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खुशहाल परिवार है उन्नत स्वास्थ्य का स्रोत

15/10/2019

खुशहाल परिवार है उन्नत स्वास्थ्य का स्रोत


भारत में अगर किसी एक सामाजिक संरचना को सब से अधिक महत्व दिया गया है तो वह है परिवार व्यवस्था। यह हमारे देश की संस्कृति का एक अविभाज्य अंग है। संस्कृति की मौलिकता, भौतिक पहलू या धार्मिक एवं अध्यात्म सम्बन्धी जीवन व्यतीत करने की राह जैसे सूत्र को परिवार व्यवस्था में परस्पर स्थान मिला है। हमारी संस्कृति में एक ओर महान संत-संन्यासियों की परंपरा है, तो वहीं दूसरी ओर परिवार व्यवस्था भारत भूमि की जीवंत विविधताओं का सुन्दर विवरण है। लोग सदियों से अपना जीवन संयुक्त या बड़े परिवारों में व्यतीत करते आ रहे हैं। मुझे याद है, बचपन में जब गांव जाया करते थे तो परिवार होने का एहसास सिर्फ परिवारजन तक ही सीमित नहीं होता था, सारा गांव ही परिवार जैसा लगता था।

एक सुखद परिवार बहुत गहरी शांति, सुरक्षा, समृद्धि और शक्ति का भण्डार है। स्वर्ग या नरक कहीं ऊपर नहीं है- वह यहीं आपके घर में ही घटित हो रहे हैं। खुशहाल परिवार आपके जीवन को उन्नत स्वास्थ्य और आनंद से भर देगा ।

छोटे शहरों में ही सही, संयुक्त परिवार में रहने का अपना ही एक अलग आनंद हुआ करता था। जब आप एक ऐसी व्यवस्था में रहते हैं, तो साथ उठना-बैठना, हंसना-रोना, एक दूसरे से अपनी बात साझा करना, परिवार के संचालन में अपना योगदान, त्योहारों का सामूहिक आयोजन, एक दूसरे की देखभाल और एक दूसरे को आगे बढ़ाना…. यह सब जीवन का आम हिस्सा होता है। दरअसल आप परिवार को एक पाठशाला की तरह भी देख सकते हैं, जहां आपकी पढ़ाई हर समय चल रही होती है, हर क्षण आप सीख रहे होते हैं और जाने या अनजाने में यह व्यक्तित्व का आधार भी बना रही होती है। हर सदस्य ‘टीचर’ है और ‘स्टूडेंट’भी। यह आदान- प्रदान निहायत चलायमान है और समय-समय पर बदलता रहता है। परिवार मनुष्य की सबसे मूलभूत प्रवृत्ति की पूर्ति करता है।

सामाजिक सम्बन्ध और मेल-जोल की आवश्यकता जो जीवन को एक सार्थक आयाम प्रदान करती है, हम यहीं से प्रेम का अनुभव करते हैं। इसी मंच से सहयोग, सहनशीलता, साहस और स्थिरता आती है तथा अपने जीवन में आगे बढ़ने की प्रेरणा भी मिलती है। यह बात समझना अनिवार्य है कि परिवार की सामूहिक स्तिथि आपको भावनात्मक और मानसिक रूप से सींचती है, जो सीधा सीधा आपके स्वास्थ्य पर असर डालता है। यह व्यवस्था संयुक्त परिवार में और भी प्रबल रूप से लागू होती है। इसलिए ऐसे परिवार के मुख्य संचालक का यह दायित्व है कि सभी सदस्यों को सामान दृष्टि से देखे, अपने-दूसरे का भेद न होने दे तथा सबके व्यक्तिव के विकास में सच्चा मार्गदर्शन कर सबको प्रेरित करे। आज महानगरों में परिवार व्यवस्था घट के चार या तीन सदस्यों की रह गई है और यहां भी सुख-शान्ति और परस्पर संबंधो का अभाव होते दिख रहा है।

नतीजा यह है कि सामजिक सम्पर्क घट गया है, खुशियां और मुश्किलें बांटने की सीमाएं सिकुड़ गई हैं और अपने मन की बात कहने और विश्वास करने के जरिये भी कम हुए हैं। गलत नहीं होगा, अगर आप टेलीविज़न, सोशल मीडिया और सिर चढ़ कर बोल रही भौतिक सोच को इसका श्रेय दें। परिणाम बोझिल मन और मलिन भाव, जो शरीर में व्याधियों के जनक हैं। अंतरराष्ट्रीय शोध के मुताबिक, बीसवी सदी में मानसिक रोग सब से अधिक बढ़े, जिन में डिप्रेशन सब से आगे है और यह संयोग की बात बिलकुल नहीं हो सकती। तो अब प्रश्न उठता है कि इस स्थिति का निवारण कैसे हो, आइये इस पर गौर करें-अपने समय का काम और परिवार में स्पष्ट और सन्तुलित विभाजन करें और परिवार के साथ घर पर तथा बाहर समय बिताएं। ‘कम्युनिकेशन लाइनों’ को ‘ओपन’ रखें और खुल कर अपने विचारों की अभिव्यक्ति करें। सभी सदस्य दिन की शुरुआत को सकारात्मकता से भर लें। रात्रि का भोजन अवश्य साथ में हो।

एक दूसरे पर विश्वास और परस्पर सम्मान को बढ़ावा दें। एक दूसरे को अछे स्वास्थ्य के लिए प्रेरित करें। टेलीविज़न पर और आॅनलाइन साथ बिताये हुए समय को ‘फैमिली-टाइम’ समझने की गंभीर भूल न करें !! क्षमा, एक दूसरे को स्वीकार करना और बिना शर्त प्रेम सभी कुंठाओं और शिकायतों को दूर करता है। इसका अभ्यास नित्य करना होगा। पंच यज्ञों के बारे में पढ़ उनका भाव समझें और जीवन में उतारें।


 
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