युगवार्ता

Blog single photo

जामिया में उबाल के निहितार्थ

06/01/2020

जामिया में उबाल के निहितार्थ

आर. के. सिन्हा

जामिया में एक के बाद एक हो रहे आंदोलन सोचने को मजबूर कर रहे हैं कि यह शिक्षा का केंद्र है या आपराधिक तत्वों की शरणस्थली? नागरिकता कानून की खिलाफत से पहले जामिया में एक कार्यक्रम में इजरायल को पार्टनर बनाए जाने के विरोध की मानसिकता को समझना बेहद जरूरी है।

नागरिकता बिल पर राष्ट्रपति की मुहर लगने के बाद से ही नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ विरोध प्रदर्शन चल रहे हैं। बिलकुल सुनियोजित और प्रायोजित कार्यक्रम की भांति दिल्ली के जामिया नगर में प्रदर्शनकारियों ने तीन बसों में आग लगा दी और एक फायर ब्रिगेड की गाड़ी को भी तोड़ दिया। जामिया मिल्लिया इस्लामिया विश्वविद्यालय के छात्रों ने कालिंदी कुंज रोड पर जोरदार प्रदर्शन किया और सरकार के खिलाफ नारेबाजी की। जामिया मिल्लिया इस्लामिया विश्वविद्यालय में छात्रों और पुलिस में जमकर झड़प हुई। हालांकि विश्वविद्यालय प्रबंधन ने सफाई देते हुए कहा कि विरोध यूनिवर्सिटी परिसर के बाहर किया गया था और उसमें बड़ी संख्या में बाहरी तत्व थे।
विश्वविद्यालय के एक बड़े अधिकारी टी. वी. चैनलों पर यह कहते हुए सुने गये कि विश्वविद्यालय से एक भी पत्थर नहीं चले। बेशक, हिंसा भड़काने का काम कुछ राजनीतिक दल और आतंकवादी संगठन तो कर ही रहे हैं। दिल्ली मे आप और कांग्रेस के नेता इन हरकतों को खुलेआम अंजाम दे रहे हैं। इस अधिनियम के पारित होने से कुछ विपक्षी दलों को पेट दर्द होने लगा है। उनका वोट बैंक बिखरता दिख रहा है। इसीलिए वे उसके खिलाफ हिंसा भड़का रहे हैं। सरकार बार बार कह रही है कि इस अधिनियम से किसी की जाति, धर्म या समुदाय की संस्कृति, भाषा, सामाजिक पहचान और राजनीतिक अधिकार प्रभावित नहीं होंगे। नागरिकता संशोधन कानून बिलकुल भी मुस्लिम विरोधी नहीं है। जैसा कि दुष्प्रचार किया जा रहा है।
भारतीय मुसलमानों को डरने की तनिक भी जरूरत नहीं है, क्योंकि वे किसी भी रूप में घुसपैठिये या शरणार्थी नहीं हैं। वे तो देश के विभाजन के बाद भारत में ही रह गए और भारत के ही नागरिक हैं। यह कानून अल्पसंख्यक विरोधी नहीं है। बल्कि, हिन्दू के अतिरिक्त पारसी, ईसाई, सिख, जैन और बौद्ध भी जो पाकिस्तान और बांग्ला देश तथा अफगानिस्तान में अल्पसंख्यक हैं, उन्हें भारत में रहने को अधिकार देने के लिए बनाया गया है, क्योंकि, इन देशों ने अपने अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा नहीं की है, जैसी कि भारत ने की है। अत: भारत का यह कर्तव्य है कि वह अपने पूर्व नागरिकों की रक्षा करे। कुछ राजनीतिज्ञ कह रहे हैं कि यह मुस्लिम विरोधी है, लेकिन यह मुस्लिम विरोधी किसी भी दृष्टि से है ही नहीं । भला पाकिस्तान और बांग्लादेश के अल्पसंख्यक हिन्दुओं, सिखों, जैन, बौद्ध, पारसी और ईसाइयों की अधिकारों की रक्षा करने से भारत के मुसलमानों के अधिकारों का कहां हनन हो रहा है? भारत के मुसलमानों को लेकर इस विधेयक में कुछ नहीं कहा गया है। यहां के मुसलमानों को पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान के मुसलमानों से अब क्या लेना देना है? यहां के मुसलमान तो घुसपैठिये नहीं हैं।
