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बच्चों की सेहत के लिए चीन की सीख

06/11/2019

डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा

चीन सरकार का हालिया फैसला बच्चों के स्वास्थ्य के प्रति सरकार की गंभीरता को दर्शाता है। अब चीन में बच्चों को रात दस बजे के बाद अनिवार्यतः सोना होगा। हालांकि इस पर दुनिया के देशों में बहस शुरू हो चुकी है। लेकिन इसे चीन सरकार का सही समय पर सही निर्णय माना जा सकता है। चीन की सरकार का यह निर्णय बच्चों के होमवर्क के बढ़ते बोझ और शिक्षा व्यवस्था के सुधार के रुप में देखा जा रहा है। देर रात तक जगना और नींद पूरी नहीं सोना या देर से उठना हमारे स्वास्थ्य के लिए गंभीर चुनौती के रुप में उभर रही है। दुनिया के देशों में तेजी से अनिद्रा की बीमारी फैल रही है। देर रात यहां तक कि आधी रात तक जगते रहने से स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव गंभीर समस्या बनती जा रही है। अनिद्रा, चिड़चिड़ापन, कुंठा, आक्रोश, ब्लड प्रेशर आदि बीमारियां केवल नींद पूरी नहीं होने से जुड़ी हैं। मानसिक बीमारियों और डिप्रेशन का एक बड़ा कारण नींद पूरी नहीं होना है। बदलती जीवन शैली का ही परिणाम है कि देश-दुनिया में नींद की दवाओं के कारोबार में तेजी से बढ़ोतरी हो रही है। एक बार सोने-जागने की व्यवस्था अनियमित हो जाती है तो फिर पूरी व्यवस्था ही गड़बड़ा जाती है। उसके बाद समय रहते आदत में सुधार नहीं होता है तो फिर सीधे-सीधे स्वास्थ्य पर विपरीत असर पड़ने लगता है।
जहां तक बच्चों का प्रश्न है, आज की व्यवस्था से बच्चे ही सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं। माता-पिता की देखादेखी बच्चों का देर रात तक जगना आम बात हो गई है। उन्हें सुबह स्कूल भी जाना होता है। इसलिए सुबह जल्दी जगना पड़ता है। इससे उनकी नींद पूरी नहीं हो पाती है। इससे बच्चे तनाव से गुजरने लगे हैं। अपने देश की स्थिति भी कम भयावह नहीं है। स्थिति की गंभीरता को इसी से समझा जा सकता है कि छोटे-छोटे बच्चे बस्तों के बोझ से दबे जा रहे हैं। जब चिकित्सा विज्ञानियों और समाज विज्ञानियों ने बच्चों की पीठ पर स्कूल बैग के बोझ के चलते बच्चों के सीधे चलने तक में कठिनाई की तरफ ध्यान दिलाया तब जाकर सरकार ने इस ओर सोचना शुरु किया। इसी तरह से बच्चों के तनाव का एक बड़ा कारण अब पेरेन्टस की अतिमहत्वाकांक्षा होती जा रही है। टीवी चैनलों के बच्चों के रियलिटी प्रोग्राम हो या आईआईटी-डॉक्टर बनाने की अंधी होड़ में स्कूल के साथ-साथ कोचिंग का बोझ बच्चों की मानसिकता को प्रभावित कर रही है। इसके अलावा टीवी या सिनेमा में दिखाए जाने वाले अधिकांश विज्ञापन बच्चों को केन्द्रीत कर ही बनाए जा रहे हैं। वीडियो गेम्स और टीवी चैनलों पर बच्चों के कार्यक्रमों का देर रात तक प्रसारण निश्चित रुप से बच्चों की मानसिकता को प्रभावित कर रहा है। इसके साथ ही सिनेमा हॉल का टीवी के रुप में घर पर आना और देर रात तक सास-बहू जैसे सीरियलों में टीवी चैनलों पर एक-दूसरे के खिलाफ अंतहीन साजिशों का सिलसिला बच्चों के कोमल दिमाग पर विपरीत प्रभाव डाल रहा है। खुले मैदान के बच्चों के परंपरागत खेल अब अतीत की बात होते जा रहे हैं। बच्चे वीडियो गेम के आदी होते जा रहे हैं। वे रात के दो-दो बजे तक जगते रहते हैं। इससे बच्चों का कोमल मन और संवेदनाएं खोती जा रही हैं। उसका स्थान कुंठा, संवेदनहीनता, अवसाद आदि लेते जा रहे हैं। यह एक तरह से अंतहीन सिलसिला चल निकला है। ऐसे में चीन सरकार का हालिया फैसला सराहनीय माना जाना चाहिए।
बात भले ही दकियानूसी लगे पर इसमें दम है। उम्र के पांचवें या छठे दशक के पड़ाव में चल रहे लोगों को याद होगा कि उनके जमाने में जल्दी सोना और जल्दी उठना स्वास्थ्य की पहली शर्त होती थी। सूर्योदय से पहले बिस्तर छोड़ देने और रात नौ बजे तक सो जाना बच्चों को सिखाया जाता था। कोई भी मेडिकल पैथी हो, सभी में नींद का पूरा होना जरूरी बताया गया है। उम्र के हिसाब से कम से कम कितने घंटे सोना जरूरी है, उसका भी निर्धारण किया हुआ है। ऐसे में चीन सरकार द्वारा बच्चों के लिए रात दस बजे तक सोना अनिवार्य करने की व्यवस्था को अपने देश में भी अनिवार्य किया जाना चाहिए, ताकि बच्चों के स्वास्थ्य से हो रहे खिलवाड़ से उन्हें बचाया जा सके। बचपन में ही प्रौढ़ बनाने की पेरेन्ट्स की आदत को बदलना होगा। हमारी सोच में बदलाव लाना होगा। बच्चे ही नहीं परिवार के सभी सदस्यों के नियत समय पर सोने और उठने की आदत निश्चित रुप से लाभदायक होगी। केवल नींद पूरी होने मात्र से ही कई बीमारियों खासतौर से मानसिक बीमारियों से आसानी से निजात मिल सकती है। क्या हम चीन सरकार के फैसले से सीखेंगे?
(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।) 


 
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