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अफगानिस्तान में भी मात खा सकता है पाकिस्तान

01/04/2020

अफगानिस्तान में भी मात खा सकता है पाकिस्तान

बनवारी

दोनों ही नेता पाकिस्तान को खलनायक मानते हैं और उसे अफगानिस्तान में शांति की राह में सबसे बड़ी बाधा समझते हैं। अफगानिस्तान सरकार भारत की सकारात्मक भूमिका देखती है। अब तक वह अफगानिस्तान के विकास में भारत का सहयोग लेती रही है।

ाारीकश्मीर के मुद्दे पर मात खाकर पाकिस्तान भारत से अफगानिस्तान में हिसाब बराबर करना चाहता है। अफगानिस्तान में पिछले छह वर्ष से अशरफ गनी की सरकार है। पिछले वर्ष सितंबर में अफगानिस्तान में राष्ट्रपति के चुनाव हुए थे। उसका परिणाम सामने आने में कई महीने लग गए। फरवरी में अफगानिस्तान के चुनाव आयोग ने अशरफ गनी को विजयी घोषित किया। लेकिन राष्ट्रपति के चुनाव में उनके प्रतिद्वंद्वी अब्दुल्ला इस फैसले को मानने के लिए तैयार नहीं हैं। दोनों ने समानांतर सरकार गठित कर ली है। पर 2014 की तरह इस विवाद का भी कोई न कोई हल निकल आएगा। पिछली बार भी इन्हीं उम्मीदवारों के बीच विवाद था और अंत में अशरफ गनी को राष्ट्रपति और अब्दुल्ला को सरकार का मुख्य कार्यकारी बना दिया गया था। अफगान सरकार में भारत की पैठ पाकिस्तान को असह्य लगती है। इस क्षेत्र में उसका मोहरा तालिबान है, जो जमायत-ए-इस्लामी-पाकिस्तान के सीमावर्ती मदरसों में सशस्त्र लड़ाई के लिए प्रशिक्षित किए गए थे। 1996 में पाकिस्तान के सहयोग और सैनिक सहायता से ही अफगानिस्तान में तालिबान की सरकार बनी थी। लेकिन 2001 में अमेरिका पर हुए आतंकवादी हमले के बाद स्थिति बदल गई।

अफगान सरकार और तालिबान के बीच 10 मार्च से बातचीत होनी थी। अमेरिका और तालिबान के बीच हुए शांति समझौते की एक धारा यह थी कि बातचीत शुरू होने से पहले अफगान सरकार अपने यहां बंदी 5000 तालिबानी लड़ाकों को छोड़ देगी और तालिबान अपने द्वारा बंदी बनाए गए दूसरे पक्ष के एक हजार लोगों को छोड़ देंगे। लेकिन समझौता घोषित होने के अगले ही दिन अशरफ गनी ने साफ कह दिया कि वे 5000 तालिबानियों को छोड़ने के लिए तैयार नहीं है, जब तक बातचीत किसी सकारात्मक निष्कर्ष पर नहीं पहुंचती।

अमेरिका ने सैनिक हस्तक्षेप से तालिबान सरकार पलट दी। लेकिन 2004 से तालिबान फिर सक्रिय हुए। पिछले 16 वर्ष वे अफगानिस्तान के देहाती क्षेत्रों में छापामार लड़ाई के द्वारा अपना प्रभाव बढ़ाते रहे हैं। पाकिस्तान को अंतत: अमेरिका और तालिबान के बीच शांतिवार्ता शुरू करवाने का मौका मिल गया। 29 फरवरी को कतर की राजधानी दोहा में उनके बीच समझौता हुआ। इसके अनुसार अगले 14 महीने में अमेरिकी सैनिकों की अफगानिस्तान से वापसी हो जाने की आशा है।पाकिस्तान की योजना अफगानिस्तान में फिर से तालिबान शासन स्थापित करवाने की है। पाकिस्तान को लगता है कि अफगानिस्तान पर तालिबान शासन हुआ तो इस क्षेत्र में भारत की भूमिका समाप्त हो जाएगी। उसे सदा यह डर रहा है कि भारत से कोई युद्ध हुआ तो भारत दोनों तरफ मोर्चा खोल सकता है। उसका यह डर काल्पनिक अधिक है। लेकिन वह अफगानिस्तान के विकास कार्यों में भारत की भूमिका समाप्त करवाना चाहता है। अमेरिका और तालिबान के बीच हुए समझौते के बाद उसे यह आशा बंधी है। पाकिस्तान ही नहीं, अनेक रक्षा विशेषज्ञों को लग रहा है कि इस क्षेत्र से अमेरिकी सैनिकों की विदाई के बाद पहल तालिबान के हाथ में आ जाएगी।