यहां का मुसलमान भारत का सम्मानित नागरिक है और इसको यहां से निकालने का कोई सवाल ही नहीं है। नागरिकता संशोधन कानून के अनुसार हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई समुदायों के जो सदस्य 31 दिसंबर 2014 तक पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से भारत आए हैं और जिन्हें अपने देश में धार्मिक उत्पीड़न का सामना पड़ा है, उन्हें भारतीय नागरिकता दी जाएगी। अफसोस कि कांग्रेस सहित कई राजनीतिक दल और कुछ मुस्लिम संगठन इस विधेयक का यह कहते हुए विरोध कर रहे हैं कि इसमें धार्मिक आधार पर भेदभाव किया गया है। मैं एकबार फिर से जामिया यूनिवर्सिटी की बात करूंगा। इस विश्वविद्यालय में भी जे.एन. यू. की तरह आन्दोलन होने लगे हैं। कुछ समय पहले जिस मुद्दे पर यहां के छात्रों ने आंदोलन किया, वह तो वास्तव में बहुत ही गंभीर मसला है।
उससे भी गंभीर बात यह है कि जामिया विश्वविद्यालय के प्रशासन ने आंदोलनकारी छात्रों की मांग मानते हुए यहां तक कह दिया कि अब जामिया के किसी भी कार्यक्रम में कोई इजरायली भाग नहीं लेगा। किसी भी कॉलेज या यूनिवर्सिटी के छात्रों को बेशक यह अधिकार तो है कि वे अपनी जायज मांगों को मनवाने के लिए आंदोलन करें। इसमें कोई बुराई भी नहीं है। लेकिन, जामिया में एक कार्यक्रम में इजरायल को पार्टनर बनाए जाने के विरोध में कुछ दिग्भ्रमित छात्र नाहक ही हड़ताल कर रहे थे। इनका कहना था कि इजरायल फिलीस्तान में मानवाधिकारों का उल्लंघन कर रहा है। यह उनकी राय हो सकती है, पर इसका यह कहां से मतलब हुआ कि वे एक केन्द्रीय विश्वविद्यालय को बंदूक की नोक पर अपनी राय मनवाने के लिए आंदोलन कर दें।
वह भी भारत के एक मित्र देश इजरायल के खिलाफ जो सदा से आतंकवाद के विरुद्ध लड़ाई में भारत का खुलकर साथ देता रहा है। यह यहुदी देश तो भारत के सच्चे मित्र के रूप में लगातार सामने आ रहा है। हालांकि, फिलस्तीन मसले के सवाल पर भारत भी विगत कई दशकों से आखें मूंद कर इस्लामिक संसार के साथ खड़ा रहा, पर बदले में भारत को वहां से कोई अपेक्षित सहयोग और समर्थन नहीं मिला। बहरहाल, जामिया में इजरायल से नफरत करने वालों की मांग मान ली गई। पर उस मांग को मानने वाले यह क्यों भूल गए कि भारत में भी हजारों यहूदी सदियों से यहीं रहते हैं। वे भी इजरायल से भावनतामक रूप से जुड़े हुए हैं।
इजरायल ने 1965 और 1971 की जंगों के समय भारत का खुलकर साथ दिया था। इन जंगों में इजराईल ने भारत को गुप्त जानकारियां देकर मदद की थी। 1999 में करगिल युद्ध में इजराईल द्वारा प्राप्त मदद के बाद भारत और इजराईल खासतौर पर करीब आए। तब इजराईल ने भारत को एरियल ड्रोन, लेसर गाइडेड बम, गोला बारूद और अन्य हथियारों की मदद दी थी। अंत में इतना ही कहना चाहता हूं कि उन तत्वों पर जरूर सख्त कारवाई हो जो जामिया को आग में झोंकते हैं।


 
Top