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दुनिया की नदियों में एंटीबायोटिक प्रदूषण

30/05/2019

प्रमोद भार्गव

ह हैरान कर देने वाली खबर है कि दुनिया की नदियां एंटीबायोटिक दवाओं के अपशिष्ट से खतरनाक स्तर तक प्रदूषित होने लग गई हैं। इन नदियों में लंदन की टेम्स से लेकर भारत की गंगा, यमुना, ब्रह्मपुत्र और महानदी शामिल हैं। इस सर्वेक्षण में वे नदियां शामिल की गई हैं, जिनकी लंबाई 1000 किलोमीटर से ज्यादा है। ब्रिटेन के यार्क विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने छह महाद्वीपों के 72 देशों की नदियों पर पहुंचकर यह सर्वेक्षण किया है। सर्वे के मुताबिक कई नदियों में एंटीबायोटिक्स की मात्रा सुरक्षित स्तर से 300 गुना से भी अधिक हो गई है। यह प्रदूषण भविष्य में बैक्टीरिया जीवन रक्षक दवाओं को बेअसर कर सकते हैं। खतरे की इस घंटी ने आशंका जताई है कि 2050 तक एक करोड़ लोगों की इस प्रदूषण से मौत हो सकती है।
हालांकि भारत के लिए यह कोई नई बात नहीं है, क्योंकि हमारी जीवनदायी नदी गंगा पर महाजीवाणु यानी 'सुपरबग' ने वर्चस्व कायम करके मानव समुदायों पर आतंक का कहर बढ़ाना एक दशक पहले से ही शुरू कर दिया है। जीएम फसलों के अपशिष्ट भी इस प्रदूषण को बढ़ाने का काम कर रहे हैं। यह स्थिति इसलिए भी बनी है, क्योंकि दुनिया कि 37 प्रतिशत नदियों की धारा रोककर करीब 28 लाख बांध बना दिए गए हैं। ब्रिटेन के एक्सेटर विश्वविद्यालय के प्रोफेसर विलियम गेंज ने बताया है कि मानव शरीर में मिलने वाले कई एंटीबायोटिक दवाओं को बेअसर करने वाले बैक्टीरिया इन्हीं पर्यावरणीय बैक्टीरिया से पैदा हुए हैं। इन बैक्टीरिया का पैदा होना खतरनाक है, क्योंकि ये भविष्य में रोग-प्रतिरोधक दवाओं के प्रति रेजिस्टेंट (विरोधी) क्षमता पैदा कर लेंगे। नतीजतन दवाएं प्रभावी नहीं रह जाएंगी और मामूली बीमारियों से पैदा हो जाने वाले संक्रमण से भी लोगों की मौतें होने लग जाएगी।
संयुक्त राष्ट्र संघ की हालिया रिपोर्ट में भी एंटीबायोटिक प्रतिरोधी जीवाणु में वृद्धि को वैश्विक स्वास्थ्य आपातकाल बताया गया है। जिसके चलते 2050 तक 1 करोड़ मौतें हो सकती हैं। नदियों में ये दवाएं मानव और पशु मल के जरिए पहुंच रही हैं। यह शोध नदियों के 711 स्थलों पर किया गया है।
रिपोर्ट में बताया गया है कि 65 प्रतिशत नदियों में एंटिबायोटिक प्रदूषण की मात्रा खतरनाक स्तर पर पहुंच गई है। भारत की नदियों की स्थिति बहुत पहले से ही प्रदूषण के मामले में चिंताजनक है। देश की जीवन-रेखा मानी जाने वाली गंगा में तो एंटीबायोटिकरोधी जीन 'सुपरबग' कई बीमारियों के जन्म का कारक बन रहा है। यह एक प्रकार का जीवाणु अर्थात बैक्टीरिया है। सुपरबग ने गंगा किनारे बसे शहरों और कस्बों को अपनी चपेट में ले लिया है। पवित्र गंगा में पुण्य लाभ के लिए जब तीर्थयात्री जलधार में डुबकी लगाते हैं, तब