बनी हुई है हिंसा की आशंका अमेरिका और तालिबान के बीच हुए शांति समझौते को अमल में उतरने में अभी 14 महीने हैं। अमेरिका अपने सैनिकों को वापस बुलाने के लिए उतावला अवश्य है। लेकिन वह यह बर्दाश्त नहीं करेगा कि पाकिस्तान सीधे सैनिक हस्तक्षेप से अफगान सरकार को संकट में डाले। अमेरिका अनेक बार यह कह चुका है कि अफगानिस्तान में शांति के रास्ते की सबसे बड़ी बाधा पाकिस्तान सरकार है। अगर वह आतंकवादी संगठनों को समर्थन और सहयोग देना बंद कर दे तो अफगानिस्तान में शांति स्थापित हो सकती है। अब तक इस आक्षेप को नकारते हुए भी पाकिस्तान दोहरा खेल खेलता रहा है। शांति समझौते के बाद उसे अपना वह चिर-परिचित खेल खेलने में बाधा आ सकती है। यह संभव है कि अफगान सरकार पर दबाव बनाने की उतावली में तालिबान या उसके सहयोगी संगठन कोई बड़ा हिंसक कांड कर डालें। पिछली बार उनके एक आतंकवादी हमले में 11 अमेरिकी सैनिकों के मारे जाने के बाद राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प को समझौता वार्ता रद्द करनी पड़ी थी। अभी भी अफगानिस्तान में लगभग 12 हजार अमेरिकी सैनिक हैं। अमेरिका अपने सैनिकों की सुरक्षा के बारे में बहुत सावधान रहता है। तालिबान की मुश्किल यह है कि उनके नाम पर बहुत से आतंकवादी समूह सक्रिय हंै। कोई भी ऐसी हिंसक कार्रवाई कर सकता है कि यह शांति समझौता फिर से खटाई में पड़ जाए। पाकिस्तान को इसीलिए काफी फूंक-फूंक कर कदम रखना होगा। पाकिस्तान यह तो चाहेगा कि अफगान सरकार पर दबाव बढ़े और वह तालिबान की शर्तें मानने के लिए तैयार हो। लेकिन वह यह नहीं चाहेगा कि हिंसा की कोई घटना शांति समझौते को ही खटाई में डाल दें।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने घोषित कर दिया है कि अफगानिस्तान में तालिबान सत्ता में पहुंच सकते हैं। लेकिन अफगानिस्तान की स्थितियां इतनी सरल नहीं है कि आसानी से यह निष्कर्ष निकाला जा सके कि वहां फिर से तालिबान की सरकार बन सकती है। 1996 में भी तालिबान अपने बलबूते पर सत्ता में नहीं आए थे। उनको सत्ता में पहुंचाने में पाकिस्तानी सेना की सीधी भूमिका थी। उस समय स्थिति अलग थी। अफगानिस्तान पर 1979 से 1989 तक सोवियत रूस का नियंत्रण था। सोवियत रूस की विदाई के बाद मुजाहिद्दीन शासन के समय अफगानिस्तान में काफी अराजकता रही। इस दौर की विकट परिस्थितियों में तालिबान को पनपने का मौका मिला। तालिबान शासन में अफगानिस्तान को पिछली अराजकता से तो मुक्ति मिली, पर शरिया शासन के जरिए अफगान लोग एक नई उत्पीड़क व्यवस्था का शिकार हो गए। आज आम अफगानों में तालिबान की अच्छी छवि नहीं है। उनके पिछले शासन को मजहबी कट्टरता और क्रूरता का पर्याय माना जाता है। ऐसी स्थिति में क्या वे आसानी से सत्ता तक पहुंच पाएंगे? आरंभ में अमेरिका सीधे तालिबान से बात करने का इच्छुक नहीं था। उसका कहना था कि अफगानिस्तान में शांति के लिए जो बातचीत होनी है, वह अफगान सरकार और तालिबान के बीच ही हो। पाकिस्तान ने अमेरिका को यह समझाने की कोशिश की कि सभी तालिबान हिंसक और उत्पीड़क प्रवृत्ति के नहीं है। उनके बीच जो अच्छे तत्व हैं, उनसे बात की जानी चाहिए। भारत तालिबान के बीच इस तरह का भेद किए जाने का विरुद्ध था। लेकिन अमेरिका में डोनाल्ड ट्रम्प के शासनकाल में अमेरिकी प्रशासन की मुख्य चिंता अपने सैनिकों की वापसी हो गई। इराक और सीरिया में इस्लामिक स्टेट के लगभग सफाए के बाद अमेरिका को लगने लगा कि अब इस क्षेत्र से लौटा जा सकता है। इस तरह तालिबान से बातचीत शुरू हुई। अमेरिका की ओर से मुख्य शर्त यह थी कि तालिबान किसी बाहरी आतंकवादी संगठन को अफगानिस्तान में पैर नहीं जमाने देगा और अफगानिस्तान का उपयोग अमेरिका और उसके सहयोगी देशों पर हमले के लिए नहीं करने देगा। तालिबान को यह वचन देने में कोई आपत्ति नहीं थी। पहले भी तालिबानी नेता बाहरी शक्तियों को प्रश्रय देने के खिलाफ रहे हैं। अलकायदा को अफगानिस्तान में आमंत्रित करने में मुख्य भूमिका हक्कानी परिवार की थी। तालिबान इससे अधिक अमेरिका की कोई शर्त मानने के लिए तैयार नहीं थे। वे अफगान सरकार से बातचीत की अवधि में युद्ध विराम के लिए तैयार नहीं थे।

