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हाउडी मोदी की उपलब्धि

05/10/2019

हाउडी मोदी की उपलब्धि

बनवारी

हाउडी मोदी कार्यक्रम में जिस एकजुटता और सक्रियता से प्रवासी भारतीयों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का समर्थन किया, उसने भारत की प्रतिष्ठा को और नरेंद्र मोदी के नेतृत्व को एक नई ऊंचाई पर पहुंचा दिया। उसने डोनाल्ड ट्रम्प तक को चकित किया।

अमेरिका में रह रहे प्रवासी भारतीयों की ओर से ऐसे समय हाउडी मोदी का आयोजन किया गया था, जो राजनयिक रूप से हमारे लिए सबसे कठिन समय था। पिछले सात दशकों में पहली बार भारत ने अनुच्छेद 370 को रद्द करके पाकिस्तान से इसको अंतरराष्ट्रीय विवाद बनाए रखने का अधिकार छीन लिया। साथ ही जम्मू-कश्मीर के उन मुस्लिम नेताओं के सामने अस्तित्व का संकट पैदा कर दिया, जो इस अनुच्छेद की ओट लेकर कश्मीर घाटी और जम्मू के कुछ क्षेत्रों में अपने राजनैतिक स्वार्थों की पूर्ति के लिए निरंतर अलगाव भड़काते रहे। पाकिस्तान और चीन संयुक्त राष्ट्र से लेकर मुस्लिम और गैर-मुस्लिम सभी देशों पर दबाव डालने में लगे हुए थे कि भारत को अपना यह कदम लौटाने के लिए मजबूर किया जाए।
भारत ने पिछले एकदो दशक में जो अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा अर्जित की है, उसके कारण पाकिस्तान और चीन की इस मुहिम को सफलता नहीं मिली। लेकिन भारत का मुखर समर्थन करने के लिए भी अधिक देश आगे नहीं आ रहे थे। अमेरिका ने शुरू से ही इसे भारत का आंतरिक मामला बताकर भारत को दो टूक समर्थन दिया था, लेकिन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प का कश्मीर समस्या पर मध्यस्थता करने का बार-बार आने वाला प्रस्ताव हमारे लिए समस्या बना हुआ था। इन स्थितियों के बीच हाउडी मोदी कार्यक्रम आयोजित हुआ।
उसमें जिस एकजुटता और सक्रियता से प्रवासी भारतीयों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का समर्थन किया, उसने भारत की प्रतिष्ठा को और नरेंद्र मोदी के नेतृत्व को एक नई ऊंचाई पर पहुंचा दिया। उसने डोनाल्ड ट्रम्प तक को चकित किया। यह साधारण उपलब्धि नहीं है। उससे अंतरराष्ट्रीय राजनीति में भारत का कद बढ़ा है और भारत के खिलाफ पाकिस्तान और चीन की मुहिम को गहरा धक्का लगा है। हाउडी मोदी कार्यक्रम की यह बड़ी सफलता है कि नरेंद्र मोदी के सम्मान में आयोजित किए गए इस कार्यक्रम में अमेरिकी राष्ट्रपति को सम्मिलित होने की इच्छा हुई। इस कार्यक्रम के दौरान डोनाल्ड ट्रम्प और नरेंद्र मोदी ने एक-दूसरे की जिस तरह प्रशंसा की, वह राजनय के सामान्य शिष्टाचार और मर्यादा से कुछ अधिक थी।
भारत में मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने नरेंद्र मोदी द्वारा इस कार्यक्रम में दिए गए भाषण में अबकी बार ट्रम्प सरकार कहे जाने पर आपत्ति की है। सामान्य स्थितियों में यह आपत्ति उचित ही लगती, लेकिन नरेंद्र मोदी का यह कथन डोनाल्ड ट्रम्प को प्रसन्न करने मात्र के लिए नहीं था। यह स्पष्ट है कि भारत के विदेश नीति निर्धारित करने वाले प्रतिष्ठान में यह धारणा बनी है कि अमेरिका के अगले राष्ट्रपति चुनाव में डोनाल्ड ट्रम्प के दोबारा जीतकर राष्ट्रपति बनने की अधिक संभावना है। इस समय की अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों में अपने हितों की रक्षा के लिए भारत उन पर दांव लगा सकता है। इस धारणा के आधार पर ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने डोनाल्ड ट्रम्प के चुनाव अभियान को अपना संबल प्रदान किया है। अमेरिका में रह रहे भारतीय समुदाय का बहुलांश रिपब्लिकन पार्टी का नहीं डेमोक्रेटिक पार्टी का समर्थन करता है। यह जानते हुए भी नरेंद्र मोदी ने डोनाल्ड ट्रम्प के खुले समर्थन का जोखिम उठाया है।
