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मिशन से भटकती आज की पत्रकारिता

29/05/2019

हिंदी पत्रकारिता दिवस, 30 मई  पर विशेष  

संतोष देव गिरि
त्र व पत्रकार समाज के दर्पण कहे जाते हैं। इनसे समाज को काफी उम्मीदें बंधी हुई हैं। समाज के अंतिम पायदान पर खड़ा व्यक्ति न्याय की खातिर अपनी बात को शासन सत्ता के शीर्ष में बैठे व्यक्ति तक पहुंचाने में जब असमर्थ हो जाता है तो वह इस दर्पण रूपी पत्र और पत्रकार की शरण में आता है। वह इस खातिर की उसकी आवाज को जरूर संबंधित व्यक्ति तक पहुंचाया जा सकता है। उसे विश्वास होता है, भरोसा होता है। आखिरकार हो भी क्यों न, पत्रकारिता का इतिहास एक गौरवमयी इतिहास से भरा पड़ा है। बात करें देश की आजादी की या नौकरशाही के विरुद्ध बिगुल फूंकने का, ऐसे अनगिनत उदाहरण मिल जाएंगे जिन्होंने समाज के शोषित और पीड़ितों, गरीबों मजलूम की आवाज बनकर शासन सत्ता से लेकर नौकरशाही तक को पानी पिलाने का कार्य किया है। देश की आजादी में भी पत्रकारिता का बहुत बड़ा योगदान रहा है। स्वतंत्रता आंदोलन के महानायकों के साथ-साथ पत्रकारिता के महानायकों ने भी अपनी कलम रूपी तलवार से अंग्रेजों के छक्के छुड़ाने का कार्य किया है। जब संसाधनों का अभाव हुआ करता था, पत्रकारिता का अपना एक लक्ष्य था, मिशन था। इस मिशन भरी पत्रकारिता में तमाम तरह की परेशानियां थीं। बावजूद इसके उस दौर की पत्रकारिता के महानायकों ने कलम की ताकत को कभी झुकने नहीं दिया था। उनकी कलम आग उगला करती थी। 
कालांतर में व्यवस्थाएं बदली हैं। संसाधन बदले हैं तो पत्रकारिता की जिम्मेदारियां भी बढ़ी हैं। काफी कुछ बदलाव भी हुआ है। खासकर सोशल मीडिया के युग में प्रिंट मीडिया का महत्व कहने को भले ही घटी है, लेकिन देखा जाए तो इसकी उपयोगिता नहीं घटी है। उसकी जिम्मेदारियां बढ़ी हैं। इन्हीं के साथ आज की पत्रकारिता के समक्ष कई गंभीर चुनौतियां भी खड़ी हैं। इन चुनौतियों में से सबसे प्रमुख चुनौती पत्रकारिता में बढ़ते घुसपैठ की है। आज की पत्रकारिता में ऐसे लोगों की घुसपैठ बढ़ी है, जिन्हें पत्रकारिता के उसूलों और सिद्धांतों से कोई लेना-देना नहीं है। यदि उन्हें कुछ सरोकार है तो सिर्फ अपने निजी स्वार्थों का, जिनके चलते पत्रकारिता की गरिमा दिनोंदिन धूल धूसरित होती जा रही है। जिस प्रकार से पत्रकारिता में घुसपैठियों की भरमार होती जा रही है, वह न केवल चिंतनीय है बल्कि पत्रकारिता की गरिमा के विपरीत भी है। इस अव्यवस्था के लिए कोई और नहीं बल्कि पत्रकार ही जिम्मेदार हैं। चंद पैसों की खातिर पत्रकारिता के सिद्धांतों को ताख़ पर रख, मिशन पत्रकारिता को दरकिनार कर, कमीशन में परिवर्तित कर दुकानदारी चलाने वाले कुछेक लोगों ने पत्रकारिता का मखौल उड़ाने का कार्य किया है। उनकी करतूतों से मिशन पत्रकारिता को जीवित रखने वाले उन महान मनीषियों की आत्मा को ठेस पहुंच रहा है, जिन्होंने अपने जीवन पर्यन्त पत्रकारिता को मिशन की भांति जीने का कार्य किया।
