युगवार्ता

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चुनावी तापमान चरम पर

22/10/2019

चुनावी तापमान चरम पर

बद्रीनाथ वर्मा

हरियाणा व महाराष्ट्र में चुनावी तापमान चरम पर है। एक तरफ राष्ट्रवाद व सुशासन के दावे के साथ भाजपा है तो दूसरी तरफ सिर फुटौव्वल की शिकार कांग्रेस। यही हाल अन्य क्षेत्रीय दलों का भी है। ऐसे में भाजपा की राह क्या वाकई निष्कंटक है, या पार्टी ने जिनके टिकट काटे हैं वे खेल कर जायेंगे। सियासत के दांवपेंच, समीकरणों, तिकड़मों व भीतरघात को रेखांकित करती इस बार की आवरण कथा।

हरियाणा व महाराष्ट्र दोनों ही राज्यों में चुनावी तापमान अपने उच्चतम स्तर पर पहुंच गया है। करो या मरो की स्थिति में चुनावी रण का हर योद्धा पूरे लाव लश्कर के साथ एक दूसरे को पटखनी देने के लिए तत्पर है। लोकसभा चुनावों के बाद पहली बार हो रहे इन चुनावों में हर पार्टियां अपनी जीत के लिए एड़ी चोटी का जोर लगाये हुए हैं। हालांकि बागी उम्मीदवारों व अंदरूनी बगावत से समान रूप से हरेक पार्टी जूझ रही है।
महाराष्ट्र हो या हरियाणा, भाजपा ने दोनों ही राज्यों में अपने कई धाकड़ नेताओं को टिकट से वंचित कर दिया है। समर्थकों के भारी हंगामे व दिग्गजों की नाराजगी के बावजूद भाजपा दोनों ही राज्यों में एक बार फिर सरकार बनाने को लेकर पूरी तरह से आश्वस्त नजर आ रही है। हालांकि उसका यह विश्वास कायम रह पाता है या नहीं यह तो 24 अक्टूबर को ही पता चलेगा जब चुनाव परिणाम घोषित होंगे। वैसे इसमें दो राय नहीं कि दोनों ही राज्यों में सिर फुटौव्वल से जूझ रही कांग्रेस से उसकी स्थिति काफी बेहतर है।
भ्रष्टाचार मुक्त शासन देने के दावों के अलावा जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 को खत्म करने का साहसिक निर्णय व तीन तलाक पर पूर्ण पाबंदी जैसी बड़ी सफलता के साथ चुनावी मैदान में ताल ठोंक रही भाजपा को अपनी जीत को लेकर रत्तीभर भी संदेह नहीं है। वह हरियाणा में अकेले ही 75 पार के लक्ष्य के साथ तो महाराष्ट्र में शिवसेना के साथ गठबंधन कर 220 सीटें जीतने का लक्ष्य हासिल करने चुनावी मैदान में है। भाजपा इस लक्ष्य को हासिल करने को लेकर इसलिए आश्वस्त है क्योंकि पहले से ही बेदम विरोधी पार्टियों की अंदरूनी कलह उनकी संभावनाओं को और अधिक पलीता लगा रही है। महाराष्ट्र चुनाव में उतरे एक नये चेहरे ने सूबे की सियासत में हलचल मचा दी है।
दरअसल, शिवसेना की स्थापना के 53 सालों बाद पहली बार ठाकरे परिवार के किसी सदस्य ने चुनावी मैदान में ताल ठोंका है। हिंदू हृदय सम्राट कहे जाने वाले शिवसेना संस्थापक बालासाहेब ठाकरे ने न तो खुद कभी चुनाव लड़ा और न ही उनके बेटे और वर्तमान शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने। लेकिन अब इस परंपरा को तोड़ते हुए ठाकरे परिवार की तीसरी पीढ़ी के आदित्य ठाकरे मुंबई की वर्ली सीट से चुनावी मैदान में हैं।

