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भारत कैसे हो आत्मनिर्भर

19/05/2020

के.पी. सिंह
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दो नये स्लोगन देश के नाम हालिया संबोधन के दौरान सामने आये हैं- आत्मनिर्भर भारत और लोकल-वोकल। उनमें भीड़ को तरंगित कर देने का कौशल है। इसलिए यह स्लोगन भी उनके पिछले नारों की तरह लोगों के दिल-दिमाग और जुबान पर चढ़ रहे हैं लेकिन जब नारे किसी गहरे चिंतन की उपज हों तो वे कालातीत सूक्त वाक्य बन जाते हैं। जैसे लोहिया जी का नारा- जिंदा कौमें पांच साल का इंतजार नहीं करतीं अन्यथा नारा मनोरंजन करके लोगों की स्मृति से विदा हो जाते हैं। ऐसा नहीं है कि आत्मनिर्भर भारत और लोकल-वोकल में कोई दम न हो। लेकिन कोई आह्वान हो तो उसे साकार रूप देने के लिए उद्घोषकर्ता के मन में सुचिंतित रूपरेखा होनी चाहिए। इसके अभाव के कारण ही मेक इंडिया का आह्वान अपनी सार्थकता नहीं ढूंढ़ पाया। प्रधानमंत्री के नये नारे भी ऐसे ही खिलवाड़ का शिकार न हो जायें।
आत्मनिर्भर भारत के मामले में सबसे बड़ी रुकावट क्या है- सदियों की गुलामी के कारण हमारे अंदर रची-बसी हीन भावना। आज स्थिति बदल गई है। दुनिया के सारे बड़े देशों में भारतीय नंबर एक हैं क्योंकि हर व्यवस्था में उनका प्रभुत्व है। चाहे बड़ी कंपनियों के सीईओ के मामले में हो या विकसित देशों की सरकारों के मामले में। फिर भी भारतीयों में अभी वह आत्मविश्वास नहीं आ पाया है, जिसकी जरूरत है। वह कोई पहल नहीं कर पा रहे जिसके पीछे सारी दुनिया चलने में गौरव महसूस करे। इससे तो गुलामी के दौर की स्थितियां बेहतर थीं। जब महात्मा गांधी जैसी शख्सियत ने जन्म लिया। अपने अधिकारों की लड़ाई के लिए दुनिया के किसी हिस्से में आज के समय कोई आंदोलन खड़ा होता है तो लोगों को महात्मा गांधी और उनका अहिंसक सत्याग्रह याद आता है। विज्ञान, उद्योग, कृषि, व्यापार किसी भी क्षेत्र मे मौलिक सृजन में भारतीय अपना नाम सामने नहीं ला पा रहे। अनुकरणवाद भारतीयों की पहचान बन गया है। पर निर्भरता इसकी अनिवार्य परिणति है। इससे उबरने के लिए कोई शुरुआत सोची जाये तो वह शिक्षा से होनी चाहिए। क्या इसपर ध्यान दिया जा रहा। आजादी की लड़ाई ने राष्ट्र नायकों में आत्म गौरव की भावना पैदा की थी क्योंकि अनुकरणवाद को झटके बिना अपने लक्ष्य के लिए उनमें मजबूत इच्छा शक्ति बन ही नहीं सकती थी। इसलिए अंग्रेजी में इंगलैंड के विद्वानों तक के कान काटने वाले राष्ट्र नायकों ने अपने कार्य व्यवहार के लिए राष्ट्रभाषा को अपनाया। जबकि इनमें से महात्मा गांधी सहित कई राष्ट्र नायक तो ऐसे थे जो राष्ट्रभाषा में अटकते रहते थे। आजादी की लड़ाई के बाद भी स्वप्न दृष्टा राजनीतिज्ञ देसी भाषाओं को पढ़ाई का माध्यम बनाने के लिए जोर देते रहे। अंग्रेजी के प्रोफेसर होकर भी राजेंद्र माथुर ने पत्रकारिता के लिए इसी के तहत हिंदी को चुना। आज जब यह सिलसिला मंजिल तक पहुंचना चाहिए था, शिक्षा नीति में विदेशी भाषा के सामने पूर्ण समर्पण किया जा चुका है। विज्ञान, प्राद्यौगिकी, व्यापार, विधि आदि में तरक्की के लिए अंतर्राष्ट्रीय संपर्क भाषा की मजबूरी जताकर यह किया गया लेकिन यह सारे तर्क कपटपूर्ण हैं। 
गुलामी में हीनता के साथ-साथ कई और कुंठाऐं पनपती हैं जो मानसिकता को बीमार बना देती हैं। भारतीय समाज ऐसी तमाम कुंठाओं का शिकार है। एक कुंठा है जलन की ग्रन्थि में अटके रहने की। जैसे कि उसे विदेशी विद्वता से जलन है। एक क्षण में वह बिना किसी तर्कसंगत मैरिट के उस दर्शन को खारिज कर देता है जिसको किसी विदेशी विद्वान ने प्रतिपादित किया हो इसके बावजूद कि भारतीय संस्कृति मूल रूप से वसुधैव कुटुंबकम की हिमायती है। वह चाहता है कि दुनिया के बड़े देश उसे मान-सम्मान से बसने का अवसर दें लेकिन अपने यहां वह इस नौबत पर विदेशी मूल के प्रति घृणा की इंतहा से नहीं चूकता। चुनाव में सिर्फ इस आधार पर किसी दल का मुरीद बन जाता है कि वह वंचितों को दिये गये विशेष अवसर को खत्म करने का चकमा देने और धर्मद्रोहियों को सबक सिखाने का भरोसा दिलाने मे सफल है। वह अपने से निचले पायदान पर खड़े लोगों पर अपना दबदबा खत्म नहीं करना चाहता। इसे पूरा करने के लिए उसे अपने ऊपर दोबारा विदेशी प्रभुत्व तक स्वीकार है। विदेशी भाषा की प्रभुता का समर्थन करने के पीछे यही कारक है। भद्र लोक प्रभुता की अपनी विरासत कायम रखने के लिए विदेशी भाषा की शरण में हैं। इसीलिए संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षा का पैटर्न अब ऐसा बनाया गया है जिससे देसी भाषा का कोई अभ्यर्थी देश के सर्वोच्च प्रशासनिक सत्ता लोक में प्रवेश न कर पाये।
