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हिमा ने परिस्थितियों को बनाया अपना दास

30/07/2019

हिमा ने परिस्थितियों को बनाया अपना दास

 बद्रीनाथ वर्मा/ मो. शहजाद

प्रतिभा कभी परिस्थितियों की दास नहीं होती। उलटे परिस्थितियों को ही अपना दास बना लेती है। भारत की नई उड़नपरी हिमा दास इसकी जीती-जागती नजीर हैं। उन्होंने जिंदगी में कामयाब होने के लिए किसी चमत्कार का इंतजार नहीं किया बल्कि अपने जोश और जज्बे से एक महीने में पांच स्वर्ण पदक जीतकर इतिहास रच दिया है। भले ही वह आज एक के बाद एक सुनहरी सफलताएं अर्जित कर स्वर्ण पदकों की झड़ी लगा रही हैं लेकिन उन्हें यह सब हासिल करने में काफी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। असम के नौगांव जिले के छोटे से गांव ढिंग से निकल कर विश्व पटल पर अपना नाम दर्ज कराने वाली हिमा दास का जन्म 9 जनवरी 2000 को एक गरीब किसान परिवार में हुआ।
पूरा परिवार धान की खेती करता है। हिमा के जीवन का भी अधिकतर हिस्सा इन्हीं खेतों में रोपाई- बुआई करते बीता। इसी दौरान उन्होंने खेतों की मेड़ और पगडंडियों पर नंगे पांव दौड़ लगानी शुरू कर दी। खेत की इन्हीं मेड़ों ने उनके लिए इंटरनेशनल रेस ट्रैक का रास्ता तय किया। वह रेस के मुकाबले में लड़कों से भी अव्वल रहती थीं। दोस्तों के अनुसार हिमा शुरू से जिद्दी स्वभाव की हैं और उनकी यह जिद खेल के मैदान में भी उनपर हावी रही है। उन्हें जीतने की जिद है। यही वजह है कि लड़के भी रेस में उनसे थक कर हार जाते थे लेकिन वह तब तक अड़ी रहती थीं जब तक अपने लक्ष्य को हासिल न कर लें। वह कई बार गांव में आने वाली गाड़ियों के साथ भी रेस लगाती थीं। इसमें भी वह नंगे पांव होने के बावजूद सबको पछाड़ देती थीं।
हिमा का बचपन से सपना फुटबॉलर बनने का था लेकिन मैदान में उनकी चुस्ती-फुर्ती देखकर पीटी टीचर ने एथलेटिक्स में हाथ आजमाने की सलाह दी। भारत में महिला फुटबॉल का बेहतर भविष्य न देखते हुए उन्होंने भी सलाह मान ली और अपने लिए रेस चुनी। गांव के उबड़-खाबड़ रास्तों, खेतों और पगडंडियों पर दौड़ लगाते रहने के कारण उनके अंदर यह प्रतिभा नैसर्गिक तौर पर मौजूद थी। यही वजह है कि उन्होंने स्थानीय स्तर पर हुए एथलेटिक्स मुकाबलों में ही झंडे गाड़ने शुरू कर दिए। अलबत्ता हिमा के अंदर मौजूद बेहतरीन धावक के गुणों को निखारने और बाहर लाने के लिए उन्हें अच्छे प्रशिक्षण की दरकार थी। यहां भी परिवार की आर्थिक तंगी उनके आड़े आई लेकिन कहते हैं न कि हुनर जहां भी, जिस हाल में हो अपनी मेधा का परिचय दे ही देता है। कोच निपोन दास ने एक जौहरी की तरह इस हीरे की परखा। उन्होंने हिमा के घरवालों को बेहतर प्रशिक्षण के लिए गुवाहाटी जाने देने के लिए मनाया। हिमा के पिता रंजीत महज इस बात से संतुष्ट थे कि बेटी को तीन वक्त का भरभेट भोजन मिल सकेगा। हिमा के गांव ढिंग से गुवाहाटी 140 किलोमीटर के फासले पर स्थित है। रोज ट्रेनिंग के लिए गुवाहाटी बस से आना-जाना पड़ता था। देर रात वापसी की वजह से उनके घर वालों की हिम्मत जवाब देने लगी। ऐसे में कोच निपोन दास उनके लिए एक बार फिर संकटकोचक बने और हिमा के रहने का गुवाहाटी में ही इंतजाम कराया।
अच्छे प्रशिक्षण के लिए हिमा दास को जूतों की जरूरत थी लेकिन घरवालों की दयनीय माली हालत देखकर उन्होंने कभी इसकी मांग नहीं की। बेटी की मेहनत व लगन देखकर पिता रंजीत दास ने पाई-पाई जोड़कर अपनी गाढ़ी कमाई से पैसे बचाए और हिमा के लिए 1200 रुपये के जूते खरीदे। गरीब किसान बाप के लिए 1200 रुपये किसी जायदाद से कम न थे। नंगे पैरों से अपने करियर की शुरुआत करने वाली हिमा के जीवन में जूतों की अहमियत का अंदाजा बखूबी लगाया जा सकता है। दिलचस्प बात यह है कि उनकी सफलताओं के आगे फुटवियर बनाने वाली दिग्गज जर्मन कंपनी एडिडास को भी नतमस्तक होना पड़ा और उसने सितंबर 2018 में हिमा दास को अपना ब्रंड एम्बेसडर बनाया। खास बात यह है कि कंपनी द्वारा बनाए इन खास जूतों पर उनका नाम छपता है।


 
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