सुपरबग सीधे मनुष्य के फेफड़ों पर हमला बोलकर श्वसनतंत्र को कमजोर बनाने लगता है। यह महाजीवाणु इसलिए ज्यादा खतरनाक है, क्योंकि यह दो जीन के संयोग से बना है। हालांकि एंटीबायोटिक के खिलाफ प्रतिरोधी क्षमता विकसित कर लेने वाले सुपरबग के अस्तित्व को लेकर भ्रम की स्थिति है। लेकिन हाल ही में ब्रिटेन के न्यू कैसल विश्वविद्यालय और दिल्ली आईआईटी के वैज्ञानिकों ने गंगा जल पर जो शोध किए हैं, उनमें दिए ब्यौरे गंगा में सुपरबग की उपस्थिति का विश्वसनीय दावा करने वाले हैं। गंगा को कचरे के नाले में बदलने वाले उपाय आखिर इसे कब तक निर्मल बनाए रख पाएंगे? गंगा के निर्मलीकरण की महत्वाकांक्षी योजनाएं अब तक थोथी साबित हुई हैं। लिहाजा गंगा-यमुना के प्रदूषण से जुड़ी खबरें अब झकझोरती नहीं हैं। अब तक यह माना जाता था कि गंगा मैदानी इलाकों में कहीं ज्यादा प्रदूषित है। किंतु गंगा कानपुर, इलाहाबाद, वाराणसी जैसे नगरों से कहीं ज्यादा ऋषिकेश और हरिद्वार में दूषित हो चुकी है। मसलन गंगा इसके उद्गम स्थल गोमुख (गंगोत्री) से लेकर समापन स्थल गंगासागर तक सभी जगह मैली हो चुकी है। यही मैल महाजीवाणु की उत्पत्ति और उसकी वंशवृद्धि के लिए सुविधाजनक आवास सिद्ध हो रहा है। वैज्ञानिकों ने इसे ताजा उत्पत्ति माना है। 
दिल्ली में यमुना के पानी में इसकी मौजूदगी पाए जाने से इसका नाम नई दिल्ली मेटालाबीटा लैक्टोमस-1 (एनडीएम-1) रखा है। यह भी माना गया है कि एंटीबायोटिक के अत्यधिक उपयोग से यह पैदा हुआ है। गंगा में मिले सुपरबग की अलग पहचान बनाए रखने की दृष्टि से इसे बीएलएएनडीएम-1 का नाम दिया गया है। वैज्ञानिकों का मानना है कि यह भविष्य में कायांतरण करके अन्य कोई नए अवतार में भी सामने आ सकता है। इस पर नियंत्रण का एक ही तरीका है कि गंगा में गंदे नालों के बहने, सीवर का मल-मूत्र जाने और कचरा डालने पर सख्ती से रोक लगाई जाए।
अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिकों ने भारत को सुपरबग की हकीकत सामने आने पर चेताया था कि प्रतिरोधात्मक क्षमता का असर कम करने वाला जीन जरूर भारत में पहले से मौजूद रहे हों, लेकिन जो जीवाणु दो जीन के मेल से बना है, वह पहली मर्तबा ही देखने में आया है। हालांकि इस जानकारी के आने से पहले भारत में सुपरबग की खोज हो चुकी थी। मुंबई के पीडी हिंदुजा नेशनल चिकित्सालय और चिकित्सा शोध केंद्र के शोधार्थी पायल देशपांडे, कैमिला रोडिग्स, अंजलि शेट्टी, फरहद कपाड़िया, असित हेगड़े और राजीव सोमण ने मार्च 2010 में 'एसोसिएशन ऑफ फिजीशियन ऑफ इंडिया' के जर्नल में सुपरबग के वजूद का विस्तृत ब्यौरा पेश किया था। यह अध्ययन 24 मरीजों पर किए शोध का निष्कर्ष था। जिसमें बताया गया था कि एनडीएम-1 ऐसा महाजीवाणु है, जो अंधाधुंध एंटीबायोटिक के इस्तेमाल के कारण सूक्ष्म जीवों में जबरदस्त प्रतिरोधात्मक क्षमता विकसित कर रहा है।
