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हिंदी विरोध का राजनीतिक वितंडा

24/09/2019

हिंदी विरोध का राजनीतिक वितंडा

उमेश चतुर्वेदी

दलगत सोच और स्थानीय भावनाओं के नाम पर व्यापक राष्ट्रीय हित को नकारना मौजूदा दौर की राजनीति का प्रिय शगल बन गया है। संविधान के लागू होने के महज पंद्रह साल बाद हिंदी को लेकर जो राजनीतिक वितंडा खड़ा किया गया, वह जैसे जरूरी परिपाटी बन गया। वरना अमित शाह के हिंदी को लेकर लिखे ट्वीट पर ऐसा ओछा विवाद नहीं होता।

14 सितंबर 1949 को संविधान सभा ने हिंदी को भारतीय गणतंत्र की राजभाषा के रूप में स्वीकार किया था। माना गया था कि हिंदी में कामकाज के लिए पंद्रह साल में प्रशासन को तैयार कर लिया जाएगा और फिर हिंदी अंग्रेजी का अपने आप स्थान ले लेगी। तभी से हम 14 सितंबर को हिंदी दिवस के रूप में मनाते आ रहे हैं। यह संयोग ही है कि जिन दिनों हिंदी को राजभाषा के स्थान पर आसीन करने को संविधान सभा ने स्वीकारोक्ति दी, उन दिनों श्राद्ध पक्ष चल रहे थे। तब से लेकर अब तक लगातार हिंदी दिवस श्राद्ध पक्ष या उन्हीं दिनों आता है। प्रगतिवादियों को यह सोच अतिवादी और हास्यास्पद लग सकती है, लेकिन यह सच है कि हिंदी को श्राद्ध पक्ष की ऐसी पनौती लग गई है।

