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कमल के मध्य ज्योति

07/04/2020

कमल के मध्य ज्योति

क्त भी क्या गुल खिलाता है…अंग्रेजों की गुलामी से मुक्ति के लिए 1857 में जिस क्रांति ने अंगड़ाई ली, उसके संदेश कमल के फूलों के जरिए दिए गए थे…लेकिन तब उसके संदेश को ग्वालियर के मराठा सरदार ने स्वीकार नहीं किया था..लेकिन अब वक्त का चक्र घूम चुका है। उसी मराठा रजवाड़े के चश्म-ओ-चिराग ज्योतिरादित्य सिंधिया ने आजाद भारत में कमल के फूल खिलाने की अहम जिम्मेदारी स्वीकार कर ली है। राजमाता के विशेषण से ताजिंदगी मशहूर रही ज्योतिरादित्य की दादी विजयराजे सिंधिया ने 1967 में ही भारतीय राजनीति में दीपक जलाने का संकल्प ले लिया था । यहां यह बता देना जरूरी है कि भारतीय जनता पार्टी के पूर्ववर्ती संगठन भारतीय जनसंघ का चुनाव निशान दीपक ही था। 30 सितंबर 2001 को माधवराव सिंधिया के निधन के बाद खाली हुई ग्वालियर सीट के उपचुनाव में कांग्रेस उम्मीदवार बनने के बाद से 10 मार्च 2020 तक कांग्रेस के प्राथमिक सदस्य रहे ज्योतिरादित्य सिंधिया के भारतीय जनता पार्टी में शामिल होने से फिलहाल मध्य प्रदेश के ही राजनीतिक समीकरण उलट-पुलट होते नजर आ रहे हैं।

अब मेरा एक ही लक्ष्य होगा और वह है सब के दिलों में जगह बनाना। अब मैं और शिवराज सिंह चौहान एक और एक दो नहीं, ग्यारह हैं। – ज्योतिरादित्य सिंधिया

राजमाता के रक्त ने लिया राष्ट्रहित में फैसला। साथ चलेंगे, नया देश गढ़ेंगे, अब मिट गया हर फासला। ज्योतिरादित्य द्वारा कांग्रेस छोड़ने के साहसिक कदम का मैं आत्मीय स्वागत करती हूं। – यशोधरा राजे सिंधिया

जाहिर है कि चंबल संभाग के कुछ पार्टी कार्यकर्ताओं को छोड़ दें तो ज्योतिरादित्य के आने से मध्य प्रदेश भारतीय जनता पार्टी उत्साह में है। उससे कहीं ज्यादा उत्साह में उनका अपना परिवार है। जनसंघ के जमाने से ही भारतीय जनता पार्टी की प्रमुख स्तंभ उनकी दादी विजय राजे सिंधिया तो रही हीं, उनकी बुआ वसुंधरा राजे सिंधिया और यशोधरा राजे सिंधिया भारतीय जनता पार्टी की कद्दावर नेता हैं। वसुंधरा जहां दो बार राजस्थान की मुख्यमंत्री रहीं, वहीं यशोधरा शिवराज सरकार में मंत्री रहीं।

ज्योतिरादित्य सिंधिया अंतत: भाजपा में शामिल हो गये। कांग्रेस के साथ 18 साल तक रहे ज्योतिरादित्य को आखिर क्यों भाजपा में अपना ठौर तलाशना पड़ा है? क्यों उनके आत्मसम्मान को ठेस पहुंचाने की बार बार कोशिश की जाती रही? क्या अपने अपने बेटों को आगे बढ़ाने के लिए दिग्विजय सिंह व कमलनाथ ने ऐसी परिस्थिति बनाई ताकि मजबूर होकर ज्योतिरादित्य कांग्रेस छोड़ दें? इन्हीं सवालों के ईर्दगिर्द इस बार की आवरण कथा।