अपने मिशन से भटक आज की पत्रकारिता कई गुटों में बंटी नजर आती है। जिसने पत्रकारों को एकता के सूत्र में पिरोने की बजाय उन्हें भटकाव की राह पर ला खड़ा किया है। कहना गलत नहीं होगा कि शौचालय से लेकर सचिवालय तक के लोग अपनों पर आने वाली आपदा विपदा के दौरान न केवल एक साथ खड़े नजर आते हैं, बल्कि डंके के साथ अपनी बातों को मनवाने में कामयाब भी होते हैं। लेकिन वही बात जब पत्रकार की आती है तो यह अलग-अलग नजर आता है। अपराधी से लेकर अधिकारी तक की प्रताड़ना से जूझते कलमकारों के समक्ष कई गंभीर चुनौतियां उत्पन्न हुई हैं। निष्पक्ष निर्भीक पत्रकारिता की राह दुरूह हो उठी है। हाल के वर्षों में देश के कई राज्यों में पत्रकारों के ऊपर हुए हमले यह बताने के लिए काफी हैं कि आज की पत्रकारिता की राह में कई रोड़े उत्पन्न किए जा रहे हैं। नौकरशाह जहां सत्यता से भरी पत्रकारिता को पचा नहीं पा रहे हैं तो अपराधी अपने कृत्यों को उजागर होने से रोकने के लिए पत्रकार की राह में रोड़ा बन रहे हैं। खासकर ग्रामीण पत्रकारों के समक्ष ऐसी तमाम चुनौतियां और परेशानियां उत्पन्न हुई हैं जिनके बीच से गुजरते हुए उन्हें जोखिम भरी पत्रकारिता करनी पड़ रही है। बावजूद इसके शासन सत्ता पत्रकारों की सुरक्षा के प्रति गंभीर नहीं है। जो बेहद चिंतनीय है।
सरकार देश की हो या प्रदेश की, पत्रकारों के प्रति सरकार का रवैया उचित नहीं रहा है। सरकार पत्रकारों की आवश्यकताओं की अनदेखी कर रही है। पत्रकार उत्पीड़न जैसे मामलों में त्वरित कार्रवाई के बजाय इनमें लचर नीति अपनाई जा रही है। पत्रकारिता लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ मानी जाती है। लेकिन दिन प्रतिदिन यह चौथा स्तंभ कमजोर होता जा रहा है। इसकी आवाज को दबाने का कुचक्र हो रहा है। लोकतंत्र सेनानियों, सांसद, विधायकों की भांति पत्रकारों को मानदेय देने के साथ ही पत्रकार एक्ट का गठन, पत्रकार आयोग सरकार द्वारा बनाये जाने की मांग पत्रकारों के विभिन्न संगठन समय-समय पर करते आए हैं, ताकि पत्रकारों के मान, सम्मान और अधिकार की व्यवस्था सुनिश्चित हो सके। देश में पत्रकारों की समस्या के निस्तारण की व्यवस्था प्रमुखता से किए जाने की मांग लंबे समय से लंबित पड़ी हुई है। उनके मानदेय के मामले लंबे समय से शीर्ष अदालत में लटके पड़े हैं इसी के साथ खबर कवरेज के दौरान कोई आपदा या अनहोनी होने पर आर्थिक सहयोग की व्यवस्था सुनिश्चित कराई जाने जैसे मुद्दों को लेकर भी आवाज उठती रही है। इसमें भी भेदभाव चरम पर है। कुछेक मामलों को छोड़ दिया जाए तो इससे ग्रामीण पत्रकार उपेक्षित होता आया है। इससे यह महसूस होता है कि आज का पत्रकार चौथे स्तम्भ की जगह महज स्तम्भ बनकर रह गया है। इनके हित के बारे में सोचने के लिए सरकारों के पास न तो समय है और न ही प्रशासनिक अमलों द्वारा सम्मान देने की गुंजाइश। लोगों को उनका हक और अधिकार दिलाने वाला पत्रकार आज खुद अपने अधिकार के लिए असहाय बना हुआ है। क्या अपराजेय बहुमत की केंद्र सरकार पत्रकारों की दशा सुधारने का ईमानदार प्रयास करेगी?
(लेखक पत्रकार हैं।) 


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