उन्होंने शांति वार्ता में अफगान सरकार को यह कहकर शामिल नहीं होने दिया कि वे उसे अफगान लोगों का प्रतिनिधि नहीं मानते। ऐसी स्थिति में अफगान सरकार और तालिबान के बीच प्रस्तावित बातचीत का भविष्य क्या हो सकता है? अफगान सरकार और तालिबान के बीच 10 मार्च से बातचीत होनी थी। अमेरिका और तालिबान के बीच हुए शांति समझौते की एक धारा यह थी कि बातचीत शुरू होने से पहले अफगान सरकार अपने यहां बंदी 5000 तालिबानी लड़ाकों को छोड़ देगी और तालिबान अपने द्वारा बंदी बनाए गए दूसरे पक्ष के एक हजार लोगों को छोड़ देंगे। लेकिन समझौता घोषित होने के अगले ही दिन अशरफ गनी ने साफ कह दिया कि वे 5000 तालिबानियों को छोड़ने के लिए तैयार नहीं हैं, जब तक बातचीत किसी सकारात्मक निष्कर्ष पर नहीं पहुंचती। तालिबान अफगान सरकार की इस घोषणा को बातचीत की सबसे बड़ी बाधा मानते हैं। वे बातचीत से पहले अफगानी जेलों से अपने सहयोगियों को छुड़ाने की कोशिश करेंगे। इस बीच अशरफ गनी और अब्दुल्ला की प्रतिद्वंद्विता ने भी बातचीत के जल्दी शुरू होने की आशा समाप्त कर दी है। अफगानिस्तान में जब तक सरकार का स्वरूप निश्चित न हो जाए, बातचीत की पहल संभव नहीं है। इससे यह स्पष्ट हो गया है कि अफगानिस्तान में तत्काल कुछ होने वाला नहीं है। पिछले दिनों पाकिस्तान की भी मुश्किलें बढ़ी हैं। वह तालिबान को जिस तरह की सैनिक सहायता देता रहा है वह अब आसान नहीं होगा। पाकिस्तान की सबसे बड़ी चिंता फाइनेंसियल एक्शन टॉस्क फोर्स है। इस बार पाकिस्तान को उससे हरी झंडी मिलने की आशा थी। लेकिन चीन की सारी कोशिश के बाद भी ऐसा नहीं हो सका। पाकिस्तान को टास्क फोर्स से कड़ी चेतावनी मिली है कि अगर जून तक वह यह सिद्ध नहीं कर पाता कि उसने आतंकवादी संगठनों को वित्तीय सहायता देना छोड़ दिया है, तो उसे काली सूची में डाल दिया जाएगा। ऐसा हुआ तो पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं का सहयोग नहीं मिलेगा और उसकी पहले से ही चौपट अर्थव्यवस्था और कठिनाई में पड़ जाएगी। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने यह अवश्य कहा है कि अफगानिस्तान में तालिबान सत्ता में पहुंच सकते हैं। पर यह उनकी कोई सुविचारित टिप्पणी दिखाई नहीं देती। अभी अफगान सरकार और तालिबान के बीच बातचीत शुरू होनी है, वह वर्षों तक खिंच सकती है। अफगान सरकार उतनी कमजोर नहीं है, जितना आमतौर पर उसे मान लिया जाता है। उसके पास दो लाख सैनिकों की प्रशिक्षित सेना है। यह सही है कि देहाती इलाकों में दुर्गम पहाड़ियों के पीछे छिपे रहने वाले छापामार संगठनों पर वह आसानी से विजय प्राप्त नहीं कर सकती। अमेरिका ने अपने खुफिया तंत्र और ड्रोन हमलों के कारण तालिबान की शक्ति नियंत्रित कर रखी थी। अमेरिकी सैनिकों की विदाई के बाद अफगान सेना के पास यह सब सुविधाएं नहीं होंगी। लेकिन अफगान सेना में तालिबान विरोधी नॉर्दन एलाइंस के योद्धाओं को शामिल कर लिया गया था।

