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समरस समाज के नायक थे कबीर

16/06/2019

(जन्मदिवस, 17 जून पर विशेष )

मृत्युंजय दीक्षित 
हान संत कवि कबीरदास हिंदी साहित्य के भक्तिकालीन युग में ज्ञानाश्रयी निर्गुण शाखा की काव्यधारा के प्रवर्तक थे। कबीर का जन्म ऐसे समय में हुआ जब भारत में मुगलों का शासन था। हिंदू समाज मुगल शासकों से डरा हुआ तथा धार्मिक आडम्बरों व विधि विधानों से घिरा हुआ था। उन विकट परिस्थितियों में कबीरदास ने अपनी महान रचनाओं के माध्यम से समाज को नई राह दिखाई। संत कबीर उस समय दोनों धर्मों में समान रूप से लोकप्रिय हो गये थे। उनके विचार आज के समय व राजनीति के हिसाब से भी प्रासंगिक हैं। कबीर दोनों धर्मों के आडम्बरों के घोर विरोधी थे। 
कबीर के जीवन के विषय में इतिहासकारों में एकरूपता नहीं है। कबीरदास की जन्मतिथि, जन्मस्थान, उनके माता- पिता तथा उनकी जाति सहित उनकी मृत्यु की वास्तविक तिथि को लेकर गंभीर मतभेद रहे हैं। फिर भी हर साल 17 जून को उनका जन्मदिन मनाया जाता है। कबीर के जन्मस्थान के विषय में तीन मत हैं। मगहर, काशी और आजमगढ़ में बेलहरा गांव। लेकिन यह भी सत्य है कि उन्होंने अपना सारा जीवन काशी के जुलाहे की तरह बिताया। उनके जन्म के विषय में कई प्रकार की दंत कथाएं प्रचलित हैं। एक कथा में कहा जाता है कि वह देवी प्रकाश से पैदा हुए या लहरतारा तालाब में एक पूरे खिले कमल में पाये गये। कभी कहा जाता है कि वे एक ब्राह्मणी की संतान थे। जिसने उन्हें छोड़ दिया था और एक जुलाहा दंपति नीरू और लीमा ने उठा लिया। या फिर वे इसी मुस्लिम दंपति की संतान थे। उनकी कविता में केवल इतना उल्लेख मिलता है कि जब वे छोटे थे तभी उनके माता- पिता मर गए 
उनकी शिक्षा और गुरू परम्परा के भी कई अनुमान हैं। लेकिन यह तो सभी का मानना है कि उन्होंने कहीं विधिवत शिक्षा ग्रहण नहीं की। न ही वे भाषा, दर्शन या अपने कपड़ा बुनने के काम में दीक्षित हुए। कबीर गुरू रामानंद के शिष्य माने जाते हैं। हालांकि दो इतिहासकार डॉ. भंडारकर और डॉ. मोहन सिंह इस बात को नहीं मानते। डॉ. मोहन सिंह का मत है कि वह गुरू शब्द ईश्वर के लिये प्रयुक्त करते थे। उनकी रचनाओं व उपलब्ध साहित्य से यह तो साफ पता चल रहा है कि उनका बचपन बहुत ही गरीबी व कष्ट में बीता था तथा उनको अपने वास्तविक माता -पिता का सुख नहीं मिला था। कबीर की रचनाओं से पता चलता है कि उन्होंने बहुत सारी धार्मिक यात्राएं की। कई बार उन्हें अपने विचारों के कारण अपमानित भी किया गया। उनके खिलाफ साजिशें भी रची गई। 
कबीरदास का व्यक्तित्व और कृतृत्त्व बहुत ही आकर्षक माना गया है। वेदांतीजन उन्हें ब्रह्मज्ञानी, भावुक लोग ईश्वरवादी, कुछ लोग उन्हें पूर्ण ब्रह्म भी कहते हैं। मुस्लिम विद्वान उन्हें सूफी मानते हैं। कबीरदास को समाज सुधारक तथा मानवता का पक्षधर भी माना गया है। उन्हें समाजवादी और आर्यसमाजी भी माना गया है। वह निर्गुणधारा  के प्रवर्तक और संत तो माने ही जाते हैं। डॉ. संपूर्णानंद का कहना है कि कबीर वह हीरा है जिसका हर पहलू चमकदार है। 
