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भारतीय बौद्धिक-बहादुरों की अभारतीय करामात

28/10/2019

मनोज ज्वाला

मुट्ठीभर अंग्रेज इंग्लैण्ड से कई गुणा विशाल भारत पर शासन करने में इसी कारण सफल हो पाए, क्योंकि उनकी सेना और पुलिस में 90 प्रतिशत से अधिक लोग भारतीय थे। छल-छद्म की रीति व कुटिल कूटनीति से भारतीय राजाओं-रजवाड़ों का सहयोग-समर्थन और अंग्रेजी पढ़े-लिखे लोगों के अंग्रेज-परस्त प्रशिक्षण से निर्मित जन-मन में अंग्रेज-नस्ल की श्रेष्ठता का भाव भरकर यहां शासन व विभाजन करने में सफल रहे वे लोग आजाद भारत को भी अपनी उसी नीति से शासित व विभाजित करने में लगे हुए हैं। इसके लिए अब वे औपनिवेशिक सेना-पुलिस के भारतीय जवानों का नहीं, बल्कि शैक्षणिक-अकादमिक संस्थानों के भारतीय 'बौद्धिक बहादुरों' का इस्तेमाल कर रहे हैं।
भारत के प्राचीन शास्त्रों-ग्रन्थों के ईसाई-हितपोषक औपनिवेशिक अनुवाद हों या आर्यों के पश्चिमी-विदेशी मूल के होने का बेसुरा-बेतुका राग, नस्ल-विज्ञान का गोरी चमड़ी की कपोल-कल्पित श्रेठता-विषयक प्रतिपादन हो या संस्कृत को ग्रीक व लैटीन से निकली भाषा बताने वाले भाषा-विज्ञान का अनर्गल प्रलाप, इन सब प्रायोजित अवधारणाओं को भारतीय जन-मानस पर थोपने और इससे अपना उल्लू सीधा करने में वेटिकन चर्च के पश्चिमी रणनीतिकार भारत के बुद्धिजीवियों का खूब इस्तेमाल करते आ रहे हैं। इसी तरह से लोकतंत्र, समता, स्वतंत्रता, मानवाधिकार, धर्म, सहिष्णुता, असहिष्णुता, आस्था-विश्वास आदि तमाम विषयों को स्वयं के हित-साधन और भारत के विखण्डन की कूटनीति से परिभाषित करने और फिर उस परिभाषा के अनुसार अपनी योजनाओं को हमारे ऊपर थोपने के लिए भी उन्होंने भारतीय बौद्धिक-बहादुरों की ही फौज कायम कर रखी है।
'दलित फ्रीडम नेटवर्क' से सम्बद्ध ऐसे ही एक बौद्धिक-बहादुर का नाम है कांचा इलाइया, जो भारत में मानवाधिकारों की वकालत करते हैं। वे भारत की प्राचीन भाषा-साहित्य को दलित-अधिकारों के मार्ग में सबसे बड़ा बाधक बताते हुए 'संस्कृत' की हत्या कर देने का हास्यास्पद बौद्धिक विष-वमन करते रहे हैं। चर्च मिशनरियों के प्रचार-तंत्र से बहुप्रचारित इनकी पुस्तक 'ह्वाई आई एम नॉट ए हिन्दू' में सनातन धर्म की ऐसी ही अनर्गल व्याख्या की गई है। इस पुस्तक पर कांचा को डी.एफ.एन. ने 'पोस्ट डॉक्टोरल फेलोशिप' प्रदान किया है। भारत में राजीव गांधी फाउंडेशन द्वारा इसे प्रायोजित किया गया है। इस पुस्तक में कांचा इलाइया के द्वारा सनातन धर्म की तुलना जर्मनी के नाजीवाद से की गई है और इसे आध्यात्मिक फासीवाद के रूप में वर्णित किया गया है। हिटलर की तानाशाही के लिए भी सनातन धर्म को जिम्मेवार ठहराया गया है, क्योंकि वह जर्मन तानाशाह बड़े शौक से सनातन-धर्म के एक प्रतीक-चिह्न (स्वास्तिक) का इस्तेमाल किया करता था और स्वयं को 'आर्य' कहा करता था। 