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मंदिर बनवा सकते थे चंद्रशेखर

30/07/2019

मंदिर बनवा सकते थे चंद्रशेखर

सौरव राय

लोकनायक जय प्रकाश नारायण के पैतृक गांव सिताबदियारा में जन्मे वरिष्ठ पत्रकार व राज्यसभा के उप सभापति हरिवंश नारायण सिंह पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के बेहद करीबी रहे हैं। कुछ समय तक वे चंद्रशेखर के अतिरिक्त मीडिया सलाहकार भी थे। इस समय वे चंद्रशेखर पर लिखी अपनी नई किताब ‘चंद्रशेखर: द लास्ट आइकॉन आॅफ आइडियोलॉजिकल पॉलिटिक्स’ को लेकर चर्चा में हैं। हाल ही में इस पुस्तक का लोकार्पण प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किया। इस किताब व चंद्रशेखर के बहुआयामी व्यक्तित्व को लेकर युगवार्ता के संवाददाता सौरव राय ने उनसे विस्तृत बातचीत की। प्रस्तुत है संपादित अंश:

चंद्रशेखर जी पर कई किताबें है, फिर भी उनके जीवन पर किताब की जरूरत क्यों महसूस हुई?
चंद्रशेखर जी की अंग्रेजी में अब तक कोई मुकम्मल जीवनी नहीं है। इसके पीछे जो वजह मुझे समझ में आती है कि इस देश में जो सामयिक राजनीति पर लिखने वाले बड़े लोग हैं वे सारे अंग्रेजी पृष्ठभूमि के संभ्रांत वर्ग से आते हैं। उन्होंने खासतौर से क्षेत्रीय राजनीति के विभूतियों, जिनका भारतीय राजनीति में बहुत बड़ा योगदान रहा है, उनको तो अपनी पुस्तकों के फुटनोट में भी जगह नहीं दिया है। चंद्रशेखर ही नहीं महामना मदन मोहन मालवीय, आचार्य नरेंद्र देव, संपूर्णानंद, के. कामराज जैसे लोगों को भी सामयिक विषयों पर लिखने वाले बड़े इतिहासकारों ने जगह नहीं दिया। ये वे लोग हैं जिनकी लेखनी की दुनिया में चर्चा होती है। इन्होंने वैसे ही लोगों को तरजीह दी है जो उनकी पृष्ठभूमि के हैं। आप बहुत मुश्किल से उनकी पुस्तकों में इन लोगों का उल्लेख पाएंगे। इसलिए मुझे जरूरी लगा कि चंद्रशेखर का जितना बड़ा योगदान रहा है और उनकी जितनी बड़ी राजनैतिक यात्रा रही है और हिंदी इलाके में इस मामले में भी वे अनोखे हुए क्योंकि सामाजिक-आर्थिक मुद्दों को लेकर देश की राजनीति में डॉ. लोहिया के बाद वे ही माने जाते हैं। मेरा मानना है कि ऐसे व्यक्ति के योगदान को जानबूझकर के नजरंदाज किया गया। क्योंकि वह ऐसी पृष्ठभूमि से थे जो अंग्रेजीपरस्त नहीं थे, किसी संभ्रांत परिवार के नहीं थे, न ही वे ऐसी किसी पृष्ठभूमि से आए थे जो विदेश में पढ़ा हो। इसलिए मेरा यह मकसद था कि इस तरह के कार्यों को समाज के सामने लाया जाए। उनकी जीवनी एक तरह से वैचारिक जीवन की यात्रा है। मैंने इस पुस्तक का नाम दिया है- ‘‘चंद्रशेखर द लास्ट आईकॉन आॅफ इंडियन पॉलिटिक्स’’। जहां तक संभव हुआ हमने इसे इसी अर्थ में रखा है। जिन मुद्दों से उन्होंने राजनीति शुरू की, अंत तक उन्ही मुद्दों को लेकर चले। मैं इस पुस्तक पर पिछले 5 वर्षों से कार्य कर रहा हूं।

