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बिहार की राजनीति फिर चर्चा में

06/08/2019

बिहार की राजनीति फिर चर्चा में


भी छह जुलाई को पटना के मौर्या होटल में हुई राजद कार्यकारिणी की बैठक ने एक बार फिर इस बात पर मुहर लगाई कि अगले वर्ष बिहार विधान सभा का चुनाव तेजस्वी यादव के चेहरे पर ही लड़ा जायेगा। फैसला इतना सहज नहीं लगता। यह तेजस्वी के भाषण के बीच ही उनकी बहन और राज्यसभा सांसद मीसा भारती के उठकर चले जाने से पता चलता है। परिवार में मनमुटाव से जेल में बंद लालू प्रसाद यादव और बाहर राबड़ी देबी बहुत परेशान हैं। इस रार में मीसा भारती तेजप्रताप के साथ खड़ी हैं। पार्टी के वरिष्ठ उपाध्यक्ष और अनुभवी नेता शिवानंद तिवारी का पिछले दिनों दिया तीखा बयान भी बहुत कुछ कह गया। करीब एक महीने से तेजस्वी के निष्क्रिय रहने पर तिवारी ने कहा था कि वे विपक्षी नेता की भूमिका से मुंह न चुराएं। इस पर तेजस्वी कहते हैं कि मैं शेर का बेटा हूं। तिवारी भी चुप नहीं रहे और कहा डाला, शेर को मांद से बाहर निकलने की जरूरत है। लोकसभा चुनाव में राजद को एक भी सीट नहीं मिली। चुनाव बाद से ही लालू यादव के तेजतर्रार बेटे और विधानसभा में विरोधी दल के नेता तेजस्वी यादव का मीडिया की नजरों से ओझल होना चर्चा के केंद्र में आ गया।

बिहार की राजनीति में लालू प्रसाद यादव के परिवार की घटती साख साफ दिखने लगी है। फिर भी दूसरों की राह आसान नहीं दिखती। ऐसे में नीतीश कुमार के अगले कदम पर नजर बनी हुई है।

चर्चा यह भी चली कि तेजस्वी के मन में एक डर समा गया है। उन्हें लगता है कि अपने पिता लालू प्रसाद की तरह आय से अधिक सम्पत्ति के मामले में वे भी फंस सकते हैं। 26 जून से बिहार विधान सभा सत्र के पहले ही दिन नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी सदन से नदारद थे। लंबे समय बाद तेजस्वी पटना आये, तब तक सत्र के 10 दिन बीत चुके थे। कहते हैं कि तेजस्वी ने यह मांग रखी है कि बड़े भाई तेजप्रताप को दल से निकाला जाए। वे तेजप्रताप को ही राजद की बड़ी हार का कारण मानते हैं। करीब 14 वर्षो से लगातार मुख्यमंत्री रहे नीतीश कुमार राजद की अंदरूनी उठापटक पर नजर रखे हुए हैं। उन्होंने मोदी सरकार- 2 में अपने दल को शामिल नहीं किया है। ऐसे में जरूरत पड़ने पर कमजोर राजद के साथ जाने में उन्हें कोई दिक्कत नहीं आएगी। यह सवाल भी हवा में तैर रहा है कि क्या नीतीश कुमार राजद और कांग्रेस के धड़ों को तोड़कर नया समीकरण बनाएंगे? चार दशक से नीतीश की राजनीति पर नजर रखने का अनुभव यह बताता है कि 2020 के मध्य के बाद बिहार विधानसभा चुनाव के ठीक पहले वह कुछ धमाका कर सकते हैं।

नीतीश कुमार ने बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देने की अपनी मांग को ठंडे बस्ते में नहीं डाला है। इस बीच राज्य की जनता से किया हर घर को बिजली देने का वादा उन्होंने पूरा किया है। पूर्ण शराबबंदी से उन्होंने गांव, खासकर महिलाओं का और उन परिवारों का दिल जीता है, जिनका घर शराब के कारण टूट रहा था। नीतीश कुमार की छवि विकास पुरुष और निर्विवाद नेता की है। सभी राजनीतिक दल भी उन्हें एक सुलझा हुआ और नाप-तौल कर बोलने वाला राजनेता मानते हैं। यह जरूर है कि मतदाताओं में उनकी स्वजातीय संख्या इतनी नहीं है कि वे लालू यादव के माई (मुस्लिम-यादव) समीकरण को हरा सकें। फिर भी बिना नीतीश कुमार के न राजद और न ही भाजपा, बिहार बिधान सभा में बहुमत ला सकते हैं। कारण यह भी है कि बिहार में भाजपा का कोई ऐसा क्षत्रप नही है, जिसके नाम पर राज्य का चुनाव लड़ा जाय। लोकप्रिय प्रधानमंत्री मोदी और गृह मंत्री अमित शाह को भी इसका अहसास है। सूत्र कहते हैं कि वे भी तेज और तेजस्वी की लड़ाई के बीच नीतीश की गतिविधि पर नजर रखे हुए हैं। लगता है कि राजद के कुछ वरिष्ठ नेताओं और राज्य कांग्रेस के एक धडे के नीतीश कुमार के संपर्क में रहने की जानकारी भी भाजपा के शीर्ष नेतृत्व को है। बहरहाल, मीडिया नीतीश के धमाके की संभावनाओं पर नजर रखे हुए है।


 
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