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अपनों के निशाने पर गहलोत सरकार

06/11/2019

रमेश सर्राफ धमोरा

राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत इन दिनों अपनी ही पार्टी के नेताओं के निशाने पर आ गए हैं। कुछ दिनों पहले गहलोत सरकार ने प्रदेश में नगरीय निकाय चुनाव में हाईब्रिड फार्मूला लागू किया था उसको लेकर प्रदेशभर में बवाल मचा था। राजस्थान कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष व उप मुख्यमंत्री सचिन पायलट ने मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के उस फार्मूले का डटकर विरोध किया था। परिवहन मंत्री प्रताप सिंह खाचरियावास, खाद्य आपूर्ति मंत्री रमेश मीणा, सहकारिता मंत्री उदयलाल आंजना सहित कांग्रेस के कई विधायकों ने भी सरकार के फैसले को जन विरोधी बताते हुए पायलट का समर्थन किया था।
सचिन पायलट का कहना था कि कांग्रेस विधायक दल की बैठक में या कैबिनेट की मीटिंग में ऐसा कोई प्रस्ताव नहीं लाया गया था। यहां तक कि प्रदेश कांग्रेस कमेटी को भी इस बाबत कोई जानकारी नहीं दी गयी थी। ऐसे में जन विरोधी फैसले को राज्य में कैसे लागू होने दिया जा सकता है? पायलट के मुताबिक इस फार्मूले से तो कोई व्यक्ति बिना चुनाव लड़े ही पैसों के बल पर नगरीय निकायों का प्रमुख बन जाएगा। फिर वर्षों से पार्टी में काम करने वाले कार्यकर्ताओं का क्या होगा? उस वक्त मुख्यमंत्री अशोक गहलोत व स्वायत्त शासन मंत्री शांति धारीवाल ने हाईब्रिड फार्मूले का बचाव भी किया था। अंतत: मामला कांग्रेस आलाकमान के पास दिल्ली तक पहुंचा और गहलोत को अपना फैसला वापस लेना पड़ा।
हाल ही में गहलोत सरकार ने निजी वाहनों को टोल टैक्स से दी गई छूट को वापस लेने का निर्णय किया है। इसका भी कांग्रेस सहित सभी दलों में विरोध हो रहा है। नगरीय निकायों के चुनाव से पहले टोल टैक्स लागू करने के फैसले का कांग्रेस को खामियाजा उठाना पड़ सकता है। अपने फैसले का बचाव करते हुए गहलोत ने कहा है कि टोल टैक्स की छूट निजी वाहन चलानेवालों को दी जा रही थी जो टैक्स टोल टैक्स चुकाने में सक्षम हैं। भाजपा की पूर्ववर्ती सरकार द्वारा टोल टैक्स में दी गई छूट नियम विरुद्ध है। इसलिए राज्य सरकार ने इसे फिर से लागू करने का फैसला किया है।
इसी तरह अक्टूबर 2018 में वसुंधरा राजे सरकार ने प्रदेश के किसानों को उनके कृषि कुओं के बिजली बिलों में 833  रुपये प्रतिमाह का अनुदान देने का निर्णय किया था। उसमें अब बिजली कंपनियों के अधिकारी दिक्कत पैदा करने लगे हैं। बिजली विभाग के अधिकारियों का कहना है कि कृषि उपभोक्ता पहले बिजली का पूरा बिल चुकाएं। फिर अनुदान की राशि उनके बैंक खाते में भेजी जाएगी। दिक्कत यह है कि प्रदेश में कई किसानों की भूमि का नामांतरण नहीं हुआ है तो कई किसानों के आपस में पारिवारिक विवाद चल रहे हैं। इसलिए सबका बैंक में खाता खुलना संभव नहीं है। नतीजतन प्रदेश के आधे से अधिक किसान इस छूट का लाभ नहीं ले पाएंगे। किसान संगठनों का कहना है कि पूर्व की भाजपा सरकार ने किसानों को मिलने वाले अनुदान को बिजली बिलों में ही समायोजित करने का जो फैसला किया था उसे ही बरकरार रखना चाहिए। बैंक खाते में अनुदान की राशि जाने से काफी किसानों को नुकसान उठाना पड़ेगा। अधिकतर किसानों के सामूहिक कृषि कनेक्शन हैं। कई कृषि कनेक्शन मृतकों के नाम से ही चल रहे हैं। ऐसे में उनको अनुदान से वंचित रहना पड़ सकता है।