भारतीय जनता पार्टी में ज्योतिरादित्य के शामिल होते ही जिस तरह यशोधरा राजे और वसुंधरा राजे ने स्वागत किया है, उससे समझा जा सकता है कि उनका परिवार कितना खुश है। वसुंधरा ने ट्वीटर पर लिखा, आज यदि राजमाता हमारे बीच होतीं तो आपके इस निर्णय पर जरूर गर्व करती। ज्योतिरादित्य ने राजमाता द्वारा विरासत में मिले उच्च आदर्शों का अनुसरण करते हुए देशहित में यह फैसला लिया है, जिसका मैं व्यक्तिगत और राजनीतिक दोनों ही तौर पर स्वागत करती हूं। वहीं यशोधरा ने ट्वीट किया, राजमाता के रक्त ने लिया राष्ट्रहित में फैसला। साथ चलेंगे, नया देश गढ़ेंगे, अब मिट गया हर फासला। (ज्योतिरादित्य) सिंधिया द्वारा कांग्रेस छोड़ने के साहसिक कदम का मैं आत्मीय स्वागत करती हूं। खुश तो वे शिवराज भी हैं, जिनकी अगुआई में मध्य प्रदेश का 2018 में विधानसभा चुनाव लड़ा गया। तब भारतीय जनता पार्टी ने इन्हीं ज्योतिरादित्य पर तंज कसते हुए नारा दिया था, माफ करो महाराज, हमारा नेता शिवराज। शिवराज की खुशी की वजह भी है। इन पंक्तियों के लिखे जाने तक ज्योतिरादित्य सिंधिया के समर्थक 22 कांग्रेस विधायकों ने कमलनाथ सरकार का साथ छोड़ दिया है।

15 माह पहले ही हो गई थी विद्रोह की शुरुआत

17 दिसंबर 2018 को 18 वें मुख्यमंत्री के रूप में कमलनाथ ने भोपाल के जंबूरी मैदान में शपथ ली थी। इस दिन राज्यपाल आनंदीबेन पटेल ने कमलनाथ को मुख्यमंत्री के पद एवं गोपनीयता की शपथ दिलाई। लेकिन शपथ ग्रहण समारोह के पूर्व और विधानसभा के रिजल्‍ट आने के पहले ही जिस तरह से प्रदेशभर में कांग्रेसी नेताओं ने मुख्यमंत्री कमलनाथ के पोस्टर लगाए थे, खासतौर पर प्रदेश कांग्रेस कार्यालय के बाहर इस तरह का पोस्टर लगाया गया था, तभी से ज्योतिरादित्य सिंधिया और कमलनाथ में अंदर ही अंदर खटास पैदा होना शुरू हो गई थी। कांग्रेस के तमाम नेताओं से लेकर प्रदेश की आम जनता भी इस बात की गवाह है कि वर्ष 2018 का चुनाव कांग्रेस ने एमपी में श्रीमंत ज्योतिरादित्य सिंधिया को बतौर मुख्यमंत्री के रूप में सामने रखकर लड़ा था, सबसे अधिक चुनावी सभाएं भी सिंधिया ने की थी। सिंधिया ने ‘‘वक्त है बदलाव का कांग्रेस को वोट दो’’ का जो नारा दिया वह प्रदेश की जनता को इतना अधिक भाया था कि ‘‘माफ करो महाराज अब फिर एक बार शिवराज’’ का नारा भी कहीं न कहीं पीछे छूट गया था, लेकिन जब सत्ता आई तो ज्योतिरादित्य सिंधिया अनुभवी नहीं होने के नाम पर राजनीति में मात खा गए।

115 सदस्यीय कांग्रेस विधायक दल से बाइस विधायकों के कम होने और दो सीटें खाली होने के चलते मध्य प्रदेश की 230 सदस्यीय विधानसभा की प्रभावी संख्या 206 रह गई है। इसके चलते 107 विधायकों वाली भारतीय जनता पार्टी बहुमत में आ गई है। इसका असर यह होगा कि अब  मौजूदा राज्यसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी दो सीटें जीतने में कामयाब रहेगी। उनमें से एक के उम्मीदवार तो अब ज्योतिरादित्य सिंधिया ही हैं। भारतीय जनता पार्टी के अंदरूनी सूत्र बताते हैं कि ज्योतिरादित्य को भारतीय जनता पार्टी की ओर जोड़ने में चंबल संभाग के ही पार्टी के बड़े नेता नरोत्तम मिश्र ने बड़ी भूमिका निभाई है। उन्होंने ही लगातार इसके लिए कोशिश की। सोशल मीडिया पर तो एक खबर यह भी चली कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इशारे पर ज्योतिरादित्य के मित्र जफर इस्लाम ने उन्हें भारतीय जनता पार्टी में शामिल होने के लिए मनाया। वहीं कुछ सूत्रों का कहना है कि प्रधानमंत्री मोदी को मनाने और ज्योतिरादित्य को तैयार कराने में बड़ौदा की महारानी शुभांगिनी गायकवाड़ ने भूमिका निभाई है।

