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अंग्रेजों की चाल से हुआ जम्मू-कश्मीर का ऐसा हाल

04/07/2019

मनोज ज्वाला
म्मू-कश्मीर का जो हाल एक जटिल समस्या के रुप में हमारे सामने है, वह ब्रिटिश-अमेरिकी साम्राज्यवादी कूटनीति के क्रियान्वयन का परिणाम है। इसकी शुरुआत उन्हीं दिनों हो गई थी, जब ईस्ट इंडिया कंपनी ने जम्मू-कश्मीर के महाराजा गुलाब सिंह के दरबार में एक अंग्रेज रेजीमेंट को दाखिल करने की चाल चली। अंग्रेजों का उद्देश्य इसके गिलगित-क्षेत्र को अपने कब्जे में करना था। उनकी मंशा यह थी कि भविष्य में दक्षिण-पूर्व एशिया की सैन्य निगरानी तथा सोवियत रूस व चीन की घेराबंदी के लिए ब्रिटिश अमेरिकी सैन्य गतिविधियों के संचालनार्थ एक सुविधाजनक इलाका हासिल हो जाएगा। इसी कूटनीति के तहत अंग्रेजों ने इस क्षेत्र के विकास के नाम पर 'गिलगित एजेंसी' कायम कर सन 1889 में इसे अपने प्रशासनिक नियंत्रण में ले लिया। 1925 में जम्मू-कश्मीर रियासत के नये उतराधिकारी हरि सिंह को अंग्रेजों की चाल समझ में आई तो उन्होंने गिलगित से अंग्रेज सैनिकों को हटा कर अपनी सेना तैनात कर दी। फिर तो ब्रिटिश हुक्मरानों ने महाराजा के विरुद्ध कश्मीर के एक शिक्षक शेख अब्दुल्ला को उस रियासत का शासक बना देने का प्रलोभन देकर खड़ा कर दिया, जिसने स्थानीय मुसलमानों का 'मुस्लिम कान्फ्रेंस' कायम कर उग्र हिंसक आंदोलन छेड़ दिया। सन 1946 में उसने 'महाराजा कश्मीर छोड़ो' का नारा देते हुए जनता को भड़काना शुरू कर दिया। तब उसे राजद्रोह के आरोप में बंदी बना लिया गया। उसकी रिहाई के लिए जवाहरलाल नेहरु वहां पहुंच गए, किन्तु रियासत की पुलिस ने उन्हें हिरासत में लेकर जम्मू-कश्मीर की सीमा से बाहर कर दिया। नेहरुजी उस घटना को अपना अपमान समझ कर महाराजा के विरुद्ध प्रतिशोध की गांठ बांध लिए। 
द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद अंग्रेज हुक्मरानों द्वारा जब यह तय कर लिया गया कि भारत को विभाजित कर के छोड़ जाना है इस बाबत 'इंडियन इंडिपेंडेन्स एक्ट' के तहत भारत व पाकिस्तान दो डोमिनियन कायम कर सैकड़ों देशी रियासतों के राजाओं को किसी एक में शामिल हो जाने को अधिसूचित कर दिया गया तब अमेरिका-निर्देशित ब्रिटिश कूटनीति की सामरिक आवश्यकतानुसार वायसराय माउंट बेटन जम्मू-कश्मीर को पाकिस्तान में शामिल करने हेतु महाराजा पर दबाव बनाने लगे। क्योंकि, सामरिक महत्व के इस क्षेत्र को नवसृजित राज्य पाकिस्तान में मिला देने से दोनों मित्र देशों को (ब्रिटेन-अमेरिका) रूस व चीन के विरुद्ध सैन्य घेराबंदी हेतु उसका मनमाना सामरिक इस्तेमाल करने में ज्यादा सुविधा होती। अंग्रेज लेखक जोसेफ कॉरबेल ने अपनी पुस्तक- 'डेंजर इन कश्मीर' में लिखा है- '19 जून 1947 को माउंट बेटन श्रीनगर चले गए, जहां चार दिन रह कर महाराजा को समझाते रहे कि वे आगामी 15  अगस्त से पहले अपनी रियासत के भविष्य का निर्धारण कर लें और बेहतर होगा कि वे पाकिस्तान में ही अधिमिलन कर दें। किन्तु महाराजा को राजी करने में वे सफल नहीं हो सके'। ब्रिटिश लेखक लॉरी कालिन्स ने 'माउंट बेटन एण्ड इंडिपेंडेंट इंडिया' में माउंट बेटन के हवाले से ही लिखा है- 'मैंने बड़ी मुश्किल से पटेल को मना लिया था कि वे पाकिस्तान में जम्मू-कश्मीर के शामिल होने का बुरा न मानें, लेकिन मेरी सारी योजना गुड़-गोबर हो गई, तो मुझे बहुत दुख हुआ और यह सब उस ब्लडी फूल हरि सिंह के कारण हुआ'। फिर वे रियासत के प्रधानमंत्री रामचन्द्र काक की ब्रिटिश पत्नी के माध्यम से उन पर और उनके माध्यम से महाराजा पर दबाव डलवाने लगे कि वे रियासत को या तो पाकिस्तान में शामिल कर दें, या 'यथास्थिति' अर्थात स्वतंत्र रखने की घोषणा कर दें। काक ने पाकिस्तान जाकर जिन्ना से रियासत की 'यथास्थिति' का समझौता भी कर लिया था, किन्तु महाराजा को जब साजिश का पता चला, तब उन्होंने उसे मंत्री पद से हटा कर पटेल की सलाह पर पंजाब उच्च न्यायालय के न्यायाधीश मेहरचन्द महाजन को प्रधानमंत्री नियुक्त किया।