हिंदी को लेकर जब भी बात होती है, उस पर विवाद होता ही है। अगर ऐसा नहीं होता तो हिंदी दिवस गृह मंत्री अमित शाह के विचार को राजनीति के खुर्दबीन से नहीं देखा जाता। हिंदी दिवस पर अमित शाह ने अपने ट्वीट में ऐसी बात नहीं कही है, जिसमें भारतीय भाषाओं की प्रतिष्ठा पर कोई सवाल उठ रहा हो। लेकिन क्षेत्रीय अस्मिताओं से अपने लिए खाद-पानी हासिल करती रही राजनीति ने इस पर वितंडा खड़ा कर दिया है।
गृहमंत्री के ट्वीट पर गौर किया जाना चाहिए। अमित शाह ने लिखा है, हिंदी दिवस पर मैं सभी नागरिकों से अपील करता हूं कि हम अपनी मातृभाषा का प्रयोग बढ़ाएं। हिंदी भाषा का भी प्रयोग कर एक भाषा के पूज्य बापू और लौह पुरुष सरदार पटेल के स्वप्न को साकार करने में योगदान दें। क्षेत्रीय अस्मिता केंद्रित राजनीतिक दलों को आपत्ति दरअसल हिंदी को राष्ट्र की एक भाषा बनाने की बात पर ज्यादा अखरती है।
जिन तृणमूल पार्टी और द्रविड़ मुनेत्र कड़गम ने शाह के इस विचार पर आपत्ति जताई है, उन्हें दरअसल हिंदी की व्यापकता से ज्यादा अंग्रेजी के किनारे होने की चिंता ज्यादा सता रही है। कहां तक उन्हें शाह के ट्वीट के अगले भाग की सराहना करनी चाहिए थी, लेकिन उन्हें भाषायी वर्चस्व को थोपे जाने का कथित खतरा नजर आने लगा। उन्हें शाह के ट्वीट के अगले भाग को भी देख लेना चाहिए, जिसमें उन्होंने कहा है, भारत की अनेक भाषाएं और बोलियां हमारी सबसे बड़ी ताकत हैं। लेकिन देश की एक भाषा ऐसी हो, जिससे विदेशी भाषाएं हमारे देश पर हावी ना हों। इसलिए हमारे संविधान निर्माताओं ने एकमत से हिंदी को राजभाषा के रूप में स्वीकार किया। हिंदी वैसे भी द्रविड़ मुनेत्र कड़गम की दुखती रग है।
ऐसा माना जाता है कि चूंकि तमिलनाडु में हिंदी विरोध के नाम पर अंग्रेजी में ज्यादा निवेश हुआ है, इसलिए द्रविड़ दल परेशान हो जाते हैं और हिंदी विरोध की राजनीति को धार देने लगते हैं। इस बार भी डीएमके प्रमुख स्टालिन के हिंदी के खिलाफ राज्यव्यापी प्रदर्शन करने की चेतावनी को इन्हीं संदर्भों में देखा जाना चाहिए। ऐसे माहौल में कांग्रेस और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का उतरना अस्वाभाविक नहीं है। कांग्रेस की कर्नाटक इकाई और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का त्रिभाषा फॉमूर्ले को लागू करने की मांग करना भी इसी राजनीति का विस्तार है। हिंदी के विरोध को लेकर तर्क यह दिया जा रहा है कि उसे थोपा जा रहा है। हमें यह भी याद रखना होगा कि अपने जिस राजनीतिक व्यवस्था को स्वीकार किया है, उसमें राष्ट्रीय एकीकरण का भाव है।
वह सांस्कृतिक बुनियाद पर टिकी राजनीतिक इकाई की महत्ता स्वीकार तो करता है, लेकिन राष्ट्रीयता के लिए राजनीतिक एकीकरण की बात पर भी जोर देता है। इजराइल हो या तुर्की या आधुनिक राष्ट्र-राज्य की अवधारणा वाले दुनिया के बाकी देश, उन्होंने इसी व्यवस्था को स्वीकार किया है। भारतीय भाषाएं फलें-फूलें, इस पर किसी को एतराज नहीं हो सकता। लेकिन ये भाषाएं आपसी संपर्क के लिए विदेशी भाषा मसलन अंग्रेजी का ही सहारा लें, यह तर्क स्वीकार्य कैसे हो सकता है? इसलिए अगर राष्ट्रीय संपर्क और स्थानीय भाषाओं के बीच सेतु को लेकर हिंदी पर भरोसा जताया जाना भी गलत नहीं हो सकता। वैसे यह भी मानने से गुरेज नहीं किया जा सकता कि चाहे द्रविड़ दल हों या पश्चिम बंगाल की ममता बनर्जी की पार्टी, हिंदी विरोध के जरिए अमित शाह और मोदी का विरोध उनकी प्रासंगिक राजनीतिक मजबूरी है। तमिलनाडु में अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं।
द्रविड़ दलों को हिंदी विरोध के नाम पर अपने वोटरों को एकजुट करने का पुराना और परखा अनुभव है। इस अनुभव का एक बार फिर वे अपने पक्ष में जनजागरण करने के लिए इस्तेमाल कर रही हैं। मोदी और शाह की भाजपा के हर कदम का विरोध तो ममता के लिए नियमित राजनीतिक कर्म हो गया है। लिहाजा हिंदी के मुद्दे पर उनकी तरफ से विरोध के सुर ना उठना ही अस्वाभाविक माना जाता। लेकिन ममता बनर्जी को नहीं भूलना चाहिए कि हिंदी भले ही 1860 में पहली बार दरभंगा राज्य की राजकाज की भाषा बन गई थी, उसे राष्ट्र भाषा का सर्वोच्च स्थान दिलाने का विचार ममता की ही धरती के विद्वत्त पुरुष केशवचंद्र सेन ने 1875 में दिया था।
कलकत्ता के धर्मतला मैदान में सेन से मुलाकात के बाद ही दयानंद सरस्वती को सत्यार्थ प्रकाश को संस्कृत की बजाय हिंदी में लिखने की प्रेरणा दी थी। ममता को एक बार फिर से इतिहास की तरफ झांक लेना चाहिए कि शांति निकेतन के प्रेरक अध्यापक आचार्य क्षितिमोहन सेन की प्रेरणा से ही हजारी प्रसाद द्विवेदी और परशुराम चतुर्वेदी जैसे विद्वानों ने इतिहास की धूल में दबे हिंदी के प्रेरक व्यक्तित्वों कबीर और मीरा के अन्यतम योगदान से दुनिया को परिचित कराया। ममता को यह भी याद करना चाहिए कि पश्चिम बंगाल की ही विभूति रामानंद चट्टोपाध्याय ने अपनी अंग्रेजी पत्रिका ‘मॉडर्न रिव्यू’ के समानांतर हिंदी में ‘प्रवासी’ नामक पत्रिका निकाली।
द्रविड़ पार्टियों चाहे जो भी कहें, लेकिन उन्हें यह नहीं भूलना चाहिए कि तमिलनाडु की ही उस पीढ़ी को हिंदी की जानकारी से वंचित होने का अब भी मलाल है, जिन्होंने पिछली सदी के साठ के दशक के आखिरी दिनों के हिंदी विरोधी आंदोलन के चलते हिंदी न सीखने का फैसला किया था। द्रविड़ पार्टियां क्या इस तथ्य को झुठला पाएंगी कि तमिलनाडु में अब हिंदी सिखाने वाले कोचिंग संस्थान क्यों चल रहे हैं? तमिलनाडु के शैक्षिक संस्थानों के राजस्व में अब हिंदीभाषी राज्यों बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड, मध्य प्रदेश और राजस्थान के छात्र योगदान नहीं दे रहे हैं? हिंदी को आजाद भारत की राजभाषा बनाने वाले संवैधानिक प्रस्ताव को मंजूरी देते वक्त संविधान सभा ने शायद ही सोचा होगा कि भविष्य में हिंदी को हिंदुत्ववादी राजनीति के चश्मे से देखा जाएगा।