इसलिए सेना तालिबान विरोधी भावना लिए हुए हैं। यह सोचना कि वह तालिबान के छापामार युद्ध में बिखर जाएगी, सरलीकरण लगता है। तालिबान अपनी तमाम हिंसा और छापामार गतिविधियों के बावजूद शहरी इलाकों पर नियंत्रण नहीं कर पाए। अफगानिस्तान के 407 जिलों में से 56 प्रतिशत में अफगान प्रशासन प्रभावी है। एक तिहाई से कम तालिबान के नियंत्रण में हैं। शेष दुर्गम होने के कारण किसी के स्पष्ट नियंत्रण में नहीं है। इसलिए तालिबान का सत्ता तक पहुंचने का रास्ता आसान नहीं है। अफगानिस्तान छोड़ने से पहले अमेरिकी अफगान प्रशासन और सेना से कोई न कोई समझौता करेंगे। निश्चय ही वे अफगान सेना के प्रशिक्षण और उसे हथियार उपलब्ध करने की अपनी अब तक की नीति को तिलांजलि नहीं देंगे। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अमेरिकी सैनिकों की विदाई के बाद इस क्षेत्र की दूसरी बड़ी शक्तियां क्या रुख लेंगी, यह अभी स्पष्ट नहीं है। पिछले दिनों मध्य-पूर्व में रूस ने अपनी उपस्थिति बढ़ाई है। अमेरिका और तुर्की के संयुक्त अभियान के बावजूद रूस ने सीरिया की असद सरकार को गिरने नहीं दिया। इस पूरे क्षेत्र में अमेरिका द्वारा खाली की गई जगह को भरने के लिए रूस तैयार दिखाई दे रहा है। अफगानिस्तान की शांति के लिए भी वह समानांतर वार्ता करता रहा है। पहले वह नॉर्दन एलाइंस की पीठ पर था, अब वह क्या करेगा अभी स्पष्ट नहीं है। पिछले दिनों चीन, पाकिस्तान और रूस की एक धुरी बनाने की कोशिश हुई थी। लेकिन रूस अभी अपनी भूमिका को अस्पष्ट बनाए हुए है। वह भारत को यह वचन देता रहा है कि इस क्षेत्र में कोई भी पहल करते समय वह भारतीय हितों का ध्यान रखेगा। इस क्षेत्र की दूसरी बड़ी शक्ति ईरान है। ईरान और अमेरिका के बीच निरंतर जो तनाव बना हुआ है, उसे देखते हुए ईरान अमेरिका विरोधी रुख लेगा। लेकिन एक तो उसे अफगानिस्तान के शियाओं के हित की चिंता करनी है। तालिबानी एक कट्टर सुन्नी आतंकवादी संगठन है और उसके शक्तिशाली होने पर शिया सुरक्षित नहीं रह सकते। पर तालिबान के पिछले शासन के समय ईरान ने उनसे संपर्क बनाए रखे थे। इस बार वह क्या करेगा, यह अभी स्पष्ट नहीं है। अलबत्ता यह स्पष्टता के साथ कहा जा सकता है कि सऊदी अरब अपने आपको इस पचड़े से दूर रखना चाहेगा। इससे पहले सुन्नी जेहाद उसी के उदारतापूर्वक दिए गए धन से फलता- फूलता रहा है, लेकिन पिछले कुछ समय से सऊदी अरब जेहादी संगठनों से अपनी दूरी बनाए हुए हैं।

