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कश्मीर भी होगा चुनावी मुद्दा

09/10/2019

कश्मीर भी होगा चुनावी मुद्दा

मोहन सहाय

लोकसभा ने जब 6 अगस्त को जम्मू- कश्मीर से संबंधित विधेयकों को पारित किया, उस शाम मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस अपने ‘महाजनादेश रथ’ के साथ अकोला में थे। उन्होंने जम्मू-कश्मीर के पुनर्गठन पर बोलने का मौका नहीं छोड़ा। इससे स्पष्ट हो गया कि इस बार महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में कश्मीर भी एक मुद्दा होगा। फिलहाल राज्य में तीन चुनावी रथ चलाए जा रहे हैं। मुख्यमंत्री फडणवीस के अलावा दो अन्य रथ शिवसेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के हैं। शिव सेना के रथ की कमान उद्धव ठाकरे के बेटे आदित्य ठाकरे ने संभाल रखी है। उद्धव के उत्तराधिकारी के रूप में पेश किए जाने वाले आदित्य ठाकरे जन आशीर्वाद रथ पर निकले हैं।

फिलहाल राज्य में तीन चुनावी रथ चलाए जा रहे हैं। मुख्यमंत्री फडणवीस के अलावा दो अन्य रथ शिवसेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के हैं।

राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी ने भी छत्रपति शिवाजी महाराज की विरासत के नाम पर शिव स्वराज यात्रा के नाम से रथ दौड़ाना शुरू कर दिया है। इस रथयात्रा को एनसीपी ने शिवाजी महाराज के जन्म स्थान शिवनेरी से ही शुरू किया है। हालांकि इस रथयात्रा की अगुवाई शरद पवार या उनके भतीजे अजीत पवार की जगह मराठी अभिनेता और पुणे के शिरूर से चुने गए लोकसभा सदस्य अमोल कोल्हे कर रहे हैं। अगर महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव एक रिले दौड़ मान लिया जाए, तो कहा जा सकता है कि शरद पवार और उनकी पार्टी के कार्यकर्ताओं को अभी तक कांग्रेस से ऐसा कोई चेहरा नहीं मिल सका है, जो इस दौड़ में उनसे चुनावी बैटन लेकर आगे बढ़ सके। इन पंक्तियों को लिखे जाने तक कांग्रेस की ओर से कोई चुनावी रथ निकालने जैसी जानकारी नहीं मिल सकी है। फिलहाल कांग्रेस में अनिश्चतता का दौर समाप्त हो गया है। सोनिया गांधी अंतरिम अध्यक्ष रहेंगी।

आम चुनाव के बाद राज्य पार्टी में की गई कुछ नियुक्तियों में निष्पक्ष मूल्यांकन का अभाव नजर आया है। पूर्व मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण को प्रदेश अध्यक्ष पद से हटाकर उनकी जगह बालासाहेब थोराट को नियुक्त किया गया है। थोराट के पास न तो समर्थकों की लंबी चौड़ी फौज है और न ही उनके नाम में कोई जबरदस्त आकर्षण है। उन्हें पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच दूसरे पायदान का नेता ही माना जाता है। जबकि थोराट के पूर्ववर्ती अशोक चव्हाण राज्य के कद्दावर नेता माने जाते हैं और और पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच भी उन्हें सम्मानित माना जाता है। चुनाव प्रचार के बीच ही मुंबई कांग्रेस की अगुवाई कर रहे संजय निरुपम को हटाकर मिलिंद देवड़ा को कमान सौंपने का राहुल गांधी का फैसला भी एक गलत निर्णय ही था। वैसे अलग बात है कि चुनाव के दौरान निरुपम के पास ही मुंबई पार्टी नेतृत्व रहने दिया जाता तो भी चुनाव परिणामों पर कोई खास असर नहीं पड़ता। कांग्रेस मुंबई की सभी छह लोकसभा सीटें हार गई, जिनमें निरुपम और देवड़ा की सीट भी शामिल थीें।

