युगवार्ता

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2000 करोड़ का घोटाला

11/07/2019

2000 करोड़ का घोटाला

जितेन्द्र चतुर्वेदी

जनता को मुंगेरी लाल के सपने दिखाने वालों का सच सामने आने लगा है। शिक्षा क्षेत्र में आए दिन होने वाला खुलासा इसकी मिसाल है।

मामला 2000 करोड़ रुपये के घोटाले का है। आरोप सीधा मनीष सिसोदिया पर है। शिक्षा विभाग उन्हीं के पास है। वे 2000 करोड़ रुपये की हेराफेरी में फंस गए हैं। उन पर भ्रष्टाचार के जो आरोप लग रहे हैं, उसके दस्तावेजी प्रमाण हैं। वे दस्तावेज दिल्ली सरकार के हैं। केजरीवाल सरकार और उनके समर्थक इसे, यह कह कर खारिज कर दे कि केंद्र सरकार ने उनके खिलाफ दस्तावेज गढ़ा है। लेकिन इसकी कोई संभावना बची नहीं है। उसकी वजह यह है कि दस्तावेज केजरीवाल सरकार ने ही दिए है, इसलिए साजिश का नाम तो नहीं दे सकते। हालांकि कोशिश पूरी हो रही है कि इसे साजिश करार दे दिया जाए। इसका सबूत उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया का ट्विटर है। उन्होंने 2000 करोड़ रुपये का घोटाला दबाने के सोशल मीडिया को जरिया बनाया।


कहा कि यदि आरोप सही है तो गिरμतार करिए। वे यही नहीं रुके। दस्तावेजों को षडयंत्र का हिस्सा करार देने के लिए कक्षाओं की तस्वीर साझा करने लगे। इसमें कोई दो राय नहीं है कि जो तस्वीरें उन्होंने साझा की वे कक्षाओं की बहुत व्यवस्थित तस्वीरें हैं। वे बताती हैं कि कक्षाओं का आधुनिकीकरण हुआ है। लेकिन प्रति कक्षा के आधुनिकीकरण में तकरीबन 25 लाख रुपये खर्च हुए है, यह तस्वीरें भी साबित नहीं कर पा रही हैं। उनकों देख कर बस इतना अनुमान लग रहा है कि प्रति कक्षा आठ से दस लाख खर्च हुआ होगा। लेकिन मनीष सिसोदिया यह मानने के लिए तैयार नहीं हैं। वे उन दस्तावेजों से भी इत्तफाक नहीं रख रहे हैं जो उनके ही मंत्रालय ने दिया है। उसने ही प्रति कक्षा खर्चा बताया है। वह खर्च तकरीबन 25 लाख रुपये का आता है।


आम आदमी पार्टी ने 500 विद्यालय बनाने का दावा किया था। आरटीआई में कहा गया है कि 241 स्कूलों को ही मंजूरी मिली यानी 500 स्कूलों का दावा झूठा है।