भारत अफगानिस्तान की इन जटिल परिस्थितियों का कैसे फायदा उठाएगा, यह अभी स्पष्ट नहीं है। पहली बात तो यह कि अफगानिस्तान की परिस्थितियों में कोई भी परिवर्तन होने में समय लगेगा। भारत अफगान सेना के प्रशिक्षण से लेकर प्रशासन, शिक्षा और चिकित्सा के क्षेत्र में सकारात्मक भूमिका निभाने की कोशिश करता रहा है। अपनी इस कोशिश के कारण आम अफगानों में एक भरोसेमंद मित्र के रूप में देखा जाता है। भारत अपनी यह कोशिश जारी रखेगा। इसके अलावा अंतरराष्ट्रीय मंचों पर वह वर्तमान अफगान सरकार को समर्थन देता रहेगा। उसने तालिबान संबंधी अपनी नीति पर कुछ पुनर्विचार किया है। अफगानिस्तान के विकास में अपने योगदान के दौरान उसने कुछ तालिबानी नेताओं की भी प्रशंसा अर्जित की है। इसके अलावा वह जानता है कि अफगानिस्तान और तालिबान के बीच शांति वार्ता आगे बढ़ती है तो वह किसी मिलीजुली सरकार के लिए ही होगी। उस समय यह प्रश्न भी उठेगा कि तालिबानियों की महिलाओं और लोकतंत्र को लेकर धारणा बदली है या नहीं। इस बीच अफगानिस्तान का जो विकास हुआ है, उसमें सभी क्षेत्रों में गैर-पख्तून कबीलों की भी हिस्सेदारी बढ़ी है। महिलाओं की भूमिका भी बढ़ी है। लोगों में एक उत्तरदायी शासन की आकांक्षा बढ़ी है। इन सब कारणों से अब अफगानिस्तान में वैसा शासन स्वीकार्य नहीं होगा, जैसा शासन 1996-2001 तक तालिबान ने प्रदान किया था। इस कारण से अपनी पुरानी हिचकिचाहट छोड़कर भारत पर्यवेक्षक के रूप में 29 फरवरी को हुए शांति समझौते के समय उपस्थित था। इन सब परिस्थितियों को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि अफगानिस्तान में इस बार पाकिस्तान को मात मिल सकती है।


 
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