भारत की अनेक भाषाएं और
बोलियां हमारी सबसे बड़ी ताकत
हैं। लेकिन देश की एक भाषा ऐसी हो, जिससे
विदेशी भाषाएं हमारे देश पर हावी ना हों।
इसलिए हमारे संविधान निर्माताओं ने एकमत से
हिंदी को राजभाषा के रूप में स्वीकार किया।
अमित शाह, केंद्रीय गृहमंत्री

लेकिन हैदराबाद के सांसद असदुद्दीन ओबैसी ने अमित शाह के विचार को इसी नजरिए से देखने और अपने समर्थकों को दिखाने की कोशिश की है। आजादी के बाद से लेकर हाल के दिनों तक देश का नीति निर्धारक और शासक वर्ग अंग्रेजी शिक्षित और अंग्रेजी मीडिया से प्रभावित रहा है। हिंदी की तुलना में अंग्रेजी और अंग्रेजी मीडिया से ज्यादा प्रभावित रहने वाले नीति निर्धारक और राजनीतिक शासक अब भी कम नहीं हुए हैं। लेकिन अब हिंदी और स्थानीय अस्मिताओं ने भी इस क्षेत्र में अपना असर दिखाना शुरू किया है। इससे अंग्रेजीभाषी प्रभु समाज और अंग्रेजी मीडिया को अपना सिंहासन डोलता हुआ नजर आने लगा है।
यही वजह है कि राजभाषा की तरफ बढ़ते देश की सबसे बड़ी संपर्क भाषा के कदमों का वितंडा वह खड़ा कर रहा है। आज के दौर में भी अगर पश्चिम बंगाल से सन्मार्ग, प्रभात खबर, दैनिक जागरण और राजस्थान पत्रिका जैसे लोकप्रिय अखबार निकल रहे हैं तो इसका मतलब साफ है कि हिंदी, पश्चिम बंगाल की जनता को ग्राह्य है। जिस तमिलनाडु, आंध्र और कर्नाटक से अमित शाह के बयान के खिलाफ आवाजें उठी हैं, वहां भी राजस्थान पत्रिका, स्वतंत्र वार्ता और हिंदी मिलाप जैसे अखबार अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं।
दुर्भाग्य यह है कि चाहे ममता बनर्जी हों या कुमार स्वामी या एम के स्टालिन, अपने ही प्रभाव वाले इलाकों में हिंदी के बढ़ते कदम को राजनीतिक कारणों से झुठलाते रहे हैं। बेहतर होता कि वे हिंदी विरोध के नाम पर राजनीतिक एजेंडा स्थापित करने और राजनीतिक हित साधने की बजाय व्यापक राष्ट्रीय हितों का ध्यान रखते, अपने ही पूर्वजों के विचारों का ध्यान रखते। लेकिन निकट भविष्य में भी वे ऐसा सोच पाएंगे, ऐसा नहीं लगता। फिर भी उन्हें भूलना नहीं चाहिए कि अंग्रेजी मीडिया के सहारे वे अपनी राजनीति भले ही चमकाते रहेंगे, हिंदी का कारवां बढ़ता ही रहेगा।


 
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