बीजेपी को कांग्रेस मुक्त भारत का नारा देने वाले कोई और
नहीं, बल्कि कांग्रेस के ही कुछ नेता हैं। ये लोग बीजेपी
के सपने को साकार करवाने के लिए कांग्रेस को लगातार
कमजोर कर रहे हैं। राहुल गांधी पूरे देश में युवाओं की
टीम तैयार कर रहे थे लेकिन, कुछ लोगों को यह रास नहीं
आया। आज कांग्रेस केवल हरियाणा ही नहीं बल्कि पूरे देश
में आईसीयू की हालत में पहुंच गई है। मेरा सुदर्शन चक्र
चल चुका है और यह अपना असर जरूर छोड़ेगा।
– अशोक तंवर, पूर्व प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष हरियाणा

29 वर्षीय आदित्य बालासाहेब ठाकरे के पोते और शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे के पुत्र हैं। बदलती राजनीतिक जरूरतों के मद्देनजर उन्हें दक्षिण-मध्य मुंबई की वर्ली विधानसभा सीट से शिवसेना ने चुनावी मैदान में उतारा है। आदित्य शिवसेना की युवा शाखा ‘युवा सेना’ के प्रमुख हैं। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की महा जनादेश यात्रा के समानांतर आदित्य ठाकरे ने महाराष्ट्र में जन आशीर्वाद यात्रा निकालकर अपनी खुद की एक अलग पहचान बनाने में कामयाबी हासिल की है। भाजपा-शिवसेना के बीच चलने वाली रस्साकशी में इससे कमी आयेगी या बढ़ेगी यह तो भविष्य के गर्भ में है लेकिन आदित्य ठाकरे को चुनावी मैदान में उतारकर शिवसेना ने बड़ा दांव चला है, इसमें कत्तई दो राय नहीं। शिवसेना की इस चाल को भाजपा भी बखूबी समझ रही है।
आदित्य को सबसे सुरक्षित सीट से इसलिए चुनावी मैदान में उतारा गया है ताकि जीत के बाद सत्ता के बड़े हिस्से पर मजबूत दावेदारी पेश की जा सके। वैसे तो पार्टी गाहे बगाहे मुख्यमंत्री पद पर दावा ठोंक रही है लेकिन आदित्य का नई सरकार में उप मुख्यमंत्री बनना तय है। हाल ही में मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने कहा था कि डिप्टी सीएम की सीट फिलहाल खाली है। इसके जवाब में शिवसेना नेता संजय राउत ने कहा था, ‘ठाकरे उप पद नहीं लेते। परिवार का सदस्य हमेशा प्रमुख होता है। हालांकि शिवसेना की इन बयानबाजियों का फिलहाल ज्यादा महत्व नहीं है क्योंकि सूबे में कभी छोटे भाई की भूमिका में रही भाजपा अब बड़ा भाई बन चुकी है।
बात कांग्रेस की करें तो हरियाणा में भूपेंद्र सिंह हुड्डा को पार्टी में बनाये रखने के लिए कांग्रेस ने प्रदेश अध्यक्ष अशोक तंवर की बलि चढ़ा दी और हुड्डा की करीबी बतायी जाने वाली कुमारी शैलजा को प्रदेश कांग्रेस की कमान सौंप दी। इससे तंवर का नाराज होना बनता ही है। कोढ़ में खाज यह कि तंवर के समर्थकों को भी टिकट से वंचित कर दिया गया। इससे भन्नाए तंवर ने पार्टी से इस्तीफा दे दिया और अब हरियाणा में कांग्रेस को हराने का बीड़ा उठा लिया है। चुनाव में कांग्रेस की हार की भविष्यवाणी करते हुए तंवर का कहना है कि इस चुनाव में कांग्रेस की मिट्टी पलीद होगी और कुछ लोगों की गर्दन की मरोड़ निकलने वाली है। एक बात मैं पहले सुनता था, उसका मतलब समझ नहीं आता था। कहा जाता था कि कांग्रेस बच्चा खानी पार्टी है। इसकी समझ इस चुनाव में लगी।

तीन तलाक जैसी कुप्रथा की समाप्ति हो या अनुच्छेद 370 का खात्मा, मोदी सरकार के इन साहसिक फैसलों का प्रभाव इन चुनावों पर नहीं पड़ेगा, ऐसा सोचना भी मूर्खता होगी।