 ‘रहबरी के सवाल’ में चंद्रशेखर जी की वैचारिक यात्रा को दर्शाया गया है। इस पुस्तक से आपकी पुस्तक कैसे भिन्न है?
चंद्रशेखर जी को समझने के लिए रामबहादुर राय की पुस्तक ‘रहबरी के सवाल’ बहुत महत्वपूर्ण है। इस पुस्तक को मैं सिर्फ राजनीतिक नहीं एक वैचारिक जीवन वृतांत मानता हूं। चंद्रशेखर जी का राजनीति में जब उदय हुआ था तब वे इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में पढ़ रहे थे। तब उन्होंने जीवन में तय किया कि उन्हें राजनीति में जाना है और वह ऐसे परिवार से आते थे जो गरीब था। उनके जीवन के संघर्ष की कथा को तो लोग जानते ही नहीं हैं उन्हें गरीबी में साथियों के साथ रहना पड़ा, किस तरह की मुसीबत से गुजरना पड़ा। यहां तक कि उनके पास बस के टिकट के लिए पैसे नहीं होते थे। किस तरीके से आॅफिस के कमरे में बर्तन रखकर के उसको धोते थे और फिर पार्टी को मजबूत करने की कोशिश करते थे। इस तरह के संघर्ष उनके जीवन से जुडेÞ हुए थे। जो कोई नहीं जानता है। कैसे उन्होंने आचार्य नरेंद्र देव से मिलकर तय किया कि उन्हें समाजवादी राजनीति करनी है। जब वह बलिया से इलाहाबाद आए और उन्होंने यह तय किया कि उन्हें राजनीति में जाना है तो उस वक्त क्या स्थिति थी। यह सब उनके जीवन का अंजाना दास्तान है जिसे लोग नहीं जानते। जब तक वे राज्यसभा नहीं पहुंचे तब तक वे किन परेशानियों से गुजरे। चंद्रशेखर बलिया पीएचडी करने गये थे। आचार्य नरेंद्र देव ने कहा कि पीएचडी करना छोड़ो, देश बचेगा तब तुम्हारी पीएचडी होगी, इस तरह के कई प्रसंग इस पुस्तक में बताए गये हैं। कांग्रेस के बंटवारे में उनकी निर्णायक भूमिका रही। वी.वी. गिरि राष्ट्रपति चुने गए उसमें सबसे महत्वपूर्ण भूमिका में चंद्रशेखर जी रहे। जब इंदिरा जी का कांग्रेस पर पूरा आधिपत्य हो गया तो उन्होंने उस वक्त इंदिरा जी से कहा था कि हमने जो वादे किए हैं उसकी तरफ हमें लौटना चाहिए वरना लोगों का विश्वास उठ जाएगा। तब भी उनको यह याद दिलाने का साहस अकेले चंद्रशेखर में था। आपको इसकी पूरी दास्तां इस पुस्तक में मिलेगी।

 चंद्रशेखर की राजनैतिक यात्रा के बारे में बताएं जिसे आपने अपनी किताब में अंकित किया है?
बलिया से आचार्य नरेंद्र देव ने जब उन्हें लखनऊ का काम सौंपा और समाजवादी पार्टी बंट गई तो किस तरीके से प्रजा सोशलिस्ट पार्टी (पीएसपी) को पूरे राज्य में घूम-घूम कर खड़ा किया। बस से, गाड़ी से, साइकिल से और पैदल घूमकर अपने परिश्रम से पार्टी को उत्तर प्रदेश में दूसरे नंबर की पार्टी बना दी। घर के लोग तो उन्हें नौकरी करने और गरीबी दूर करने के लिए पढ़ा रहे थे। लोग उन्हें इसलिए पढ़ा रहे थे कि उन्हें नौकरी मिले और जो परिवार की आर्थिक परेशानियां है वह दूर होंगी, परिवार के हालात सुधरेंगे। एक मामूली किसान परिवार की यही सोच होती है। यह सब छोड़ कर के उन्होंने राजनीति में आचार्य नरेंद्र देव के साथ जाना तय किया। उसके बाद वे राज्यसभा पहुंचे। तब से उन्होंने राज्यसभा में कई चीजें ऐसी कहीं जिस पर आजीवन वे बिना डिगे चले। आपको दो -तीन चीजें बताता हूं जो इस किताब में है। पहली चीज उन्होंने कहा, जब मैंने राजनीति को चुना तो एक समाजवादी रास्ता चुना। चन्द्रशेखर, आचार्य नरेंद्र देव से काफी प्रभावित थे। उनकी और लोहिया की पहली मुलाकात, जो बहुत ही दिलचस्प है उसको मैंने इस पुस्तक में विस्तृत रूप से लिखा है। इंदिरा गांधी से जो उनकी मुलाकात है उसका भी दिलचस्प किस्सा है। जब चंद्रशेखर राजनीति में स्थापित नहीं थे तब भी उनमें बात करने की क्षमता और साहस था। लोहिया जी और इंदिरा जी से हुई मुलाकात की बातें यह बताती हैं कि आने वाले चंद्रशेखर कैसे होंगे।


