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‘आप’से पलायन

30/08/2019

‘आप’से पलायन

गुंजन कुमार

राजनैतिक दलों की ताकत उनके नेता और कार्यकर्ता होते हैं। अगर नेता ही पार्टी छोड़ने लगें तो पार्टी के हौसले पर असर पड़ना लाजिमी है। इन दिनों कुछ ऐसा ही आम आदमी पार्टी में हो रहा है।

एक-एक कर आप के कई विधायक और नेता पार्टी को बॉय-बॉय कहकर दूसरी पार्टी में शामिल हो रहे हैं। करावलनगर से आप के विधायक रहे कपिल मिश्रा 17 अगस्त को भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गए। एक समय में कपिल मिश्रा मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के खास हुआ करते थे। वे केजरीवाल सरकार में जल मंत्री भी रहे लेकिन बाद में दोनों के संबंध बिगड़ गए। जिस कारण केजरीवाल ने उन्हें मंत्री पद से हटा दिया। मिश्रा ने केजरीवाल पर भ्रष्टाचार के कई आरोप लगाए। उसकी शिकायत भी संबंधित विभागों में की।
लंबे समय से दोनों में तनातनी चल रही थी। आखिरकार वे भाजपा में शामिल हो गए। कपिल मिश्रा के साथ ही आप महिला विंग की अध्यक्ष ऋचा पांडे मिश्रा ने भी भाजपा की औपचारिक सदस्यता ग्रहण की। यह आप के लिए बड़ा झटका है। दिल्ली में कुछ माह बाद ही विधानसभा चुनाव होना है। चुनावी समय में आप से बड़े नेताओं का पलायन पार्टी के लिए चिंता का विषय बना हुआ है। पार्टी की अंदरूनी सूत्रों की माने तो कई और विधायक एवं नेता पार्टी छोड़ने को तैयार बैठे हैं। आम आदमी पार्टी के लिए यह खतरे की घंटी है। ऐसे कुछ लोगों का यह भी मानना है कि दिल्ली विधानसभा चुनाव में आप का प्रदर्शन केजरीवाल के प्रदर्शन पर निर्भर करता है।
इसलिए पार्टी नेताओं के पलायन से ज्यादा चिंतित नहीं है। केजरीवाल को यह कोई पहली बार झटका नहीं लगा है। लोकसभा चुनाव के दौरान भी आप के दो विधायकों पार्टी छोड़कर भाजपा का दामन थाम लिया था। विजवासन से आप विधायक देवेंदर सहरावत छह मई को भाजपा में शामिल हुए थे। गांधीनगर के विधायक अनिल वाजपेयी ने भी इसके कुछ दिन पहले ही आम आदमी पार्टी छोड़ दी थी। अनिल वाजपेयी ने भी भाजपा का दामन थामा था। आम आदमी पार्टी को लगातार झटका लग रहा है। हालांकि लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री मोदी की सुनामी थी, लेकिन आप का दूसरे स्थान से खिसककर तीसरे स्थान पर आना जरूर चिंता की बात थी।
कुछ राजनीतिक विश्लेषक इसके लिए केजरीवाल की कार्य प्रणाली को जिम्मेवार मानते हैं। जिस कारण दिल्ली की जनता और नेता भी नाराज बताये जाते हैं। विधायकों और नेताओं का पार्टी छोड़ना इसी ओर इशारा करता है। शाजिया इल्मी, विनोद कुमार बिन्नी और एमएस धीर ने भी कई साल पहले ही केजरीवाल पर कई आरोप लगाते हुए पार्टी छोड़ दी थी। इन तीनों नेताओं ने भी भाजपा का दामन थामा। शाजिया इल्मी पत्रकारिता से अन्ना आंदोलन में आई थीं। इसके बाद वह आम आदमी पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की सदस्य भी रहीं। 2014 के लोकसभा चुनावों में पार्टी की करारी हार के बाद शाजिया ने न सिर्फ पार्टी छोड़ी बल्कि केजरीवाल पर आतंरिक लोकतंत्र नहीं बनाने का आरोप लगाया। एमएस धीर सरकार के पहले कार्यकाल में विधानसभा अध्यक्ष थे।
यही धीर एक साल बाद हुए विधानसभा चुनावों में पार्टी छोड़कर भाजपा में शामिल हो गए। इस बार के लोकसभा चुनाव से पहले दो और बड़े चेहरे ने आप को छोड़ दिया। इसमें पत्रकार आशुतोष और आशीष खेतान हैं। आशीष खेतान पहले ही दिल्ली डायलॉग कमिशन के वाइस चेयरमैन थे। आशुतोष ने 2014 में एक टीवी न्यूज चौनल के मैनेजिंग एडिटर के पद से इस्तीफा देकर आम आदमी पार्टी जॉइन की थी। उन्होंने 2014 में ही दिल्ली के चांदनी चौक से चुनाव लड़ा था। लेकिन केजरीवाल की कार्यप्रणाली ने उन्हें निकलने को मजबूर किया। आम आदमी पार्टी के गठन के समय जिसके तरह दावे केजरीवाल ने किया था, सरकार बनने के बाद उनका व्यवहार उससे उल्टा हो गया। उन्होंने दावा किया था कि यह पार्टी आम लोगों की है।
बाद में केजरीवाल ने आम आदमी की परिभाषा ही बदल दिया। तब उन्होंने कहा था कि वह पारंपरिक राजनीतिक दल नहीं बनेंगे। आज आप का हर निर्णय केजरीवाल ही करते हैं। बताया जाता है कि पार्टी के अंदर कोई लोकतंत्र नहीं है। इसी वजह से पार्टी के कई संस्थापक सदस्यों ने भी पार्टी को छोड़ दिया। जिसमें योगेंद्र यादव, शांति भूषण, प्रशांत भूषण, प्रो आनंद कुमार, मयंक गांधी जैसे नामचीन व्यक्तित्व भी शामिल हैं। योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण को जिस प्रकार पार्टी से निकाला गया, उससे अरविंद केजरीवाल की छवि धराशाही हो गयी।



 
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