कुछ की तो भ्रूण में ही हत्या की जाती है। कुछ मेरे जैसे लोग जिन्हें राजनीति में मौका मिलता है। उन्हें एक समय के बाद खत्म कर दिया जाता है। राहुल गांधी भी इसके शिकार हुए। पार्टी के बड़े-बड़े मगरमच्छ इसके लिए जिम्मेदार हैं। ये कौन सी ताकते हैं, इन्हें पहचानना पड़ेगा। कुछ मगरमच्छ भाजपा के साथ मिलकर पार्टी को खत्म कर रहे हैं। उन्होंने कांग्रेस को आईसीयू में पहुंचा दिया। अशोक तंवर का कहना है कि इस चुनाव में वे किसी भी दल के अच्छे लोगों की मदद करेंगे। कुछ इसी तरह का हाल महाराष्ट्र का भी है।
टिकट बंटवारे से नाराज संजय निरुपम ने भी बगावत का झंडा बुलंद कर दिया है। निरुपम का दावा है कि महाराष्ट्र में कांग्रेस के कुछ उम्मीदवारों को छोड़कर सभी की जमानतें जब्त हो जायेंगी। राहुल गांधी के करीबियों को किनारे लगाये जाने की बात करते हुए निरुपम ने तो यहां तक कह दिया है कि ऐसा ही चलता रहा तो वह कांग्रेस को तिलांजलि दे देंगे। जाहिर है चुनाव के ऐन बीच नेताओं की इस तरह की नाराजगी कांग्रेस को भारी पड़ने जा रही है। वैसे तो हर कोई अपनी जीत के दावे कर रहा है। लेकिन राजनीतिक बयार बता रही है कि पिछली बार की तरह ही इस बार भी भाजपा ही सबसे बड़े राजनीतिक दल के रूप में सामने आएगी।

मल्लिकार्जुन खड़गे ने चुनाव की रणनीति बनाने के
लिए मीटिंग बुलाई जो 15 मिनट में खत्म हो गई।
बैठक में किसी को बोलने नहीं दिया गया। दुर्भावना से
ग्रस्त ऐसे महान रणनीतिकार कांग्रेस को बचाएंगे या
निपटाएंगे? कुछ सीटों को छोड़कर महाराष्ट्र में पार्टी की
जमानत जब्त होगी। मैंने विधानसभा चुनाव के लिए
मुंबई में सिर्फ एक नाम सुझाया था। लेकिन इसे भी
खारिज कर दिया गया है। ऐसी स्थिति में मैं चुनाव प्रचार
नहीं करूंगा।
संजय निरुपम, पूर्व मुंबई कांग्रेस अध्यक्ष

मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस समेत कतिपय भाजपा नेताओं ने चुनाव से पहले यह लक्ष्य रखा था कि अबकी बार 220 के पार। यहां भाजपा 150, शिवसेना 124 तथा मित्र दलों ने 14 सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़े किए हैं, तो कांग्रेस-राकांपा ने 125-125 सीटों तथा उनके मित्र दलों ने 38 सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़े किए हैं। कहां तो कांग्रेस ने सोचा था कि अच्छी खासी सीटें मिलेंगी लेकिन नेताओं की नाराजगी से अब यह चूं चूं का मुरब्बा ही साबित होने जा रहा है। इसके विपरीत पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा तथा शिवसेना ने अलग-अलग चुनाव लड़कर क्रमश: 122 तथा 63 सीटें जीती थी। पिछले पांच वर्षों में अपनी बढ़ी ताकत के बल पर भाजपा, शिवसेना तथा रिपाई के महागठबंधन को इस बार 210 या उससे ज्यादा सीटें मिलने के आसार हैं।
यह भी संभव है कि महागठबंधन अपने 220 के पार के लक्ष्य को भी प्राप्त कर ले। बात हरियाणा की करें तो यहां मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर के साथ ही भाजपा नेतृत्व अबकी बार 75 पार के लक्ष्य के साथ चुनावी जंग जीतने में जुटा हुआ है। अपनी हर सभा में कांग्रेस पर वार करते हुए खट्टर कहते हैं कि पिछली सरकारों के नेता सत्ता को जेब में डाल कर चलते थे जबकि हमने उसे जनता को सौंपी। यही कारण है कि इस बार जनता ने पहले ही साफ कर दिया है कि आगामी सरकार भाजपा की होगी। भय और भ्रष्टाचार पर प्रभावी रोक लगाने की अपनी सरकार की उपलब्धियों को बताते हुए मुख्यमंत्री यह कहने से नहीं चूकते कि पांच साल पहले सूबे में जब पहली बार भाजपा सरकार बनी उस वक्त हरियाणा की जनता भ्रष्टाचार और भय की भावना से त्रस्त थी।
पिछली सरकारों के नेता सत्ता को जेब में डाल कर चलते थे जिससे आमजन को बहुत पीड़ा होती थी। लेकिन अब यह रवायत पूरी तरह से बदल गई है। नौकरियों, ट्रांस्फर आदि में व्याप्त भ्रष्टाचार को खत्म करने के दावे पर जनता कितना विश्वास कर पाती है, यह भी 24 अक्टूबर को ही पता चलेगा। बहरहाल, राष्ट्रवाद के रथ पर सवार होकर भाजपा देश की एकता एवं अखंडता को सर्वोपरि बताते हुए अनुच्छेद 370 को भुनाने में जुटी हुई है। भले ही लोकसभा और विधानसभा चुनाव में अंतर होता है लेकिन राष्ट्रीय फलक पर प्रभावकारी मुद्दे भी इन पर अपना असर छोड़ते हैं, इसमें कोई शक नहीं। दूसरी बार सत्ता संभालने के बाद मोदी सरकार ने ढेर सारे ऐसे बड़े फैसले लिए हैं, जिनका असर इन चुनावों पर भी जरूर पड़ेगा। चाहे वह मुस्लिम महिलाओं को तीन तलाक जैसी कुप्रथा से मुक्ति दिलाना हो या जम्मू-कश्मीर में लागू अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी करना। मोदी सरकार के इन साहसिक फैसलों का प्रभाव इन चुनावों पर नहीं पड़ेगा, ऐसा सोचना भी मूर्खता होगी।
इन कड़े और बड़े फैसलों के आलोक में भाजपा के लिए सब हरा-हरा ही है, ऐसा भी नहीं है। तीन तलाक को खत्म कर सदियों से चली आ रही इस कुप्रथा पर प्रभावी रोक लगाने वाले इस कदम का मुस्लिम महिलाओं ने भले ही खुले दिल से स्वागत किया है लेकिन यह भी एक सत्य है कि पुरुष वर्ग झल्लाया हुआ है। अकेले महाराष्ट्र में ही मुस्लिमों की आबादी 11.5 प्रतिशत है। ऐसे में इस फैसले का वोटों पर क्या असर पड़ेगा, यह भी देखने वाली बात होगी। हालांकि पार्टी को मुस्लिम महिलाओं के एक वर्ग का समर्थन जरूर मिलेगा, इसमें कोई शक नहीं। इस तरह से कहा जा सकता है कि तीन तलाक खत्म कर पार्टी ने एक बड़ा दांव चला है जिसके कुछ खतरे हैं तो कुछ फायदे भी हैं। इससे इतर आर्थिक मंदी के असर से बंद होती कंपनियां और बेरोजगार होते लोगों की नाराजगी भाजपा के सामने एक बड़ी चुनौती है। भाजपा के न चाहते हुए भी ये मुद्दे विपक्ष के शीर्ष एजेंडे पर हैं।
अब जनता दोबारा भाजपा सरकार चुनती है या विपक्षी दलों को मौका देती है, यह तो भविष्य के गर्भ में है। कौन जीतेगा कौन हारेगा अभी से यह कह देना उपयुक्त नहीं होगा। लेकिन पार्टियों के प्रचार को देखते हुए इतना तो कहा ही जा सकता है कि भाजपा अपने विरोधियों से मीलों आगे है। जनसभाओं में उमड़ती भीड़ और कार्यकर्ताओं के उत्साह को अगर आधार मानें तो मतदान से पहले ही भाजपा लहालोट है। वहीं, विपक्षी दलों के भीतर अभी से मुर्दनी छाई हुई है।


 
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