चंद्रशेखर का एक प्रिय शेर था जो हमेशा कहते रहते थे‘‘अके ला हूं तो क्या आबाद कर देता हूं वीराना, बहुत रोएगी शामें तन्हाई मेरे जाने के बाद।’’ इस किस्म के व्यक्ति थे वे और अकेलेपन में भी उसी स्वाभिमान और स्वभाव के साथ जिए। यह ऐसे व्यक्ति की कथा है जो आजीवन सिद्धांत की राजनीति करता है।

 चंद्रशेखर ने शुरुआत समाजवादी राजनीति से की, फिर कांग्रेस में शामिल हो गए। इस वैचारिक यात्रा को कैसे देखते हैं?
बात सही है, लेकिन जब वे राज्यसभा में आए तो उन्होंने कई मांगें उठाई जिसमें बैंकों का राष्ट्रीयकरण, बीमा कंपनियों का राष्ट्रीयकरण, प्रि.वी. पर्स खत्म करने की मांगें, बड़ी पूंजी पर पाबंदी, जो बड़े घराने गलत काम कर रहे हैं उन पर पाबंदी लगे, ऐसे अनेक महत्वपूर्ण सवाल उन्होंने उठाए। इन सवालों को लेकर पीएसपी में अंदरूनी विवाद शुरू हुआ तो उन्हें निकाला गया और वे सात-आठ महीना बिल्कुल अलग रहे। फिर कांग्रेस में गए लेकिन इससे भी महत्वपूर्ण यह है कि वह कांग्रेस में रहते हुए भी उन्हीं मांगों को उठाते रहे जो पीएसपी में उठाया करते थे। उन्हीं के प्रयास से मोनोपोली ट्रेड प्रैक्टिसेज एक्ट बना। उन्होंने भूमि सुधार की बात की। वह किसी गलत बात पर अपनी ही पार्टी के लोगों के भी खिलाफ हो जाते थे। जब वे कांग्रेस में आए थे तो पार्टी 1967 आते-आते नौ राज्यों में हार गई थी। उस कांग्रेस को खड़ा करने में चंद्रशेखर की बड़ी भूमिका थी। उन्होंने कांग्रेस के युवा कार्यकर्ताओं को इकट्ठा किया। उसी दौर में चंद्रशेखर का उदय युवा तुर्क के रूप हुआ। युवा तुर्क बैनर के तले ‘यंग इंडियन’ पत्रिका निकालना शुरू हुई। बैंक का राष्ट्रीयकरण क्यों होना चाहिए, उस पर उन्होंने पूरे देश में एक अभियान चलाया। इन सब में चंद्रशेखर जी निर्णायक भूमिका में रहे, कई क्षेत्रों में तो श्रीमती गांधी से आगे जाकर मुद्दों पर बात करते हुए दिखते हैं। इन चीजों का कहीं वर्णन नहीं है जो युवा तुर्क के रूप में उन्होंने महत्वपूर्ण काम किये थे, वह सब इस किताब में विस्तृत रूप में है।