आज यदि राजमाता हमारे बीच होतीं तो आपके इस निर्णय पर जरूर गर्व करती। ज्योतिरादित्य ने राजमाता द्वारा विरासत में मिले उच्च आदर्शों का अनुसरण करते हुए देशहित में यह फैसला लिया है, जिसका मैं व्यक्तिगत और राजनीतिक दोनों ही तौर पर स्वागत करती हूं। – वसुंधरा राजे सिंधिया

यह छिपी हुई बात नहीं है कि शुभांगिनी की प्रधानमंत्री से नजदीकी है। 2014 के चुनाव में प्रधानमंत्री बड़ौदा से भी उम्मीदवार थे। तब उनके प्रस्तावकों में से एक शुभांगिनी देवी भी थी। ज्योतिरादित्य की ससुराल बड़ौदा राजघराने में ही है। वैसे यहां यह भी याद कर लेना चाहिए कि मराठा साम्राज्य के जो तीन बड़े सरदार थे, उसमें से बड़ौदा के गायकवाड़ भी थे। इतिहास की किताबें बताती रही हैं कि मराठा साम्राज्य के दो और बड़े सरदार थे, नागपुर के भोंसले और इंदौर के होल्कर। बहरहाल ज्योतिरादित्य की भाजपा में शामिल होने की घटनाओं के संदर्भ में कहा जा सकता है कि राजतंत्र के रिश्तों ने लोकतंत्र के दौर में भी एक-दूसरे को करीब लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

जिस भारतीय जनता पार्टी की प्रमुख स्तंभ विजय राजे सिंधिया रहीं, उन्हीं के इकलौते बेटे माधवराव सिंधिया ने 1975 में अपनी अलग राह चुन ली थी। जबकि 1971 में पहली बार वे भी जनसंघ के ही टिकट पर चुनाव जीतकर लोकसभा पहुंचे थे। लेकिन आपातकाल के दिनों में माधवराव सिंधिया ने जनसंघ के दीपक की बजाय गाय- बछड़े वाली इंदिरा कांग्रेस का दामन थाम लिया था। राजमाता सिंधिया की आत्मकथा को पढ़ते हुए लगता है कि आपातकाल के दिनों में राजमाता की गिरμतारी के पीछे भी कहीं न कहीं माधवराव का हाथ था। बहरहाल राजमाता और उनके इकलौते बेटे में दूरियां बढ़ती गईं और पूरी जिंदगी बनी रहीं। माधव राव और राजमाता के रिश्ते इतने खराब रहे कि संपत्ति को लेकर मुकदमेबाजी तक हुई। देश की दो बड़ी पार्टियों में सिंधिया परिवार रसूखदार बना रहा। भारतीय जनता पार्टी में जहां राजमाता, वसुंधरा और यशोधरा रहीं, वहीं कांग्रेस में माधवराव सिंधिया बने रहे। शुरू में माधवराव इंदिरा और संजय के करीब रहे, बाद के दिनों में वे राजीव और सोनिया के करीब रहे। 1999 के आम चुनावों में पहली बार अमेठी से चुनाव जीतकर सोनिया लोकसभा पहुंची और नेता प्रतिपक्ष बनीं। तब उनके सहयोग के लिए माधवराव सिंधिया को ही कांग्रेस ने उपनेता प्रतिपक्ष बनाया था। सोनिया ने संसदीय लोकतंत्र की बारीकियां माधवराव के जरिए ही सीखीं।

सत्ता परिवर्तन के खेल में यूं बना इतिहास
मध्य प्रदेश की राजनीति में प्रत्यक्ष और संपूर्ण देश में जिस एक घटनाक्रम का असर बहुत दूर
तक हुआ है, वह अब इतिहास बन चुका है, भारतीय राजनीति में इसे जरूर इस रूप में याद
किया जाता रहेगा कि स्वाभिमान पर जब चोट पर चोट पहुंचती रहे, तो कोई कितना भी धैर्यवान
क्यों न हो वह विद्रोह पर उतर ही आता है। निश्चित ही इस दृष्टि से कांग्रेस से ज्योतिरादित्य
सिंधिया का भारतीय जनता पार्टी में आना वर्ष 2020 की बड़ी राजनीतिक घटनाओं में शुमार हो
चुका है। भविष्य में जब भी मध्य प्रदेश के राजनीतिक इतिहास की बात होगी कोई उन तारीखों
को नहीं भुला पाएगा, जब इतिहास की यह घटना घटी है