बीजेपी-शिवसेना गठबंधन

भाजपा और शिवसेना ने इस बार के विधानसभा चुनाव में 2014 के विपरीत गठबंधन के रूप में चुनाव लड़ने का फैसला किया है। 2014 में अलग- अलग चुनाव लड़ने के बावजूद भाजपा ने 288 सदस्यों वाली राज्य विधानसभा की 122 सीटें जीती थीं। वहीं शिवसेना को 63 सीटों पर कामयाबी मिली थी। पूर्ण बहुमत की संख्या हासिल करने में विफल रहने की वजह से 2014 में स्वाभाविक रूप से भाजपा को सरकार बनाने के लिए शिवसेना का समर्थन लेना पड़ा था। 2014 में पिछड़ने वाली शिवसेना भाजपा के साथ गठबंधन होने के बावजूद इस बार विधानसभा में सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरने के लिए कड़ी मेहनत कर रही है। अपने पिता बालासाहेब ठाकरे के विपरीत, जिन्होंने कभी कोई मंत्री पद नहीं संभाला, उद्धव ठाकरे काफी महत्वाकांक्षी हैं।

महाराष्ट्र में सत्तारूढ़ गठबंधन ने अपना चुनाव अभियान शुरू जरूर कर दिया है, लेकिन विदर्भ और मराठवाड़ा क्षेत्र में जल संकट और सूखे जैसी स्थिति फडणवीस सरकार के लिए चिंता का विषय बनी हुई है। शिवसेना की बात करें, तो मुंबई के मतदाता हर साल होने वाली बारिश के दौरान कुप्रबंधन और नागरिक सुविधाओं के लिए तैयार ढांचागत व्यवस्था के पूरी तरह से ठप पड़ जाने की वजह से काफी नाराज हैं।

बालासाहब ने 1995 में गठबंधन सरकार की अगुवाई करने के लिए मनोहर जोशी का चयन किया था। लेकिन अगले चुनाव से पहले बालासाहेब मनोहर जोशी से रुष्ट हो गए, जिसके बाद उन्हें मुख्यमंत्री पद से हटाकर उनकी जगह नारायण राणे को लाया गया। हालांकि इस परिवर्तन के बावजूद शिवसेना-भाजपा गठबंधन राज्य विधानसभा में बहुमत पाने में विफल रहा था और चुनाव के बाद कांग्रेस- एनसीपी गठबंधन ने विलासराव देशमुख की अगुवाई में सरकार बनाई थी। उद्धव ठाकरे की महत्वाकांक्षा इसी बात से पता चल जाती है कि उनके बेटे आदित्य ठाकरे ने करीब एक महीने पहले ही बयान दिया था कि उनके पिता भाजपा-शिवसेना गठबंधन सरकार के मुख्यमंत्री होंगे। ये एक ऐसी बात है जो तभी संभव हो सकती है, जब भाजपा को अगले विधानसभा चुनाव में शिवसेना की तुलना में कम सीटें मिलें।

आदित्य ठाकरे का जवाब देते हुए, देवेंद्र फड़णवीस ने अगले मुख्यमंत्री के बारे में लगाई जा रही सभी अटकलों को सार्वजनिक मंच से ये कहकर विराम दे दिया कि महाराष्ट्र के अगले मुख्यमंत्री वही होंगे। फडणवीस को इस बात का पूरा भरोसा है कि विधासभा चुनावों में वो भाजपा के लिए शिवसेना या किसी भी दूसरी पार्टी की तुलना में अधिक सीटें जीत सकेंगे। यहां भाजपा और शिवसेना के बीच इस बात की होड़ है कि कौन अगले विधानसभा चुनावों में अधिक सीटें हासिल कर पाता है। जाहिर है कि अपनी रणनीति के तहत शिवसेना 288 सदस्यों वाली विधानसभा के चुनाव में भाजपा से ज्यादा सीटों की मांग करेगी। जबकि, भाजपा 2014 के चुनाव परिणामों के आधार पर ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़ना चाहेगी। समझौते के तहत दोनों दलों के बीच समान संख्या में सीटों का फार्मूला भी निकाला जा सकता है। लेकिन अभी जबकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता चरम पर है, तब इस बात की संभावना कम ही है कि भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व अपने साझेदार शिवसेना को जरूरत से ज्यादा लाभ देगा।