 किताब के जरिये आपका दावा है कि चंद्रशेखर जी अगर कुछ दिन और प्रधानमंत्री रहते तो राम मंदिर मुद्दा सुलझा देते, यह कितना सत्य है?
यह 100 प्रतिशत सही है। अयोध्या वाला मुद्दा मैंने रामबहादुर जी के हवाले से ही कहा है। जिस समय उनकी सरकार गिरी, उसकी वजह अयोध्या मुद्दा ही था। उनकी सरकार इसलिए गिराई गई क्योंकि चंद्रशेखर जी बहुत कम समय में बहुत अच्छे ढंग से काम करते हुए सफल हो रहे थे। उस वक्त फाइनैंशियल टाइम्स लंदन में लिखा था‘ऐ न अनकंफरटेबली सक्सेसफुल प्राइम मिनिस्टर’। उनकी कम समय में उल्लेखनीय कार्यों को देखकर के यह लिखा गया था और अभी यशवंत सिन्हा की बायोग्राफी आई है उसमें भी यह वर्णन है कि चंद्रशेखर की सरकार क्यों गई। अगर चंद्रशेखर ने राम मंदिर मुद्दा हल कर दिया होता, पंजाब में उग्रवाद नियंत्रित कर लिया होता जिसकी वह बात कर रहे थे। भारत से पाकिस्तान के रिश्ते सुधार लिए होते जिसकी उन्होंने पहल की थी। उस वक्त नवाज शरीफ से उन्होंने अच्छे संबंध स्थापित किए थे। अगर कश्मीर का मुद्दा सुलझा लिया होता तो वह पूर्ण रूप से ऐतिहासिक पुरुष कहलाते। यशवंत सिन्हा ने लिखा है कि उनकी सबसे बड़ी असफलता यह थी कि वह सफल हो रहे थे।

 चंद्रशेखर के साथ हमेशा विवाद क्यों चलता रहा?
इस देश में हमेशा स्पष्ट बात करने वालों के साथ विवाद होता है। जैसे मैं एक आपको उदाहरण देता हूं- देश में कई मुद्दों पर एक आम राजनीतिक व्यक्ति सोचता था उससे वह अलग सोचते थे। वह जानते थे कि इन मुद्दों की कीमत क्या होगी, इस अर्थ में वह एक तरीके से अनूठे राजनीतिज्ञ थे। ‘आॅपरेशन ब्लू स्टार’ के समय देश में शायद वे पहले राजनीतिक व्यक्ति थे जिन्होंने सार्वजनिक तौर पर इंदिरा गांधी से मिलकर कहा था कि यह मत करिएगा। मैंने पंजाब के सिखों का इतिहास बहुत पढ़ा है। इसलिए आप किसी भी हालात में यह कदम न उठाइए। लेकिन इंदिरा जी ने नहीं सुना और परिणाम दुर्भाग्यपूर्ण रहा। लेकिन उस वक्त भी दिल्ली की सड़कों पर निकल कर सिखों को बचाने का काम चंद्रशेखर जी ने किया था। और वह कैसे किया है इसका भी वर्णन है। जब 1984 में चुनाव हुए तो उन्हें ‘बलिया का भिंडरवाला’ कहा गया।

 चंद्रशेखर पर राजनीति के अन्तिम दौर में ट्रस्ट के भ्रष्टाचार के भी आरोप लगे, यह कहां तक सही है?
देश में उनके अंतिम दौर में मीडिया के जरिये दुष्प्रचार चला कि ‘भारत यात्रा’ से उन्होंने कई ट्रस्ट बनाएं और उससे लाखों करोड़ की जमीन के मालिक हो गए। इस पुस्तक में उसका उल्लेख है। एक अपवाद है जब वह मृत्यु शैय्या पर थे तब भले ही परिवार के एक-दो लोग ट्रस्ट में शामिल हो गए। बाकी देश के सारे ट्रस्टों में लोकल लोग ही ट्रस्टी हैं। उनके परिवार का कोई ट्रस्टी नहीं है। इतना ही नहीं मरने से पहले उन्होंने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर कहा कि आप सारे ट्रस्टों को अपने अंदर ले लें। क्योंकि ये सारे ट्रस्ट जनता के पैसे से बने हैं। ट्रस्ट बनाने के पीछे उनका एक ही मकसद था जिसका जिक्र उन्होंने एक यात्रा में किया था कि ये सारे ट्रस्ट एक तरह से वैचारिक पीठ बने। देश में केरल से लेकर दिल्ली तक जहां-जहां यात्रा की, उन राज्यों के विकास का रास्ता क्या होगा। इन जगहों पर स्थानीय लोग विचार-विमर्श करें। एक तरीके से वह इन ट्रस्टों को विचार का केंद्र बनाना चाहते थे। लेकिन उन पर लांछन लगा, उन्होंने कभी इसका जवाब नहीं दिया। इन सारी चीजों का ब्यौरा इस किताब में है।