ज्योतिरादित्य भी सोनिया के बेटे राहुल गांधी के नजदीकी रहे। ज्योतिरादित्य ने जब होली के दिन मध्य प्रदेश कांग्रेस की होलिका जलाने की शुरूआत की, तब राहुल गांधी कोई प्रतिक्रिया तक नहीं दे पाए। सिर्फ इतना ही कहा कि ज्योतिरादित्य से उनका ऐसा रिश्ता रहा, जिसमें वे कभी-भी मेरे घर आ सकते थे। ज्योतिरादित्य के भारतीय जनता पार्टी में शामिल होने के बाद कांग्रेस से सिंधिया परिवार पर तंज कसने का हथियार छिन गया है। ज्योतिरादित्य शालीन हैं, अच्छी हिंदी और अंग्रेजी बोलते हैं और अपेक्षाकृत युवा नेता हैं। फिर वे राजखानदान से हैं। हमारे देश में लोकतंत्र भले ही 73 साल पहले आ गया। लेकिन यह सच है कि यहां की जनता को राज परिवार अब भी सुहाते हैं। ज्योतिरादित्य अपने शालीन व्यक्तित्व और अपेक्षाकृत युवा होने के चलते युवाओं को लुभाने के लिए भाजपा के कारगर हथियार साबित होंगे। मध्य प्रदेश में भले ही शिवराज के मुकाबले कभी नरेंद्र सिंह तोमर तो कभी कैलाश विजयवर्गीय की चर्चा होती है। लेकिन हकीकत है कि अब भी शिवराज के मुकाबले भारतीय जनता पार्टी के पास मध्य प्रदेश में बड़ा चेहरा नहीं है। लेकिन अब कहा जा सकता है कि शिवराज के मुकाबले भारतीय जनता पार्टी के पास ज्योतिरादित्य जैसी शख्सियत भी है। भाजपा से जुड़े कुछ सूत्र यहां तक दावा करते हैं कि ज्योतिरादित्य के जरिए भारतीय जनता पार्टी शिवराज की राजनीति को संतुलित करने की कोशिश भी करेगी। ज्योतिरादित्य के भारतीय जनता पार्टी में शामिल होने के बाद मध्य प्रदेश में जहां फायदा होगा, वहीं चंबल संभाग के कुछ जमे-जमाए भाजपा नेताओं की परेशानी भी बढ़ेगी।

बजरंग दल के पूर्व अध्यक्ष और अब भाजपा नेता जयभान सिंह पवैया की पूरी राजनीति माधवराव और ज्योतिरादित्य की मुखालफत करते हुए परवान चढ़ी है। लेकिन ज्योतिरादित्य के आने के बाद उनके राजनीतिक कद पर असर पड़ेगा। चंबल संभाग में केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर सबसे बड़े नेता माने जाते रहे हैं। एक दौर में तो उन्हें मध्य प्रदेश भाजपा की तरफ से भावी मुख्यमंत्री के तौर पर भी देखा जाने लगा था। उनकी भी राजनीति ज्योतिरादित्य विरोध पर टिकी है। लेकिन मौजूदा हालात में अब उन्हें ज्योतिरादित्य के और ज्योतिरादित्य को उनके प्रतिद्वंद्वी के तौर पर देखा जाएगा। भारतीय जनता पार्टी के उपाध्यक्ष प्रभात झा का भी कार्यक्षेत्र चंबल संभाग ही रहा है। ज्योतिरादित्य के भाजपा में शामिल होने के बाद उनकी नाराजगी की खबरें भी आईं। यह बात और है कि उन्होंने फौरन इसका खंडन कर दिया। लेकिन यह माना जा सकता है कि उनकी राजनीति पर भी असर पड़ेगा। चंबल संभाग की इन छोटी-मोटी कठिनाइयों पर भारतीय जनता पार्टी देर-सवेर काबू पा लेगी। लेकिन उसकी कोशिश कांग्रेस की जड़ों में मट्ठा डालने की होगी। दिग्विजय और कमलनाथ के पंजे में फंसी कांग्रेस को मात देने के लिए भाजपा को ज्योतिरादित्य फिलहाल बड़े हथियार नजर आ रहे हैं। लेकिन भारतीय जनता पार्टी को भी यह याद रखना होगा कि राज परिवार की महत्वाकांक्षाएं कई बार राजनीति के लिए महंगा सौदा साबित हो जाती हैं। लिहाजा उसे ज्योतिरादित्य की महत्वाकांक्षाओं को संतुलित रखने की कोशिश लगातार जारी रखनी होगी। शायद एक वजह यह भी रही कि वे कांग्रेस अध्य क्ष सोनिया गांधी के इतने पुराने पारिवारिक सदस्यभ नहीं बन पाए थे जितने की कमलनाथ हैं। दूसरी ओर कमलनाथ को पूर्व मुख्यामंत्री दिग्विनजय सिंह का साथ मिलने से वे इतने ताकतवर बनकर उभरे कि जिस चेहरे को आगे रखकर कांग्रेस अपना चुनाव अभियान चलाती है, वह हाशिए पर चला जाता है, और इसके बाद ज्योतिरादित्य सिंधिया को लेकर धीरे-धीरे उपेक्षा का जो दौर शुरू हुआ, वह इतना अधिक हो गया कि सिंधिया के मन में भी उसने अपना घर बना लिया। हर कदम पर ज्योतिरादित्य सिंधिया के आत्मन सम्मान को ठेस पहुंचाने की कोशिश की गई । मुख्यमंत्री, उपमुख्यमंत्री, प्रदेश अध्य्क्ष पद तो छोड़ि‍ए यहां तक कि राज्यूसभा में भेजे जाने को लेकर भी कांग्रेस में सिंधिया के नाम पर कई प्रश्नअ खड़े होने लगे।