'पोस्ट हिन्दू इण्डिया' नामक अपनी पुस्तक में कांचा ने हिन्दू (सनातन) धर्म के विरुद्ध एक नस्लवादी सिद्धांत गढ़ते हुए लिखा है कि 'हिन्दू समाज में ब्राह्मण पशुओं से भी बदतर हैं, क्योंकि उनके मामले में पशु-वृति भी अल्प-विकसित है'। इतना ही नहीं, यह बौद्धिक बहादुर वेटिकन चर्च-पोषित अपनी बौद्धिकता के बूते भारत के बहुसंख्यक समाज में सामुदायिक घृणा का विष-वमन करते हुए दलितों को गृहयुद्ध के लिए भड़काता है और कहता है कि 'ऐतिहासिक रूप से अगड़ी जातियों ने पिछड़ी जाति के लोगों को हथियारों के बल पर दबाया है। जैसा कि हिन्दू देवी-देवताओं का स्रोत हथियारों के उपयोग की संस्कृति में जड़ जमाये हुए है। भारत में गृह-युद्ध की अगुवाई करने की क्षमता दलितों में है, जिन्हें ईसाइयों का भी साथ मिलेगा। क्योंकि, भारतीय दलित ईसा मसीह को सर्वाधिक शक्तिशाली मुक्तिदाता के रूप में पाते हैं'। भारत में गृहयुद्ध की परिस्थितियां निर्मित करने और इसके आंतरिक मामलों में यूरोप-अमेरिका के हस्तक्षेप का आधार व औचित्य गढ़ने की बाबत वेटिकन-चर्च-पोषित संस्थाओं से दौलत-शोहरत हासिल करते रहने की कीमत पर अपनी बौद्धिकता का डंडा भांजने वालों में और भी कई नाम हैं।
रोमिला थापर ऐसा ही एक बहुचर्चित नाम हैं। वह जोरदार तरीके से यह लिखती-कहती हैं कि सम्पूर्ण भारतीय सभ्यता और भारतीय राज्य-व्यवस्था दबदबा रखने वाले जातीय समूहों द्वारा नियंत्रित दमनकारी उपकरणों के अतिरिक्त कुछ नहीं है, जिन्हें ध्वस्त कर देने की आवश्यकता है। इसी तरह से मीरा नंदा नामक बौद्धिक बायो-टेक्नोलाजिस्ट हैं, जो प्रचारित करती हैं कि भारतीय संस्कृति विज्ञान-विरोधी है। 'टेम्पलटन फाउंडेशन' से दौलत और शोहरत हासिल करती रहनेवाली यह महिला जब वेदों की वैज्ञानिकता का मुकाबला नहीं कर पाती तब 'कॉलिंग इण्डियाज फ्री थिंकर्स' (भारत के मुक्ति-चेताओं को बुलावा) नामक पुस्तक लिखकर उसमें स्वामी विवेकानंद और दयानंद पर यह आरोप लगाती है कि उन्होंने सनातन हिन्दू-वैदिक धर्म को विज्ञान- सम्मत प्रतिपादित करने का 'आधारभूत पाप' किया है।
भारत-विरोधी पश्चिमी षड्यंत्रकारी संस्थाओं ने भारतीय धर्म-दर्शन से जुड़े कुछ भारतीय बुद्धिजीवियों पर न जाने कैसा 'जादू' किया है कि वे 'रंगे सियारों' की तरह दिखते कुछ और बोलते कुछ हैं। सनातन धर्म को ही भारत की राष्ट्रीयता घोषित करने वाले महर्षि अरविन्द के भारतीय दर्शन को प्रोत्साहित करने हेतु अमेरिका के सैन-फ्रान्सिस्को स्थित 'कैलिफोर्निया इंस्टीट्यूट ऑफ इंटीग्रल स्टडीज' में स्थापित एक संकाय से सम्बद्ध कंगना चटर्जी