अब केवल भाषा की बात नहीं रह गई। भाजपा के सत्ता में आने से जो लोग कान्वेंट स्कूलों के दिन लदने के सपने देख रहे थे वे हतप्रभ हैं। इन कान्वेंट स्कूलों में शिक्षा नहीं दी जाती बल्कि कल्चर सिखाया जाता है। यह कल्चर यहां की जमीनी जरूरतों से जुड़ा कल्चर नहीं है। यह साहबी का आयातित कल्चर है। भाजपा वाले उद्धरण तो पौराणिक कहानियों के देते हैं जिनमें बताया जाता है कि चक्रवर्ती सम्राट तक अपने बच्चों को महल में गुरुओं को बुलाने की बजाय उनके गुरुकुलों में अपनी संतानों को पढ़ने भेजते थे। जहां कोई सांसारिक सुख की सुविधा नहीं होती थीं और राजा-रंक यानि कृष्ण और सुदामा एक साथ पढ़ते थे। क्या आयातित संस्कृति का गुलाम बनकर नई पीढ़ी आत्मनिर्भरता के लिए मुखातिब हो सकेगी।
अनुकरणवाद की शिकार नस्लें हर कहीं अपनी जड़ें उखाड़ कर चलती हैं। उन परंपराओं को इन मनी प्लांटों ने अपने जीवन का हिस्सा बना लिया है जो इन पर ब्रेनवॉश के तहत लादी गई हैं। सर्दियों में आइस्क्रीम के काउंटर की डिमांड इस देश में अटपटी लगती है। जंक फूड तमाम नुकसान के बावजूद बच्चों के लिए अनिवार्य हो गये हैं। बुंदेलखंड जैसे इलाके में लोग सत्तू का स्वाद भूल चुके हैं। लोग विज्ञापनों और टीवी चैनलों से गाइड होते हैं। ऐसे शौकीन नकलचियों में चाइनीज सामान खूब खपता है तो आश्चर्य क्या है। स्वास्थ्य का जोखिम उठाकर भी फैशन की आदतें पोसी जा रही हैं। आत्मनिर्भर भारत तब बन सकता है जब हीन भावना से सभी कुंठाओं से भारतीय समाज को मुक्त किया जा सके। आत्मसम्मान को आत्माभिमान के स्तर तक ऊंचा उठाने की जरूरत है। स्वदेशी की कट्टरता भरने का समय है।
हाल के दशकों में गांवों से जो पलायन हुआ वह लोगों के लिए वरदान बन गया था। परंपरागत जीविका से लोग गांव में परिवार का पेट तक नहीं भर पा रहे थे। लड़के-लड़कियों की अच्छी पढ़ाई और शादी ब्याह की बात तो दूर है। महानगरों में पहुंचे तो वे दरिद्रता से मुक्त हुए और उनका जीवन स्तर ऊंचा उठा। इसलिए मजदूरों की घर वापसी को लेकर भाव प्रधान होकर सोचना अर्थ का अनर्थ करना है। यह सुनहरे संसार की वापसी की रूमानी कल्पना न होकर आनेवाली जटिल चुनौतियों की दस्तक है। जिनका भान करके यथार्थपरक मानसिकता का परिचय दिया जाना चाहिए। आत्मनिर्भर भारत की प्रासंगिकता इस दौर में ज्यादा महत्वपूर्ण इसलिए है क्योंकि इसकी कवायद को पैर लगने से इन चुनौतियों से निपटने में आसानी होगी।
घर लौटे प्रवासियों की महिलाएं परंपरागत खानपान की सामग्री तैयार करने में माहिर हैं। अगर खानपान के संबंध में स्वदेशी का महत्व स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से लोगों की समझ में आ गया तो इनका व्यापार चल पड़ेगा। यही बात पहरावे, फर्नीचर, सजावट आदि जीवन की विभिन्न गतिविधियों के संबंध में है। व्यापार भी एक कला है लेकिन अंग्रेजों के समय जब भारतीय शिल्पकला को सुनियोजित ढंग से बर्बाद किया गया, हम इस मंत्र को भूल गये। गांवों के लोग अपने उत्पाद और अपनी सेवा में प्रचुर गुणवत्ता के बावजूद इसलिए कच्चे पड़ जाते हैं कि उन्हें पैकेजिंग, फिनिशिंग आदि का ज्ञान नहीं है। वे महानगरों में रहकर आये हैं, वहां उन्होंने व्यापार की कलाओं (सेंस) को आत्मसात किया होगा। अब जब परीक्षा का दौर है तो देखना है कि वे कितना खरा उतरते हैं।
कुल मिलाकर आत्मनिर्भरता और लोकल-वोकल को लेकर सुगठित समग्र दृष्टि होनी चाहिए। बेहतर होगा कि संघ के अनुसांगिक संगठनों से भी सरकार इस मामले में विचार विमर्श करे।
(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)


 
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