पर्दे के पीछे दिग्विजय अपना खेल खेलते रहे और सिंधिया दिन ब दिन कमजोर हो रहे थे, तभी एक खबर आती है कि कांग्रेस के दो दिग्गज दिग्विजय और ज्योतिरादित्य की बंद कमरे में मुलाकात होने वाली है। मुलाकात हुई भी लेकिन किसी बंद कमरे में नहीं सड़क पर। 25 फरवरी 2020 की इस मुलाकात के बाद जैसे प्रदेश में राजनीतिक हलचल तेज हो गई। यह पहला मौका था जब सिंधिया उम्र दराज नेता दिग्विजय से ज्या दा सजग नजर आए। हर हाल में वे अपने स्वाभिमान को बनाए रखने के लिए अपने हक की लड़ाई को अंतिम निष्कर्ष तक ले जाने के लिए अड़े दिखाई दिए।

4 मार्च को गुरुग्राम के होटल में पहुंचे 10 विधायक

प्रदेश की राजनीति में भूचाल तब आया, जब दिग्विजय सिंह ने आरोप लगाते हुए कहा कि बीजेपी ने प्रदेश सरकार को अस्थिर करने की मनसा से कांग्रेस के 6, बसपा के 2 (एक निलंबित) और एक निर्दलीय विधायक को गुड़गांव के आईटीसी मराठा होटल में बंधक बनाया है। इसके बाद उसी रात भोपाल से मंत्री जीतू पटवारी और जयवर्धन सिंह को दिल्ली भेजा जाता है और दूसरे दिन दोपहर 6 विधायक भोपाल पहुंचते हैं। इनमें सपा के राजेश शुक्ला (बब्लू), बसपा के संजीव सिंह कुशवाह, कांग्रेस के ऐंदल सिंह कंसाना, रणवीर जाटव, कमलेश जाटव और बसपा से निष्काषित राम बाई हैं। लेकिन इनमें कांग्रेस के बिसाहूलाल, हरदीप सिंह डंग, रघुराज कंसाना और निर्दलीय सुरेंद्र सिंह शेरा की कोई लोकेशन नहीं मिलती, दिग्विजय फिर आरोप लगाते हैं कि भाजपा ने 4 विधायकों को जबरन गुड़गांव से बेंगलुरु शिμट किया है। लेकिन कांग्रेस के लगाए सभी आरोप तब फुस्स साबित हुए जब भोपाल लाए गए सभी विधायक एक स्विर में कह देते हैं कि उन्हें भाजपा ने नहीं बंधक बनाया था वे तो अपने ही काम से गए थे । दूसरी ओर भाजपा का बयान आता है, कमलनाथ सरकार संकट में है, अभी 15 और विधायक उनके संपर्क में हैं। भाजपा नेता नरोत्तम मिश्रा का दावा- कांग्रेस के 15 से 20 विधायक मेरे संपर्क में हैं। अगर हमारे पास कोई आता है तो क्या उसे भगा दें।


 
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