की बौद्धिकता ऐसी ही है, जो भारत की सनातन वैदिक संस्कृति के तथ्यों को दलितों के दमन का षड्यंत्र प्रमाणित करने और भारत की सरकारी मिशनरियों एवं हिन्दू-संगठनों को अल्पसंख्यकों के मानवाधिकारों का हननकर्ता सिद्ध करने के लिए अपना ज्ञान बघारते रहती हैं। कश्मीर के श्रीनगर में 'इंटरनेशनल पीपुल्स ट्रिब्यूनल ऑन ह्यूमन राइट्स एण्ड जस्टिस इन इण्डियन एडमिनिस्टर्ड कश्मीर' नामक संस्था कायम कर मानवाधिकारों की स्थिति का अध्ययन-अनुसंधान करने-कराने वाली चटर्जी की इस अनैतिक बौद्धिकता को कश्मीरी समाचार पोर्टल चलाने वाले एक पत्रकार-सम्पादक मोहम्मद सादिक ने भारतीय सुरक्षा-बलों के विरुद्ध घृणा को हवा देने वाली और इस्लामी आतंकियों के हाथों की कठपुतली करार दिया है। मोहम्मद साहब ने कंगना की इस बौद्धिक बहादुरी पर सवाल किया है कि उसने मानवाधिकार-अनुसंधान का केन्द्र भारतीय सीमा-क्षेत्र वाले कश्मीर को ही क्यों बनाया है? पाकिस्तानी कब्जे वाले कश्मीर को अपने अध्ययन की परिधि से बाहर क्यों रखा है?
विदेशों में पढ़नेवाले भारतीय विद्यार्थियों को भारत-विरोधी बौद्धिक जोर जबरदस्ती के इस अभियान में शामिल करने की बाबत अमेरिका-स्थित हार्टफोर्ड के ट्रिनिटी कालेज के अन्तरराष्ट्रीय अध्ययन संकाय निदेशक विजय प्रसाद नामक बुद्धिबाज काफी सक्रिय हैं, जो अपने कार्यों से यह प्रमाणित करने में लगे हुए हैं कि भारत के दलित-अछूत-आदिवासी अफ्रीका मूल के हैं और सनातन-वैदिक-हिन्दू धर्म फासीवादी व नस्लवादी है। इस कारण भारत में धार्मिक स्वतंत्रता व मानवाधिकार संकटग्रस्त है।
विदेशी पैसों पर पल रहे इन बौद्धिक बहादुरों की फेहरिस्त में सेंड्रिक प्रकाश, टिमोथी शाह, जान प्रभुदोष, राम पुनयानी, जान दयाल, सीलिया डुग्गर, तीस्ता सीतलवाड़ आदि अनेक नाम हैं, जो जैसे-तैसे यह प्रमाणित करने में लगे हुए हैं कि भारतीय सनातन हिन्दू वैदिक धर्म के कारण भारत में दलितों व अल्पसंख्यकों की धार्मिक स्वतंत्रता तथा उनके मानवाधिकार और लोकतंत्र खतरे में है। इनकी रक्षा के लिए दुनिया की हवलदारी करने वाले अमेरिका और संयुक्त राष्ट्र संघ को हस्तक्षेप करना चाहिए। इस प्रसंग में सबसे चिन्ताजनक बात यह है कि अंग्रेजों के ईसाई-विस्तारवाद और नये औपनिवेशिक साम्राज्यवाद के इस संयुक्त षड्यंत्र का क्रियान्वयन करने वाली फौज में अपने देश के ही 'अभारतीय' सोच वाले भारतीय बौद्धिक बहादुर शामिल हैं, जिनके काले  करामातों से हमारा राष्ट्रीय जीवन कलुषित होता जा रहा है। दूसरी ओर, अंतरराष्ट्रीय मंचों पर आए दिन अपने देश को रक्षात्मक रुख अपनाना पड़ता है।
(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)


 
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