युगवार्ता

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राजनीति का औजार नहीं संस्कृत

01/07/2019

राजनीति का औजार नहीं संस्कृत

उमेश चतुर्वेदी

संस्कृत भाषा में भी प्रेस रिलीज जारी करने के उत्तर प्रदेश सरकार के फैसले से पारंपरिकता विरोधी खेमे में विरोध के स्वर उठने लगे हैं। पर संस्कृत को आगे बढ़ाए जाने की जरूरत क्यों हैं, इसे समझना जरूरी है।

उत्तर भारत में भाषा और संस्कृति की एकरस दुनिया उस तालाब की भांति हो गई है, जिसमें अब कोई हिलोर नहीं उठती। अपसंस्कृति के अपवादों को छोड़ दें, तो उत्तर भारतीय सांस्कृतिक दुनिया यथास्थितिवादी तालाब की तरह हो गई है। संस्कृति के इस यथास्थितिवादी तालाब में उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने नई घोषणा करके जैसे पत्थर उछाल दिया है। राज्य सरकार की प्रेस रिलीज को संस्कृत में जारी करने के नए आदेश ने शांत पड़े उस तालाब में हलचल पैदा कर दी।
गंवई माहौल में शांत पड़े तालाब में पत्थर उछाले जाने से उठती हिलोर में खास तरह का सौंदर्य होता है। लेकिन उत्तर प्रदेश सरकार के इस फैसलारूपी पत्थर से जो संस्कृति और राजनीति की दुनिया में जो हिलोर उठ रही है, उससे कथित प्रगतिवादी खेमे के पेट में मरोड़ हो रही है। आजादी के बाद विकसित भारत को जो शैक्षिक पाठ पढ़ाया गया है, उससे जो मानस विकसित हुआ है, उसे पारंपरिकता का हर विचार दकियानूसी लगता है। दुनिया को उदात्तता का पाठ पढ़ाने वाली संस्कृत भाषा को लेकर कोई योजना लाई जाएगी, तो जाहिर है कि इस परंपरा में वह सवाल उठाने का जरिया ही बनेगी। सवाल उठ भी रहे हैं। प्रगतिवादी खेमे के लोग तीर-कमान से लैस होकर सोशल मीडिया पर उतर पड़े हैं। मार्क्सवादी विचारधारा के जाने-माने पत्रकार अनिल सिंह ने इस फैसले के औचित्य पर सवाल ही उठा दिया। उन्होंने सोशल मीडिया पर कहा कि संस्कृत कभी जनभाषा नहीं रही, लिहाजा इस फैसले का क्या मतलब है।
एक सवाल यह भी है कि जब उत्तर प्रदेश में एक भी अखबार संस्कृत में नहीं निकलते तो फिर संस्कृत में प्रेस रिलीज जारी करने का क्या मतलब होगा। यह सच नहीं है कि संस्कृत कभी जनभाषा नहीं रही। भाषा विज्ञान के अध्येताओं को पता है कि संस्कृत का एक स्वरूप लौकिक भी रहा है। कर्नाटक के शिवमोगा जिले के मत्तूर गांव में क्या बच्चा और क्या बूढ़ा, हर कोई संस्कृत में ही बोलता है। ऐसा नहीं कि यहां के लोग कन्नड़ या हिंदी या अंग्रेजी नहीं जानते। लेकिन यहां के लोग आपसी बातचीत के लिए संस्कृत का इस्तेमाल करते हैं। बेंगलुरु से संस्कृत में एक अखबार सुधर्मा प्रकाशित ही होता है। देवभाषा के नाम पर संस्कृत को पठन- पाठन से दूर कर दिया गया। लेकिन यह भी सच है कि भारत की आठवीं अनुसूची में जो 22 भाषाएं हैं, उनमें एक संस्कृत भी है।
अगर उत्तर प्रदेश सरकार के फैसले पर सवाल उठाया जाएगा और उसे स्वीकार भी किया जाएगा तो यह सवाल भी उठेगा कि आखिर उत्तर भारत में सिर्फ संस्कृत पढ़ाने या संस्कृत माध्यम में ज्ञान-विज्ञान की पढ़ाई कराने वाले चार प्रमुख विश्वविद्यालय क्यों काम कर रहे हैं? वाराणसी में संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय कार्यरत है तो बिहार के दरभंगा में महाराजा कामेश्वर प्रसाद संस्कृत विश्वविद्यालय संस्कृत भाषा और माध्यम से पढ़ाई करा रहा है। उत्तराखंड के हरिद्वार में भी संस्कृत विश्वविद्यालय काम कर रहा है। दिल्ली में लालबहादुर शास्त्री संस्कृत विद्यापीठ के साथ ही ओडिशा के पुरी में भी एक संस्कृत विश्वविद्यालय कार्यरत है।
