युगवार्ता

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भाजपा के कांगड़ा किले में दरार

01/08/2019

भाजपा के कांगड़ा किले में दरार

 मुरारी शर्मा

संगठन और नेताओं के बीच तकरार होना कोई नई बात नहीं है। जब पार्टी सत्ता में होती है, तो अपने-अपने वर्चस्व को बनाए रखने के लिए संघर्ष होते रहते हैं। फिलहाल प्रदेश की सियासत के केंद्र कांगड़ा में यही देखा जा रहा है।

कांगड़ा हिमाचल प्रदेश का सबसे बड़ा जिला है। प्रदेश की सियासत में कांगड़ा का अहम रोल रहा है। भाजपा के लिए सत्ता का रास्ता कांगड़ा से वाया मंडी होकर शिमला जाता है। हिमाचल में जब-जब भाजपा सत्तासीन हुई है, इसमें कांगड़ा की भूमिका अहम रही है। प्रदेश में कांग्रेस के वर्चस्व को चुनौती देकर गैर कांग्रेस सरकार की बुनियाद कांगड़ा के दिग्गज नेता शांता कुमार ने 1977 और 1990 में जनता पार्टी और भाजपा की सरकार लाकर रखी है। वर्तमान भाजपा सरकार के गठन में भी कांगड़ा और मंडी का महत्वपूर्ण योगदान है।
भारतीय जनता पार्टी जब-जब कांगड़ा में मजबूत हुई है, प्रदेश की सत्ता में उसकी वापसी हुई है। कांगड़ा और मंडी दो ऐसे जिले हैं, जहां से भाजपा व कांग्रेस सियासी शक्तियां बटोरकर सत्ता के सिहांसन पर काबिज होती रही है। मगर वर्तमान में भाजपा के मजबूत कांगड़ा किले में दरार पड़ गई है। इसके चलते सत्ता और संगठन के बीच तालमेल की कमी नजर आ रही है। वहीं कांगड़ा के दिग्गज नेताओं और संगठन के बीच धड़ेबंदी इतनी बढ़ गई है कि इंदू गोस्वामी जैसी कदावर नेत्री को प्रदेश महिला मोर्चा अध्यक्ष पद से इस्तीफा देना पड़ा। वहीं 1998 में भाजपा-हिविंका गठबंधन सरकार के समय से चर्चा में रहे रमेश ध्वाला को भी अपने वजूद की लड़ाई लड़नी पड़ रही है। दोनों ही नेता सरकार और संगठन के बीच खुद को असहाय महसूस कर रहे हैं।
दोनों का आरोप है कि संगठन के बड़े नेता सरकार में उनके काम में बाधा डाल रहे हैं। वहीं दूसरी ओर कांगड़ा की राजनीति में खासा दखल रखने वाले शांता कुमार चुनावी राजनीति से स्वयं को अलग कर चुके हैं। जिसे शांता कुमार का वरदहस्त प्राप्त है, वह अभी से 2022 की तैयारियों में जुट गया है। माना जा रहा है कि संगठन की 2022 की तैयारियों में कांगड़ा के ये दोनों ही नेता फिट नहीं बैठ रहे हैं। इंदू गोस्वामी जो पालमपुर से विधानसभा चुनाव हार गई हैं। भाजपा के प्रदेशाध्यक्ष सत्तपाल सत्ती ने इंदू गोस्वामी के इस्तीफे को तुरंत स्वीकार कर लिया और अपनी आदत के अनुसार तीखा ब्यान भी दे डाला। उन्होंने कहा कि इंदू चुनाव हारने के बाद घर बैठ गई थीं। हमने उन्हें प्रदेश महिला मोर्चा की अध्यक्ष बनाया।
वहीं पर रमेश ध्वाला ज्वालामुखी से चुनाव जीतने के बावजूद भी मंत्रीपद पाने में नाकाम रहे। ऐसे में ज्वालामुखी का भाजपा मंडल उनके खिलाफ काम कर रहा है, जिससे वे खफा चल रहे हैं। हालांकि, मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने मामले में हस्तक्षेप करते हुए बंद कमरे में गिले-शिकवे दूर करवाने का प्रयास किया। शिमला के पीटरहाफ में हुई पार्टी सदस्यता अभियान की बैठक में मुख्यमंत्री ने रमेश ध्वाला और ज्वालामुखी भाजपा मंडल के पदाधिकारियों व कार्यकर्ताओं को मनाने की कोशिश की। मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर प्रदेश भाजपा के प्रदेशाध्यक्ष रह चुके हैं। इस नाते वे संगठन, कार्यकर्ताओं और नेताओं को साधने का हुनर जानते हैं।
इस बैठक के बाद उन्होंने दावा किया है कि छोटे-मोटे गिले शिकवे चलते रहते हैं, जिन्हें सुलझा लिया गया है। मगर राजनीतिक जानकारों का मानना है कि भाजपा का यह ज्वालामुखी इनती जल्दी शांत होने वाला नहीं है। यहां पर नेताओं और संगठन के बीच वर्चस्व की जंग शुरू हो चुकी है। जैसी कांग्रेस के सत्ता में रहते हुए संगठन और सरकार के बीच चल रही थी। भाजपा भी अब सत्ता में है। ऐसे में नेताओं की महत्वकांक्षाएं सरकार और संगठन पर हावी होने लगी है। जिससे टकराव की स्थिति बन गई है। अब देखना यह है कि मुख्यमंत्री के हस्तक्षेप के बाद भाजपा का यह ज्वालामुखी शांत होता है या नहीं।


 
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