 आप राज्य सभा के उपसभापति हैं। सांसदों के रवैये को देखते होंगे। क्या कभी चंद्रशेखर की कमी खलती है?
चंद्रशेखर जी की ही नहीं, बल्कि मैं कहना चाहूंगा मैंने संसद के पुराने डिबेट्स को पढ़ा है। जब मैं पत्रकार था उस समय कैसे-कैसे लोग संसद में हुआ करते थे- भूपेश गुप्त, ए.के. गोपालन, ज्योतिर्मय बसु, मधु लिमये, मधु दंडवते, एन.जी. रंगा। कांग्रेस में भी एक से एक दिग्गज थे। समाजवादी पार्टी में भी थे। हर दलों में ऐसे लोग थे जिनके विचारों को संसद में सुनकर लोग सीखते थे। वैसे लोगों का अभाव आज भी सदन में खटकता है और संसद भी उसका हिस्सा है।

 चंद्रशेखर की राजनीति का मूल्यांकन किस प्रकार किया जाना चाहिए?
उसी का प्रयास इस पुस्तक में है। एक व्यक्ति जो किसी एक मुद्दे से राजनीति शुरू करता है और उसी पर जीवन भर यात्रा करता है। जीवन के अंतिम दौर में उनके साथ के सारे बनाए हुए लोग छोड़ कर चले गए। तब भी उसी स्वाभिमान के साथ वह अकेले खड़ा रहे। यह कोई मामूली बात नहीं है। आज मैं आपको बताऊं, बड़े पदों पर रहने वाले लोग जब जीवन के अंतिम समय में अकेले पड़ जाते हैं तो बहुत कमजोर हो जाते हैं। वे किसी भी तरह के समझौते के लिए तैयार हो जाते हैं, लेकिन चंद्रशेखर उन सब में अपवाद थे। चंद्रशेखर का एक प्रिय शेर था जो हमेशा कहते रहते थे-‘‘अकेला हूं तो क्या आबाद कर देता हूं वीराना, बहुत रोएगी शामें तन्हाई मेरे जाने के बाद।’’ इस किस्म के व्यक्ति थे वे और अकेलेपन में भी उसी स्वाभिमान और स्वभाव के साथ जिए। यह ऐसे व्यक्ति की कथा है जो आजीवन सिद्धांत की राजनीति करता है।

 आज देश की राजनीति में चंद्रशेखर की परंपरा का वाहक कौन है?
चंद्रशेखर हमेशा कहते थे कि इतिहास में कोई अंतिम व्यक्ति नहीं होता है। वैसे यह भी सत्य है कि यह सबको भ्रम होता है कि वह इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण इंसान और वह इतिहास का अंतिम व्यक्ति है। चंद्रशेखर अनेक मुद्दों पर सामान्य रूप से अलग सोचते थे। और भी कुछ लोग सोचते होंगे पर उनमें कहने का साहस नहीं था। बलिया में जब भी वे चुनाव में गए किसी के घर प्रचार करने नहीं गए। उन्होंने कहा कि गली, नाली, सड़क और अपराधी को बचाने के लिए फोन करवाने के लिए, आप अगर मुझे वोट दे रहे हो तो आप मुझे वोट मत दीजिएगा। यह उन्होंने सार्वजनिक रूप से कहा था। आज के समय में इतना स्पष्ट बात करने वाले राजनेता नहीं दिखते हैं। अगर वैसा कोई बागी हुआ तो वह जरूर चंद्रशेखर की परंपरा का वाहक होगा।




 
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