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नफरतों को मिटाना और मोहब्बतें बढ़ाना लेखकों का कर्तव्य : डॉ शेख अकील

07/11/2019

-अयोध्या मामले में कोर्ट के फैसले पर भावनात्मक प्रतिक्रिया से बचने की अपील

मोहम्मद.शहजाद
नई दिल्ली, 07 नवम्बर (हि.स.)। शांति हर देश और समाज की बुनियादी जरूरत है। शांतिपूर्ण समाज में रहने वाले लोग ही विकास के लिए रास्ते निर्धारित करते हैं। यही कारण है कि हमारे लेखक हमेशा एक शांतिपूर्ण और अनुकरणीय समाज की स्थापना के लिए प्रयास करते रहे हैं। इन लेखकों ने समाज में स्वस्थ और सकारात्मक प्रवृत्तियों को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।  बौद्धिक और वैचारिक अतिवाद के खिलाफ लिखते हुए लेखकों ने हमेशा भाईचारे और प्रेम की बात की। आज जब हमारा समाज टकराव और संघर्ष की स्थिति में है तो इनकी जिम्मेदारी और बढ़ जाती है। इसलिए लेखकों और कवियों के लिए इस समय हमारे देश और समाज का सही दिशा में नेतृत्व करना अनिवार्य है। उनके प्रयासों से हमारा देश और समाज अमन-शांति का पैगाम बन सकता है। यह विचार अयोध्या मामले पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के संदर्भ में राष्ट्रीय उर्दू भाषा विकास परिषद (एनसीपीयूएल) के निदेशक डॉ शेख अकील अहमद ने व्यक्त किए।
डॉ शेख ने कहा कि अयोध्या मामले पर आने वाले फैसले को लेकर हिंदू और मुसलमानों के बीच बहुत भ्रम की स्थिति है। ऐसे संवेदनशील मुद्दे के कारण देश में अशांति का खतरा भी है। अतीत में देश में इस मसले की वजह से दंगे भी हुए हैं। अब वर्तमान परिस्थितियों में भी इसका खतरा है। इसलिए सभी संवेदनशील और जागरूक लोगों की जिम्मेदारी है कि वे शांति और एकता बनाए रखने के लिए हर संभव प्रयास करें।
एनसीपीयूएल के निदेशक ने कहा कि इस संवेदनशील मुद्दे पर प्रतिक्रिया देने के लिए सभी लोगों को विशेष रूप से सावधान रहने की आवश्यकता है क्योंकि यह मुद्दा लोगों की धार्मिक भावनाओं और आस्था से जुड़ा हुआ है। समाज में अराजकता पैदा हो सकती। इसलिए यह मानवतावादी और संवेदनशील लेखकों का कर्तव्य है कि वे नफरतों को मिटाते हुए प्रेम और सौहार्द को बढ़ावा दें। उन्होंने कहा कि हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि मौलाना अबुल कलाम आजाद जैसे बुद्धिजीवी ने स्वतंत्रता और स्वराज पर हिंदू-मुस्लिम एकता को प्राथमिकता दी। उन्होंने अपने ऐतिहासिक संबोधन में कहा था, ‘अगर एक स्वर्गदूत आज स्वर्ग से नीचे आए और दिल्ली के कुतुब मीनार पर खड़ा होकर घोषणा करे कि स्वराज 24 घंटे के भीतर मिल सकता है, बशर्ते भारत हिंदू-मुस्लिम एकता से पीछे हट जाए। अगर मैं मना कर दूं तो मैं स्वतंत्रता खो दूंगा लेकिन मैं हिंदू-मुस्लिम एकता नहीं छोड़ूंगा क्योंकि अगर हम स्वराज नहीं पाते हैं तो यह भारत का नुकसान होगा लेकिन अगर हिंदू-मुस्लिम एकता स्थापित नहीं हुई तो यह मानवता का नुकसान होगा।’
डॉ शेख अकील ने कहा कि मानवता, सांस्कृतिक बहुलतावाद, बहुलवाद और सांस्कृतिक विविधता की रक्षा करना हमारे लिए अधिक महत्वपूर्ण है क्योंकि यह हमारे देश और समाज की पहचान है। इसीलिए अयोध्या मामले पर हमें सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय को स्वीकार करना चाहिए और भावुकता से बचना चाहिए। उन्होंने कहा कि हमें हर स्थिति में शांति के लिए प्रयास करना होगा। इसके लिए विभिन्न संगठनों के साथ कवियों और लेखकों को भी आगे आना होगा क्योंकि हमारे देश की प्रगति और समृद्धि का निहितार्थ एकजुट रहने में ही है। यदि हमारा समाज अराजक हो जाता है तो सांस्कृतिक और सामाजिक विकास के हमारे सारे सपने चकनाचूर हो जाएंगे और हम अन्य देशों से हर मोर्चे पर पिछड़ जाएंगे।

हिदुस्थान समाचार


 
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