 177 में 170 विधायक जगन के पक्ष में थे। राज्य के वित्तमंत्री रहे के. रोसैय्या को आंध्र का मुख्यमंत्री बनाकर जगन को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया था। बाद में वाईएसआर के निकट सहयोगी रहे किरण कुमार रेड्डी को मुख्यमंत्री बनाकर कांग्रेस ने पार्टी में टूट को रोकने और जगन की धार को कुंद करने की भरसक कोशिश की।

जगन उस अपमान का बदला अबतक नहीं भूल पाए हैं और सीधे तौर पर सोनिया गांधी को इसके लिए जिम्मेदार मानते हैं। जगन ने साल 2011 में वाईएसआर कांग्रेस का गठन किया और अपने बूते राजनीतिक संघर्ष शुरू किया। उस समय केवल 18 विधायकों ने कांग्रेस छोड़कर वाईएसआर कांग्रेस का दामन थामा था। नतीजतन साल 2012 में इन सीटों पर उपचुनाव हुए। जगनमोहन की पार्टी ने 18 में से 15 सीटों पर जीत दर्ज कर सबको चौंका दिया। 2014 के विधानसभा चुनाव में वे नायडू से हार गये। लेकिन हिम्मत नहीं हारी। जगन मोहन की राजनीतिक यात्रा सहज नहीं रही। उनका पिछले दस साल बेहद संघर्षपूर्ण रहे। इस दौरान आय से अधिक संपत्ति के मामले में उनको जेल जाना पड़ा और हजारों करोड़ की संपत्ति जब्त हुई। यूपीए की तत्कालीन सरकार जगन के पीछे पड़ी रही। वे भी लगातार केन्द्र की कांग्रेस और आंध्र की चंद्रबाबू नायडू सरकार से लोहा लेते रहे।

जमानत पर बाहर आने के बाद पिता की स्टाईल में जगन मोहन ने आंध्रप्रदेश में 341 दिन की पदयात्रा की जो वाईएसआर कांग्रेस की जड़ जमाने में बेहद अहम साबित हुई। 6 नवंबर 2017 को कडप्पा जिले के इंदुपुलपाया से शुरू हुई पदयात्रा के क्रम में जगन ने 3 648 किलोमीटर दूरी मापी और 134 विधानसभा क्षेत्रों का दौरा किया। बताते हैं कि इस दौरान जगन ने करीब दो करोड़ लोगों से संवाद स्थापित किया। उनकी इस यात्रा का लाभ यह हुआ कि आंध्र के लोगों ने अपनी उम्मीदों और आशाओं को जगन से जोड़ लिया। जगन की प्रजा संकल्प यात्रा 9 जनवरी 2019 को पूरी हुई। नतीजा सामने है, जब अप्रैल महीने में विधानसभा चुनाव हुआ तो जनता जनार्दन ने जगन के माथे पर विजय का ताज पहना दिया और सीएम की कुर्सी सौंप दी।


 
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