उसका डोनाल्ड ट्रम्प को सचमुच कोई लाभ होगा या नहीं, हम नहीं जानते। लेकिन नरेंद्र मोदी की रणनीति का तात्कालिक लाभ भारत को मिलता दिख रहा है। यह साधारण बात नहीं है कि अमेरिकी राजनीति में भारतीयों का कद और उनकी शक्ति इतनी ऊंची आंकी जा रही है कि अमेरिकी राष्ट्रपति भारत के प्रधानमंत्री से अपनी दोस्ती को अपनी राजनैतिक पूंजी की तरह दिखा रहे हैं। डोनाल्ड ट्रम्प का बार-बार यह दोहराना निश्चय ही महत्वपूर्ण है कि अमेरिका के व्हाइट हाउस में वे भारत के सबसे बड़े हितैषी है। यह सब जानते हैं कि अमेरिका से निकटता से जितने लाभ है, उतना ही जोखिम भी है। सभी महाशक्तियां आत्मकेंद्रित होती हैं।
अंतरराष्ट्रीय संबंधों में वे अपने राष्ट्रीय हित ही सबसे आगे रखती हैं और उनके निकटवर्ती देशों को इसकी काफी कीमत चुकानी पड़ती है। डोनाल्ड ट्रम्प ने राष्ट्रपतित्वकाल में केवल चीन और ईरान पर ही दबाव नहीं बनाया। अमेरिका के सदा के सहयोगी यूरोपीय देशों के साथ जापान आदि देशों को भी काफी अमेरिकी दबाव झेलना पड़ रहा है। डोनाल्ड ट्रम्प के कार्यकाल में पाकिस्तान को भी अपने आतंकवादी तंत्र के कारण काफी अमेरिकी दबाव झेलना पड़ रहा है। लेकिन अमेरिका अफगानिस्तान से हाथ खींचने के लिए उसका सहयोग भी चाहता है। अपने सहयोग के बदले पाकिस्तान कश्मीर के मामले में अमेरिकी समर्थन मांगता रहा है।
वह निरंतर कोशिश करता रहा है कि भारत कश्मीर पर उससे बातचीत करने के लिए फिर से तैयार हो जाए। वह अमेरिका को मध्यस्थ बनाने की कोशिश में भी लगा रहा है। हाउडी मोदी कार्यक्रम के बाद भी वह डोनाल्ड ट्रम्प और इमरान खान की मुलाकात के समय यह कहलवाने में सफल हो गया कि डोनाल्ड ट्रम्प मध्यस्थ होने के लिए तैयार हैं बशर्तें भारत उसके लिए हामी भर दे। यह समझना कठिन नहीं है कि भारत द्वारा अनेक बार यह घोषित करने के बावजूद कि वह भारत और पाकिस्तान के बीच विवाद में किसी तीसरे पक्ष की भूमिका नहीं देखता अमेरिकी प्रतिष्ठान प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से यह दबाव बनाता रहा है कि भारत डोनाल्ड ट्रम्प की मध्यस्थता के लिए तैयार हो जाए।
भारत इस दबाव के सामने बिना झुके अमेरिका को अपना पक्ष समझाने और स्वीकार करने के लिए तैयार कर पाया यह नरेंद्र मोदी के नेतृत्व की बड़ी सफलता है। इसमें अमेरिका के प्रवासी भारतीयों का कम योगदान नहीं है। यह अंतरराष्ट्रीय दबाव कितने घातक हो सकते हैं, यह हम ताशकंद समझौते के दौरान देख चुके हैं। यह सबको मालूम था कि 1965 में युद्ध का आरंभ भारत ने नहीं पाकिस्तान ने किया था। 1964 में जवाहर लाल नेहरू की मृत्यु के बाद अयूब खां को यह गलतफहमी हो गई थी कि अब भारतीय नेतृत्व कमजोर हो गया है और इस समय पाकिस्तान सैनिक आक्रमण के द्वारा भारत से कश्मीर छीन सकता है।