राजस्थान रोडवेज ने प्रदेश के ग्रामीण क्षेत्रों में प्रतिदिन करीब 2 लाख किलोमीटर रूट पर बसों के परिचालन में कटौती कर दी है। इससे गांव में परिवहन सेवा की पहुंच कम हो गई है। इसका असर आम ग्रामीण पर पड़ रहा है। इससे लोगों में नाराजगी है।
उधर, बसपा से कांग्रेस में आए 6 विधायकों का विधायक दल में तो विलय हो गया है। लेकिन कांग्रेस की अंदरूनी कलह की वजह से अभी तक उन्हें विधिवत रूप से कांग्रेस की सदस्यता नहीं प्रदान की गई है। जबकि उनको कांग्रेस में शामिल करने से पूर्व इस बात का वादा किया गया था कि उन्हें सम्मान के साथ कांग्रेस में शामिल किया जाएगा। उनमें से कुछ विधायकों को मंत्री व कुछ विधायकों को विभिन्न निगम, बोर्ड का अध्यक्ष बनाया जाएगा। लेकिन उनके साथ किया वादा भी अधर झूल में लटका हुआ है। मंत्रिमंडल के पुनर्गठन की मांग भी लंबे समय से चल रही है। लेकिन अभी तक उस पर भी कोई निर्णय नहीं हो पाया है। प्रदेश में सत्ता व संगठन के गतिरोध के कारण विभिन्न निगम, बोर्ड, आयोग में गैर सरकारी सदस्यों, अध्यक्षों की नियुक्तियां नहीं हो पा रही है।
हाल ही में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के महासचिव व राजस्थान के प्रभारी अविनाश पांडे ने मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष व उप मुख्यमंत्री सचिन पायलट के बीच सुलह कराने के उद्देश्य से लम्बी चर्चा की थी। लेकिन उसके कोई नतीजे सामने नहीं आए हैं। उस मीटिंग में बसपा से कांग्रेस में शामिल होने वाले पांच विधायकों से भी फेस टू फेस चर्चा की गई थी। उनकी शिकायत थी कि कांग्रेस ने उनसे किया वादा अभी तक पूरा नहीं किया है।
राजस्थान में विधानसभा की दो सीटों मंडावा व खींवसर के उपचुनावों में कांग्रेस ने मंडावा सीट तो जीत ली। मगर कांग्रेस के दिग्गज नेता हरेंद्र मिर्धा खींवसर सीट पर पराजित हो गए। कांग्रेस की आपसी फूट मिर्धा की हार की प्रमुख वजह मानी जा रही है।
प्रदेश में कानून व्यवस्था की स्थिति बदतर हो रही है। आए दिन जगह-जगह बलात्कार की घटनाएं घट रही हैं। कांग्रेस सरकार के आने के बाद भी प्रदेश में कर्ज से परेशान होकर करीब एक दर्जन किसानों ने आत्महत्या कर ली है। दिन दहाड़े सरेआम दुकानदारों को गोली मारकर लूटा जा रहा है। अपराधियों में बिल्कुल भी भय नहीं है। अपराधी बेखौफ होकर अपराध को अंजाम दे रहे हैं। प्रदेश की जनता भय के साए में जीने को मजबूर हो रही है। इन सब परिस्थितियों के कारण प्रदेश की आम जनता को लगने लगा है कि उन्होंने कांग्रेस को वोट देकर कहीं गलती तो नहीं कर दी है। यदि समय रहते कांग्रेस अपने सत्ता व संगठन के झगड़े को नहीं सुलटा पाती है तो उसका खामियाजा उसे आने वाले निकाय व पंचायती राज चुनाव में उठाना पड़ेगा। प्रदेश में सरकार के खिलाफ एक नकारात्मक वातावरण बनेगा जो सरकार के लिए खतरे की घंटी साबित होगा।
(लेखक पत्रकार हैं।)


 
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