देश में इसके अलावा तकरीबन सभी विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों के साथ ही लाखों स्कूलों में भी संस्कृत पढ़ाई जा रही है। दुनिया के कई विश्वविद्यालयों में भी संस्कृत का अध्ययन-अध्यापन हो रहा है। अकेले जर्मनी के 14 विश्वविद्यालयों में संस्कृत पढ़ाई जा रही है। सवाल यह है कि आखिर इस पढ़ाई का ही क्या औचित्य है? दूरदर्शन और आकाशवाणी पर संस्कृत में समाचार बुलेटिन पहले से ही कार्यरत हैं। वैसे भी प्रथम स्वाधीनता संग्राम से पहले की भारत की शिक्षा व्यवस्था पर ध्यान दें, तो उन दिनों भारत में कार्यरत पांच लाख स्कूलों में से ज्यादातर की पढ़ाई का माध्यम संस्कृत ही था। वैसे दुनिया के ज्यादातर भाषा वैज्ञानिक मानते हैं कि संस्कृत ही अकेली भाषा है, जिसके उच्चारण पर किसी भी इलाके का स्थानीय प्रभाव नहीं पड़ता।
राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद के भाषा विभाग में प्रोफेसर प्रमोद दुबे का मानना है कि दुनिया की सबसे सटीक वैज्ञानिक फोनेटिक भाषा संस्कृत है। भारतीय संस्कृत साहित्य की महत्ता को पश्चिम ने तब समझा, जब जर्मन विद्वान मैक्समूलर ने उसका अध्ययन किया और उसकी जानकारी पश्चिम को दी। दिलचस्प यह है कि भारत का कथित प्रगतिशील समाज भी मैक्समूलर की अवधारणा के बाद ही संस्कृत के प्रति आकर्षित हुआ। संस्कृत भाषा की साहित्यिक परंपरा की खासियत यह है कि वह पश्चिमी साहित्य की अवधारणा रोमांटिसिज्म की खासियत दुखांत की बनिस्बत सुखांत रचनाधर्मी रही है। चूंकि भारतीय साहित्यशास्त्री साहित्य को भी सत्यं, शिवं, सुंदरं की अवधारणा में विश्वास करते थे और साहित्य को जिंदगी को इहलौकिक और आध्यात्मिक रूप से समृद्ध बनाने के पैरोकार थे। इसलिए संस्कृत में दुखांतकारी साहित्य कम मिलेगा।
यह दुर्भाग्य रहा है कि प्रगतिशीलता की अवधारणा में इस अवधारणा को लगातार बिसराया गया। इसका असर यह हुआ कि संस्कृत को लेकर जब भी ऐसे कोई कदम उठाए जाते हैं, जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय जैसे प्रगतिवादी शैक्षिक संस्थान में संस्कृत पढ़ाने की शुरूआत होती है, उस पर सवाल जरूर खड़े होते। योगी आदित्यनाथ सरकार के ताजा फैसले को भी इन्हीं संदर्भों में देखा जाना चाहिए। आधुनिक दौर में भाषाएं राजनीति का औजार भी बन गई हैं। अपने विस्तार और विरोध, दोनों ही स्थितियों में भाषा का आज की राजनीति इस्तेमाल करती है। इसीलिए भाषाओं को लेकर उनकी व्यवहारिकता के सवाल भी उठते हैं। संस्कृत की व्यवहारिकता को लेकर उठ रहे सवालों को इसी नजरिए से देखा जाना चाहिए। भाषाएं कभी मरती नहीं, वक्त की धूल के पीछे कहीं दब जरूर जाती हैं। लेकिन राज्याश्रय और बाजार की कोशिशें उस धूल को साफ करने की प्रक्रिया होती हैं।

योगी सरकार के फैसले से संस्कृत चुनौती बनकर नहीं उभर सकती, क्योंकि उसका स्वभाव साम्राज्यवादी नहीं, समन्वयवादी रहा है।

फिर जब धूल झड़ती है तो वह भाषा अपने पूरे अस्तित्व के साथ चुनौती बनकर उठ खड़ी होती है। लेकिन योगी सरकार के फैसले से संस्कृत चुनौती बनकर नहीं उभर सकती, क्योंकि उसका स्वभाव साम्राज्यवादी नहीं, समन्वयवादी रहा है। लेकिन एक चीज जरूर होगी, वह यह कि इस फैसले के बहाने संस्कृत को जीवंत बनाने की लोकांतरकारी कोशिश होगी, कुछ लोगों को रोजगार मिलेगा। और वह भाषा भी जन-जीवन के बीच नई पहचान के साथ खड़ी होगी, जिसे देवमंत्रों तक ही सीमित कर दिया गया है।



 
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