अपनी रचनाओें के माध्यम से कबीरदास ने हिंदू और इस्लाम दोनों ही धर्मों की अर्थहीन रूढ़ियों और कर्मकांड की आलोचना और उस पर प्रहार कर दोनों ही धर्मों को पास लाने का प्रयास  किया। वे कट्टर रामभक्त थे। उनके अनुसार राम न तो विष्णु के अवतार थे और न ही कोई व्यक्ति सत्ता। वे निर्गुण निराकार थे। उनके राम मुस्लिमों के रहीम से किसी प्रकार से भिन्न नहीं थे। उनके व्यावहारिक उपदेश कठोर नैतिक आचरणों के पालन पर जोर देते हैं। कबीरदास अंधविश्वास के घोर विरोधी थे। उन्होंने हिंदू समाज में जाति भेद की तीव्र निंदा की। मूर्ति पूजा, अवतारवाद, तीर्थयात्रा एवं पुण्यार्जन हेतु नदियों में स्नान और इसी तरह की विधियों से परलोक में आनंद पाने की धारणाओं के विरोध में कबीरदास ने कड़ी भाषा का प्रयोग किया है। गुरू नानक और अन्य सिख गुरूओं के मन में कबीर के लिये बड़ा आदर था। इसी तरह उन्होंने मुस्लिमों की मस्जिद से चिपके रहने की आदतों तथा सुन्नत, अजान ,नमाज, रोजा की भी जमकर आलोचना की है। 
कबीरदास की दिव्य अनुभव की धारणा मूलतः कर्मप्रधान है। उन्होंने मध्ययुग के जीवन और साहित्य पर प्रभाव डाला। हिंदी में उनके व्यक्तित्व की तुलना भक्ति की दूसरी सगुण शाखा के महान भक्त कवि तुलसीदास से ही की जा सकती है। कबीरदास को अपने जीवनकाल में कोई सम्मान नहीं मिला। तथाकथित निम्न या ओछी जाति में पैदा होने के कारण कबीरदास की उपेक्षा की गई। इस बात के लिए उन्हें उपहास का पात्र भी ठहराया गया। उन्हें शारीरिक दंड भी दिया गया। कुछ लोगों ने उन्हें बेड़ियों में जकड़ा और कुछ लोगों ने उनके दोनों हाथों को पीछे से बांधकर पीटा भी। ऐसा उनके दोहों से पता चलता है। 'कबीर एंड द कबीरपंथ' में हिंदुओं और मुसलमानों, दोनों के द्वारा उत्पीड़न का उल्लेख मिलता है। 
कबीरदास पर वैष्णव भक्ति का गहरा प्रभाव दिखलाई पड़ता है। कई कविताएं ऐसी हैं जिनमें परमात्मा और जीवात्मा के संबंध सूफी रंग में रंगे हैं। कबीर के विचारों के भीतर विरक्ति का तीव्र स्वर है। 
कबीर को सामाजिक और नैतिक सुधार के नाते आज के क्रांतिकारी भी महत्व देते हैं। उन्होंने हिंदू और मुस्लिम दोनों की अंधश्रद्धा को चुनौती दी और उनके ढोंग व झूठ को सिद्ध करने का आह्वान किया। वे यथार्थवादी थे। वे अपने साहित्य में भोग विलास प्रदर्शन के घोर विरोधी थे। वह नशा और जमाखोरी के भी विरोधी थे। 
कबीरदास ने अपनी साहित्य रचना में हिंदी ,उर्दू ,फारसी आदि कई भाषाओं का सम्मिश्रण किया है। साथ  ही साथ अवधि,खड़ी भोजपुरी, पंजाबी, मारवाड़ी आदि का भी प्रचुर प्रयोग किया गया है। उन्होंने सामान्यतः छंदों में ही रचनाएं लिखी हैं। कबीर वास्तव में बहुत ही महान व क्रांतिकारी संत कवि थे। उनके बारे में जितना भी लिखा जाये वह कम ही रहेगा। आज के दूषित राजनीतिक वातावरण में भी कबीरदास के विचार व साहित्व सामाजिक समरता के लिये बहुत ही सार्थक हैं।
(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।) 


 
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