इसे सुनकर कोई भी चौंक सकता है। वह इसलिए क्योंकि जहां घर 25 लाख में मिल जाया करता है वहां 300 वर्ग मीटर में बनने वाली कक्षा 25 लाख में तैयार हो रही है। यह खर्च केजरीवाल सरकार को कठघरे में खड़ा करता है। सवाल यह है कि जिस बुनियाद को मजबूत करने का दावा केजरीवाल सरकार कर रही है, क्या वह वाकई में मजबूत हुआ है। दस्तावेज बताते हैं कि सब सरासर झूठ है। शिक्षा के नाम पर केजरीवाल सरकार ने बस व्यापार किया है। सुधार तो बस कहने सुनने की बात है। जमीन पर कुछ खास हुआ नहीं है। अगर कुछ हुआ है तो वह है हेराफेरी। केजरीवाल सरकार उसकी मास्टर है। कैसे, कहां से और कब सरकारी धन में सेंध लगानी है उससे बखूबी परिचित है। यदि ऐसा नहीं होता तो महज पांच साल में केजरीवाल सरकार घोटालों की सरकार नहीं बन जाती है।
उन सारे घोटालों में शिक्षा घोटाला बहुत गंभीर है। इसकी सबसे बड़ी वजह घोटाले का शिक्षा क्षेत्र से जुड़ा होना है। यही वह क्षेत्र है जिस पर देश और समाज का भविष्य निर्भर करता है। यदि यहां पर कोई गड़बड़ी होती है तो उसका सबसे ज्यादा नुकसान राष्ट्र को झेलना पड़ता है। पूरी एक पीढ़ी अंधकार में चली जाती है। इसका असर अगली पीढ़ी पर पड़ता है। कहने का मतलब यह है कि शिक्षा क्षेत्र का घोटाला दो पीढ़ियों को खत्म कर देता है। इस वजह से देश और समाज 50 साल पीछे चला जाता है। इसका आकलन किए बिना केजरीवाल सरकार 2000 करोड़ रुपये डकार गई। इस खेल की किसी को खबर नहीं थी। भाजपा प्रवक्ता हरीश खुराना को कहीं से खबर लग गई। वे इस मसले पर छानबीन करने लगे। इस दौरान हरीश को पता चला कि दावे में सच्चाई है।
केजरीवाल सरकार ने शिक्षा के नाम पर मोटी रकम बनाई है। यह बात उन्होंने प्रदेश अध्यक्ष को बताई। तय हुआ कि बिना दस्तावेज के बात करना ठीक नहीं होगा। तो दस्तावेज जुटाने का दौर शुरू हुआ। उसका सबसे अच्छा तरीका सूचना का अधिकार (आरटीआई) साबित हुआ। हरीश खुराना ने मई में आरटीआई लगाई। उसमें पूछा गया कि केजरीवाल सरकार ने 15 फरवरी से अब तक कितने स्कूल बनाए है ? उनमें कितने कमरे है? उनकी लागत कितनी आई है? कितने ठेकेदारों को ठेका दिया गया? उसमें कक्षाओं के डिजाइन और उसमें प्रयुक्त हुई सामग्री के बारे में भी जानकारी मांगी गई थी। उसका जवाब आया। बताया गया कि 241 स्कूल बनाने की मंजूरी दी गई थी। उनमें 12748 कमरे बनने हैं। काम चल रहा है। लोक निर्माण विभाग ने उसके लिए 2892.65 करोड़ रुपये जारी किए हैं। बनाने का ठेका 34 ठेकेदारों को मिला। पहली नजर में इन आंकड़ो में कोई बुराई नजर नहीं आती। इन्हें पढ़कर लगता है कि काम अगर कोई कर रहा है, तो वह केजरीवाल सरकार है।
लेकिन जब इस जवाब का बारीकी से अध्ययन किया जाता है तो पता चलता है कि इसमें बहुत फरेब है। भाजपा का तो यही दावा है। उनकी माने तो जितना काम होना है उसका बजट 892 करोड़ रुपये से ज्यादा नहीं है। 2000 करोड़ रुपये तो अतिरिक्त खर्च है। इसे ही घोटाला कहा जा रहा हैं। प्रदेश अध्यक्ष मनोज तिवारी ने कहा कि अच्छे से अच्छे होटल का कमरा भी ज्यादा से ज्यादा ै5000 वर्ग मीटर से ज्यादा का नहीं बनता, लेकिन केजरीवाल सरकार स्कूल का कमरा ै8800 वर्ग मीटर का बनवा रही है। ये दिल्ली की जनता के टैक्स का ऐसा दुरुपयोग है, जो कहीं देखने को नहीं मिलेगा। भाजपा सांसद प्रवेश साहिब सिंह ने सवालिया लहजे में कहा कि क्या केजरीवाल सरकार ने शिक्षा का बजट इतना बड़ा घोटाला करने के लिए बढ़ाया था। उनका दावा है कि घोटाला पार्टी फंड के लिए हुआ है। शिक्षा को लेकर कमोवेश यही कहानी लोक नीति शोध केन्द्र की रिपोर्ट भी कहती है।
उसकी माने तो शिक्षा को लेकर अरविंद केजरीवाल ने बहुत दावे किए थे। लेकिन उन दावों में कोई सच्चाई नहीं है। वे आंकड़े यह भी बताते हैं कि झूठ केजरीवाल सरकार का धंधा है और बेईमानी सरकार का स्वभाव है। विज्ञापन इन दुर्गुणों को छुपाने की कोशिश है। लेकिन जनता से कुछ छिपा नहीं है। केजरीवाल सरकार की हेराफेरी धीरे-धीरे बाहर आ रही है। शिक्षा घोटाला उसकी एक बानगी है। आंकड़े बताते हैं कि 2015 से शिक्षा के लिए जरूरी बुनियादी ढांचे पर होने वाले खर्च में लगातार कमी आई है। आंकड़ों की माने तो 2015-16 में बुनियादी ढाचे पर खर्च 997 करोड़ रुपये था। वह वह 2016-17 में घटकर 853 करोड़ रुपये हो गया। 2017-18 में तो उसमें और गिरावट आई। वह 687 करोड़ रुपये मात्र रह गया। चुनावी साल को देखते हुए केजरीवाल सरकार ने 2019-20 में अचानक खर्च बढ़ाकर 988 करोड़ रुपये कर दिया। लेकिन फिर भी वह 2015-16 के मुकाबले कम ही रहा।
कहने का मतलब यह है कि 2015 के बाद केजरीवाल सरकार ने शिक्षा के क्षेत्र में रचनात्मक खर्च नहीं किया। अध्यापकों की कमी इसकी एक और मिसाल है। रिपोर्ट के मुताबिक 32984 अध्यापकों की जरूरत है। इसे भी केजरीवाल सरकार पूरा न कर सकी। वह पांच साल में काबिल अध्यापक न खोज पाई। चूंकि अध्यापक पढ़ाने के लिए थे नहीं, इस वजह से बच्चों ने स्कूल से मुंह मोड़ लिया। आंकड़ों की माने तो 2015 के बाद बच्चों के स्कूल छोड़ने की दर साल दर साल बढ़ती रही। उसे रोकने के लिए केजरीवाल सरकार कुछ न कर पाई। कर तो वह उन विद्यालयों के लिए भी कुछ न पाई जिसका वह दावा करती रही। उसने 500 विद्यालय बनाने का दावा किया था। आरटीआई में कहा गया है कि 241 स्कूल को ही मंजूरी मिली यानी 500 स्कूलों का दावा झूठा है।

अगर सही होता तो 241 के बजाए 500 स्कूल बनवाने की मंजूरी दी जाती। पूरा होना या न होना यह तो अलग मसला है। दावे तो झूठे नहीं होने चाहिए। रिपोर्ट की माने तो केजरीवाल सरकार ने 82 जगहें स्कूल के आंवटित की है। पर पांच सालों में काम कही शुरू नहीं हुआ। जिन 25 स्कूलों पर काम हो रहा है उनकी शुरूआत शीला दीक्षित सरकार में हुई थी। केजरीवाल सरकार ने तो कुछ शुरू किया नहीं। अगर कुछ किया तो वह वादा है।


 
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