लेकिन लाल बहादुर शास्त्री की दृढ़ता के कारण पाकिस्तान की कोई चाल सफल नहीं हुई। युद्ध अनिर्णित अवश्य रहा, लेकिन भारतीय सेना अपने पराक्रम से पाकिस्तान का अधिक भू-भाग अपने नियंत्रण में लेने में सफल हो गई। संयुक्त राष्ट्र के हस्तक्षेप और अमेरिका व सोवियत रूस के दबाव के कारण युद्ध रुका और उसके बाद ताशकंद में कोसिगिन की उपस्थिति में लाल बहादुर शास्त्री और अयूब खां के बीच समझौता वार्ता चली। उस वार्ता के दौरान मुख्यत: सोवियत रूस के दबाव के कारण हमें युद्ध में जीते इलाके पाकिस्तान को लौटाने पड़े। दूसरी तरफ न पाकिस्तान को आगे युद्ध न छेड़ने की घोषणा के लिए मजबूर किया गया और न कश्मीर में अपनी गुरिल्ला कार्रवाईयां बंद करने के लिए। समझौते पर हस्ताक्षर करने के बाद ताशकंद में ही प्रधानमंत्री लाल बहादुर की मृत्यु हो गई।
आज तक उनकी मृत्यु के रहस्य से पर्दा नहीं उठ पाया। 1971 के बांग्लादेश युद्ध के समय जो अमेरिकी दबाव था, उसको निरस्त करने के लिए ही भारत को सोवियत रूस से मैत्री संधि करनी पड़ी थी। आज हमारा नेतृत्व अधिक मजबूत है और भारत की अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा कहीं अधिक है, जिससे कि हम कश्मीर पर मध्यस्थता के लिए अमेरिकी दबाव का सामना कर पा रहे हैं। अब तक पाकिस्तान अपनी हर कोशिश में असफल हुआ है। अंतरराष्ट्रीय राजनीति में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बढ़े हुए कद ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान का कद बौना कर दिया है। अंतरराष्ट्रीय राजनीति में भारत की बढ़ी हुई प्रतिष्ठा के लिए निश्चय ही सबसे अधिक श्रेय हमारे राजनैतिक नेतृत्व को दिया जाना चाहिए। लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की प्रतिष्ठा बढ़ाने में प्रवासी भारतीयों का योगदान को भी अनदेखा नहीं किया जा सकता है। यह याद रखना आवश्यक है कि भारत को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक तेजी से उभरती हुई शक्ति सिद्ध करने में सबसे बड़ी भूमिका उन भारतीय सॉμटवेयर इंजीनियरों की है, जिन्होंने सिलिकॉन वैली के माध्यम से आधुनिक प्रौद्योगिकी के इस विशेष क्षेत्र में पूरी दुनिया को भारतीय प्रतिभा का लोहा मानने के लिए मजबूर कर दिया।
उसके बाद बहुराष्ट्रीय कंपनियों में भारतीय मूल के प्रबंधकों की जैसे बाढ़ ही आ गई। आज अमेरिकी राजनीति में भी प्रवासी भारतीय अपना अच्छा-खासा दखल बनाने में सफल हो रहे हैं। अगले राष्ट्रपति पद के चुनाव में भारतीय मूल की दो उम्मीदवार दलीय नामांकन पाने की दौड़ में है। अमेरिका में बसे भारतीयों की संख्या मुश्किल से 45 लाख है और वे अमेरिकी जनसंख्या का सवा प्रतिशत से अधिक नहीं है। उनमें से दो तिहाई डेमोक्रेटिक पार्टी के समर्थक माने जाते हैं। इन सबके बाद भी उन्हें प्रभावित करने के लिए रिपब्लिकन पार्टी के डोनाल्ड ट्रम्प को सब राजनीतिक मयार्दाएं लांघकर हाउडी मोदी कार्यक्रम में आने की इच्छा हुई, यह प्रवासी भारतीयों की शक्ति का ही परिचायक है। ब्रेन-ड्रेन का हल्ला मचाकर प्रवासी भारतीयों की काफी समय तक उपेक्षा की जाती रही।
लेकिन हमें यह याद रखना चाहिए कि कुछ शताब्दियों पहले तक हमारा दुनियाभर में सांस्कृतिक विस्तार था। वह किसी सैनिक अभियान का प्रतिफल नहीं था। हमारे व्यापारिक पुरुषार्थ और धार्मिक-सांस्कृतिक प्रभाव का ही परिणाम था। आज हमारा राजनैतिक प्रतिष्ठान प्रवासी भारतीयों का महत्व समझ रहा है और भारत की प्रतिष्ठा बढ़ाने में उनके योगदान को स्वीकार कर रहा है। यह संतोष की बात है।


 
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