मुख्यमंत्री पद को लेकर बीजेपी और शिवसेना की दावेदारी पर शरद पवार ने ये कहकर तंज भी किया कि बीजेपी और शिवसेना के बीच दो मुख्यमंत्रियों की टक्कर है। कांग्रेस और एनसीपी अपने कुछ मौजूदा विधायकों के भाजपा और शिवसेना में शामिल होने की खबरों से चिंतित हैं। जो लोग पार्टी छोड़कर भाजपा या शिवसेना में शामिल हो गए हैं या जिनके शामिल होने की संभावना है, कहा जा रहा है कि उन्हें भाजपा और शिवसेना से टिकट मिलने का वादा भी मिल चुका है। हालांकि इस बात पर भी ध्यान देना जरूरी है कि दोनों ही पार्टियां एनसीपी या कांग्रेस छोड़कर आने वाले नेताओं के जीतने की क्षमता का भी आंकलन कर रही हैं। सत्तारूढ़ गठबंधन के दोनों ही दलों को पता है कि दलबदलुओं को टिकट देने से उनकी अपनी पार्टी में ही असंतोष की स्थिति बन सकती है। इसलिए दूसरे दलों से आने के इच्छुक लोगों के बारे में पूरी तरह से सोच-विचार के बाद ही उन्हें पार्टी में शामिल कराया जा रहा है। महाराष्ट्र में सत्तारूढ़ गठबंधन ने अपना चुनाव अभियान शुरू जरूर कर दिया है, लेकिन विदर्भ और मराठवाड़ा क्षेत्र में जल संकट और सूखे जैसी स्थिति फडणवीस सरकार के लिए चिंता का विषय बनी हुई है।

शिवसेना की बात करें, तो मुंबई के मतदाता हर साल होने वाली बारिश के दौरान कुप्रबंधन और नागरिक सुविधाओं के लिए तैयार ढांचागत व्यवस्था के पूरी तरह से ठप पड़ जाने की वजह से काफी नाराज हैं। ये सारी व्यवस्थाएं नगर निगम के जिम्मे हैं और नगर निगम पर शिवसेना का नियंत्रण है। स्वाभाविक रूप से नगर निगम की काहिली से उत्पन्न नाराजगी का असर चुनाव के दौरान शिवसेना पर पड़ सकता है। कांग्रेस की दशा दयनीय ही नजर आती है। सुशील कुमार शिंदे और अशोक चव्हाण सरीखे पार्टी के वरिष्ठ नेता अभी तक चुनाव प्रचार की अपनी रणनीति भी नहीं बना सके हैं। शिवसेना-बीजेपी गठबंधन का मुकाबला करने के लिए रणनीति बनाने पर पार्टी में अभी तक कोई चर्चा नहीं हो सकी है। विधानसभा सीटों का चुनाव पूर्व आकलन और जीतने की संभावना का मूल्यांकन भी नहीं किया जा सका है। बुरी तरह से निराश और हताश कार्यकर्ताओं में विश्वास भरने और उनको ऊर्जावान बनाने के लिए महाराष्ट्र प्रदेश कांग्रेस में बाला साहेब थोराट की जगह किसी और को लाया जाएगा या थोराट ही पार्टी की अगुवाई करते रहेंगे, इस बात का भी किसी को कुछ पता नहीं है।

हां, एनसीपी ने मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ की तर्ज पर अपनी ओर से चुनावी पहल करते हुए ये एलान जरूर किया है कि अगर चुनाव के बाद कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन की सरकार बनी तो राज्य में स्थानीय लोगों के लिए 75 फीसदी नौकरियां आरक्षित की जाएंगी।



 
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