शोध-पत्र में दावा किया गया था कि कार्बोपीनिम दवा से मुठभेड़ करने में सक्षम इस सुपरबग का बहुत छोटे समय में विकसित हो जाना आश्चर्यजनक है। कार्बोपीनिम एक एंटीबायोटिक है, जो मल्टी ड्रग प्रतिरोधी दवाओं के संक्रमण के इलाज में प्रयोग की जाती है। हालांकि सुपरबग का भारत या गंगा नदी में पाया जाना कोई अपवाद नहीं है। ये सूक्ष्म जीव दुनिया में कहीं भी मिल सकते हैं। किसी नगर, देश या क्षेत्र विशेष में ही इनके पनपने के कोई तार्किक प्रमाण नहीं हैं। लेकिन गंगा में इन सूक्ष्म जीवों का पाया जाना इसलिए हैरत में डालने वाली घटना है, क्योंकि गंगा दुनिया की नदियों में सबसे शुद्धतम जल वाली नदी है। करोड़ों लोग गंगा जल का सेवन करके अपने जीवन को धन्य मानते हैं। गोमुख से गंगासागर तक गंगा पांच राज्यों से होकर बहती है। इसके किनारे 10 लाख से ज्यादा आबादी वाले 29 शहर बसे हैं। 23 नगर ऐसे हैं, जिनकी आबादी 50 हजार से एक लाख के बीच है। कानपुर के आसपास मौजूद 350 चमड़ा कारखाने हैं, जो इसे सबसे ज्यादा दूषित करते हैं। 20 प्रतिशत औद्योगिक नाले और 80 प्रतिशत मल विर्सजन से जुड़े परनालों के मुंह इसी गंगा में खुले हैं। मसलन आठ करोड़ लीटर मल-मूत्र और कचरा रोजाना गंगा में बहाया जा रहा है। यही कारण है कि गंगा का जीवनदायी जल, जीवन के लिए खतरा बन रहा है। इसीलिए गंगा की गिनती आज दुनिया की सबसे प्रदूषित नदियों में हो रही है। यही वजह है कि गंगा जल परीक्षण के नमूने किसी भी नगर से लिए जाएं, उनके नतीजे भयावह ही आ रहे हैं।
1985 में राजीव गांधी की सरकार ने 2526 किमी लंबी गंगा को स्वच्छ बनाने की ऐतिहासिक पहल की थी। यह कार्यक्रम दो चरणों में चला। लेकिन इन 27 साल में भी सार्थक परिणाम नहीं निकले। 2009 में संप्रग सरकार ने प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाले राष्ट्रीय गंगा नदी घाटी प्राधिकरण का भी गठन किया। इसकी पहली बैठक में गंगा को अगले 10 सालों में अधिकतम स्वच्छ बनाने का संकल्प लिया गया। नए सिरे से 15 हजार करोड़ रुपये खर्च करने की योजना को मंजूरी दी गई। पांच साल पहले जब नरेंद्र मोदी ने पहली बार प्रधानमंत्री का दायित्व संभाला, तब उन्होंने बड़े जोर-शोर से गंगा के शुद्धिकरण के लिए 'नमामि गंगे' अभियान चलाया। इस पर अब तक 20,000 करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं, लेकिन इस अनुपात में भौतिक सुधार जमीन पर दिखाई नहीं देता है। देश की अनेक नदियां भी वेंटिलेटर पर रहते हुए प्रदूषण का चरम भोग रही हैं। इनमें यमुना, चंबल, सिंध, नर्मदा, गोदावरी, ताप्ती, महानदी और बनास जैसी नदियां शामिल हैं। औद्योगिक विकास व भवन निर्माण भी इन नदियों पर संकट बढ़ा रहा है। नतीजतन नदियों की निर्मल अविरलता खत्म हो गई है। 
(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।) 


 
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