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उ.प्र: अपनों के बीच बेगानी हुई कजली, नहीं दिखता विरह का धुन

11/07/2019

गिरजा शंकर
मीरजापुर, 11 जुलाई (हि.स.)। रिमझिम बारिश की फुहार, पेड़ों पर लगा झूला, विरह वेदना या श्रृंगार की धून में मधूर-मधूर कानों को आनंद पहुंचाता गीत। जगह-जगह सजी महफिल पीड़ा में भी दवा की तरह काम करने वाला मीरजापुर की कजली आज खुद पीड़ित हो गई है। बदलती दुनिया ने इस कजली को भूला दिया है, जिसे सुनने के लिए लोग लालायित रहते थे। यह कजली पूरे देश में प्रसिद्ध थी।
बाग-बगीचों एवं आंगन के पेड़ों की डालियों पर पड़ने वाले झूलों पर “पिया मेहंदी लिया दा मोतझील से, जाइके साइकिल से ना।” अब ऐसे मनभावन और दिल को छू लेने वाले लोकगीत सुनने को कम ही मिलते हैं। 
आषाढ़ व श्रावण मास में प्रकृति भी मानो रूठने लगी है। मीरजापुर की कजली कभी महत्वपूर्ण स्थान रखती थी लेकिन अब इसका अभाव नजर आ रहा है। गांव की गलियों और धान की रोपाई तथा झूला झूलते हुए महिलाएं एवं युवतियां अपने मनोभावों को कजली के माध्यम से व्यक्त करती रही हैं। गांव की युवतियों द्वारा गायी जाने वाली कजली गीत की रचना कवि साहित्कारों ने अपनी पुस्तक में की है।
मीरजापुर के माटी की सुगंध है कजली
मीरजापुर कजली यहां की माटी की सुगंध के लिए भी जानी जाती है। इसमें विरह बेदना के संगीत के लय सुर हैं। कजली की लयबद्धता में भौजाई अपनी ननद से अकेले घर से बाहर निकलने से मना करती है। इसे वह 'कइसे खेले जाबू सावन में कजरिया, बदरिया घेरि आई ननदी', के जरिए अपनी बात कहती है।
लीला रामनगर की भारी कजली मीरजापुर सरनाम
मीरजापुर, की कजली की परम्परा सैकड़ों वर्ष पुरानी है। यह भादों कृष्ण पक्ष द्वितीया की रात को पूरे जनपद में एक साथ गायी जाती है। तभी तो कहा गया है कि “लीला रामनगर की भारी, कजली मिर्जापुर सरनाम’ लेकिन पश्चिमी सभ्यता के बढ़ते चलन व मौसम की बेरुखी के चलते कानफोड़ू अश्लील फिल्मी गीतों के कारण कजली जैसी लोकगीत अपनों के बीच बेगानी हो रही है।
मीरजापुर के नारघाट व वाराणसी के कचौड़ी गली से भी जुड़ा है कजली का इतिहास
साहित्यकार डाॅ. बैजनाथ पांडेय ने बताया कि कभी मलिक मुहम्मद जायसी, आधुनिक कविता के जनक भारतेंदु हरिश्चंद्र ने मिर्जापुर की कजली को काफी महत्व दिया था।
अंतरारष्ट्रीय लोकगायक डाॅ. मन्नू यादव ने बताया कि मिर्जापुर की कजली का इतिहास जनपद मुख्यालय के नारघाट व वाराणसी के कचैड़ी गली से भी जुड़ा है। इसे आजादी के दौरान वाराणसी की एक प्रेमिका ने अपने प्रेमी के विरह में नारघाट के नारंग की याद में गायी थी कि मिर्जापुर कईलय गुलजार हो, कचौड़ी गली सुन कइल बलमु। उन्होंने बताया कि भारतीय संस्कृति में अपनी अलग पहचान बनाने वाली कजली अब विलुप्त होती जा रही है।

हिन्दुस्थान समाचार


 
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