ऐतिहासिक तथ्य बताते हैं कि रियासती सेना के अंग्रेज अफसरों द्वारा माउंट बेटन ऐसी भी व्यवस्था कर चुके थे कि पाकिस्तान अगर जम्मू-कश्मीर पर हमला कर दे, तो उसके लिए सैन्य-प्रतिरोध का सामना करना आसान रहे। सी. दासगुप्ता की पुस्तक 'वार एण्ड डिप्लोमेसी इन कश्मीर' के अनुसार 25 अक्टूबर 1947 को सुरक्षा समिति की हुई बैठक में यह रहस्य खुला कि पाकिस्तान समर्थित कबायलियों का हमला हो जाने के पश्चात उसका मुकाबला करने के वास्ते रियासत की ओर से भारत सरकार से हथियारों की मदद मांगे जाने पर सरदार पटेल  द्वारा तत्सम्बन्धी आदेश जारी कर दिए जाने के बावजूद भारत के तत्कालीन सर्वोच्च सैन्य कमाण्डर जनरल लॉकहर्ट और फील्ड मार्शल ओकेनलॉक टालमटोल करते रहे थे। उनका कहना था कि जम्मू-कश्मीर किसी भी डोमिनियन में शामिल नहीं हुआ है, इस कारण हथियार नहीं भेजे जा सकते। नतीजा यह हुआ कि पाकिस्तानी सेना के आधुनिक हथियारों से लैश हमलावर रियासत के बड़े क्षेत्रों पर कब्जा करते हुए आगे बढ़ते रहे और रियासती सेना शहादत चुकाती रही। अंततोगत्वा महाराजा ने मेहरचन्द महाजन की सलाह से रियासत की रक्षा के लिए सैन्य-याचना करते हुए उसका भारत में विलय कर देने सम्बन्धी अधिमिलन-पत्र हस्ताक्षरित कर उन्हीं के हाथों दिल्ली भेजवाया। तब वहां जवाहरलाल नेहरु ने हरि सिंह से प्रतिशोध लेने के लिए उन्हें नीचा दिखाने और अपने दोस्त शेख अब्दुल्ला की हैसियत चमकाने हेतु यह शर्त लगा दी कि विलय तभी स्वीकार होगा, जब महाराजा रियासत के शासन की बागडोर शेख अब्दुल्ला को सुपुर्द कर दें और शेख विलय की सहमति दें। नेहरु के इस अड़ियल रुख को माउंट बेटन भी हवा देते रहे, ताकि विलय में विलम्ब हो और उधर पाकिस्तानी हमलावर आगे बढ़ते हुए सामरिक महत्व के अधिकाधिक भू-भाग अपने कब्जे में कर लें। अंततः महाराजा को शेख अब्दुल्ला के हाथों शासन की बागडोर सौंपनी पड़ी तब 27 अक्टूबर 1947 को भारतीय सेना श्रीनगर भेजी गयी। लेकिन तब तक बहुत विलम्ब हो चुका था। जम्मू-कश्मीर रियासत के प्रधानमंत्री पद पर मेहरचन्द महाजन जैसे सुयोग्य व्यक्ति के रहते हुए भी शेख अब्दुल्ला को शासनिक प्रधान बना दिए जाने और हमलावरों को खदेड़ने के लिए वहां भेजी गई सैन्य टुकड़ी की 'ओवरऑल कमान' भी उसी के हाथों सौंप देने का परिणाम यह हुआ कि उसने केवल कश्मीर घाटी व बारामुला आदि अपने प्रभाव क्षेत्र को मुक्त करा लेने के बाद सेना को आगे बढ़ने ही नहीं दिया। फलतः पाकिस्तानी हमलावर आगे बढ़ते-बढ़ते गिलगित के निकट पहुंच गए। फिर तो 31 मार्च  1947 को माउण्टबैटन की शतरंजी विसात के सिपाही, अर्थात गिलगित क्षेत्र में पहले से तैनात 'गिलगित स्काउट्स पारा मिलिट्री फोर्स' के कमाण्डिंग चीफ मेजर विलियम ब्राउन ने अपने जवानों के साथ गिलगित के वजीरे वजारत घनसारा सिंह के आवास को रात में घेर कर उसकी हत्या कर दी और वहां पाकिस्तानी झण्डा फहरा दिया। इस तरह से ब्रिटिश-अमेरिकी समर-कूटनीति के क्रियान्वयन हेतु लक्षित-वांछित कश्मीरी भूभाग पर पाकिस्तान का कब्जा हो गया। तब माउंट बेटन ने नेहरुजी को संयुक्त राष्ट्र संघ में भेज दिया तथा एकतरफा युद्ध-विराम की घोषणा करा दी और नियमानुसार विधिवत हो चुके विलय को अंतरराष्ट्रीय विवाद का रुप देकर भारत के निहायत आन्तरिक मामले में ब्रिटिश-अमेरिकी हस्तक्षेप का दरवाजा सदा के लिए खोल दिया।
(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।) 


 
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