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सामुदायिक जीवन पद्धति बचायेगी पर्यावरण

04/06/2019

(विश्व पर्यावरण दिवस, 5 जून पर विशेष)
 राकेश राणा
र्यावरण समग्रता का नाम है। जिसमे हवा, मिट्टी, पशु-पक्षी, पेड़-पौधे और इस सृष्टि का कण-कण समाहित है। सब कुछ पर्यावरण का अभिन्न अंग है। यह उस सामुदायिकता का पर्याय है जिसे जीवन कहते हैं। हमारे जीवन पर होने वाला कोई भी प्रभाव पर्यावरण से जुड़ा है। मनुष्य स्वयं पर्यावरण का एक घटक मात्र है। प्रकृति अपने आप में एक सामुदायिकता है जिसमें सबका अस्तित्व एक-दूसरे से जुड़ा है। शायद इसीलिए मनुष्य का जीवन सामुदायिक जीवन के रूप में विकसित हुआ। मानव और प्रकृति का रिश्ता अटूट है। गांधीजी कहा करते थे कि यह धरती सभी जीवों की सभी आवश्यकताओं को पूरा कर सकती है किन्तु लोभी व्यक्ति की इच्छाओं की पूर्ति नहीं कर सकती। 
विडम्बना यही है कि आज भोग और विलासिता ही मानव की जीवन शैली बन गयी है। मनुष्य प्रकृति के साथ सामुदायिक जीवन पद्धति के आधार पर जो जीवन जीता था, उससे वह दूर हो चला है। इसी का परिणाम पर्यावरण संकट है। आज जिस तथाकथिक आधुनिक जीवन पद्धति को अख्तियार कर मनुष्य सभ्यता की उंचाईयां चढ़ना चाहता है वह उसे ऐसी खाई में ले जाकर गिरेगी, जहां उसका अस्तित्व ही खतरे में होगा। आधुनिक जीवन शैली-भोग विलास जिसके नारे हैं, विकास जिसका बहाना है, उसी से ये तमाम खतरे जन्मे हैं। हम तथाकथित सभ्य और समझदार कहे जाने वाले आधुनिक समाज से तो वे आदिवासी बेहतर हैं जो मनुष्य और प्रकृति के उस रिश्ते को समझते हैं। वे प्रकृति के साथ पूरी श्रद्धा और आस्था से जीते हैं। वे जीवन, जल, जंगल और जमीन के उस संबंध को जिससे नैरन्तर्य बना हुआ है, उस प्रकिया की गहरी और वैज्ञानिक समझ रखते हैं। उनके पेड़ों के काटने का ढंग कितना वैज्ञानिक है कि वह पेड़ काटने के बाद भी सूखने की बजाय जीवन्त हो उगता है। उन्हें पता है कि पेड़ की छाल का प्रयोग पेड़ को बिना नुकसान पहुचाएं कैसे करना है। वे जानते हैं कि पेड़ों से फल, पत्तियां कब और कितनी लेनी है, ताकि जरूरत भी पूरी होती रहे और पेड़ भी बचे रहें। जीवन की इस समग्रता को वे अनपढ़ आदिवासी समझ सकते हैं तो पढ़ा-लिखा सभ्य समाज क्यों नहीं समझ सकता है। वहां तो प्रकृति के साथ ईमानदार रिश्ता है। एक सामुदायिक जुड़ाव है। इस सामुदायिक सोच के साथ ही मनुष्य सम्पूर्ण जीवन जी सकता है। सब चीजों पर सबका समान अधिकार है। फिर मनुष्य कौन होता है कि वह मनमानी करे? आज उसने पेड़ों को काटकर वनों का सफाया कर दिया। वन्य जीवों को मार कर अपनी जिन भोग-विलासिता के साधन और सुविधाएं जुटायी है। ये ही उसके विनाश का कारण बनेगी। पर्यावरण को नुकसान कर वह ऐसी गलती कर रहा है कि जिस डाल पर बैठा है, उसे ही काट रहा है। वनों को काटकर धरती को नंगा कर रहा है। अनेक वन्य प्रजातियों को बेघर कर रहा है। विकास के नाम पर धरती के पानी को विषाक्त बना रहा है। हवा को जहरीला कर रहा है। क्या आने वाली पीढ़ियां हमे माफ करेंगी? जब उन्हें जन्म लेते ही जानलेवा बीमारियां चपेट में ले लेगी। हरियाली की जगह सूखे और अकाल उनकी नियति होंगे। इन्हीं का खामियाजा आज मानव को प्राकृतिक आपदाओं के रूप में भुगतना पड़ रहा है। परिणाम सूनामी, तूफान, बाढ़, भूकम्प, सूखा, अकाल और जल संकट है। इन समस्याओं की वजह मानवीय क्रिया-कलाप हैं। मनुष्य का जीवन जीने का तरीका इतना पर्यावरण विरोधी है जैसे लगता है कि मानव शायद प्रकृति के प्रति अपने उस रिश्ते और दायित्व को बिल्कुल ही भूल गया है। इस प्राकृतिक संबंध से विमुखता ही सभी संकटों की जननी है। पर्यावरण जो मानव जीवन का संरक्षण और पोषण करता था, आज वह मानव अस्तित्व के लिए नयी-नयी चुनौतियां पैदा कर रहा है। दुनिया की सलामती और खुशहाल जीवन की संभावनाएं तथा पीढ़ियों का भविष्य पर्यावरण संरक्षण में ही निहित है। पर्यावरण संरक्षण के लिए सामुदायिक जीवन पद्धति की ओर लौटना ही होगा। मानवीय प्रयासों की दिशा इको-फ्रेंडली हो और ईमानदार प्रयास हो। तमाम आविष्कार, परिष्कार, अनुभव, अनुसंधान और विचार पर्यावरणोन्मुखी हो, तभी मानव एक खुशहाल जीवन की ओर बढ़ सकेगा। मानवीय क्रिया-कलापों में पर्यावरण संरक्षण कितनी अहमियत है। हमारी जीवन पद्धति कितनी सामुदायिक है। मनुष्य प्रकृति के साथ कितने तादात्म्य के साथ जीता है। इसी से मानव जाति का भविष्य तय होगा। 
मनुष्य के तमाम क्रिया-कलाप और चिंता का विषय यह हो कि कैसे समग्रता के साथ जीवन जिया जाए। हिंसामुक्त और प्रदूषण रहित क्रिया-कलापों के साथ खुशहाल जीवन को कैसे जियें। हमारा खुशियां मनाने का ढंग, अपने तीज-त्यौहारों को मनाने का ढंग इको-फ्रेंडली हो। मनुष्य अहिंसक स्वरुप वाली शाकाहारी जीवन शैली की तरफ बढ़े। मानवीय सुख-सुविधाएं कम से कम ऊर्जा खपत की शैली में विकसित हों। प्राकृतिक संसाधनों का अनुचित और अत्यधिक दोहन न हो। अनावश्यक वस्तुओं के संचय से मनुष्य बचे। मानवीय भ्रमण प्रकृति पोषक हो। धार्मिक-सांस्कृतिक आस्थाओं और परिस्थितिकीय तंत्र में संतुलन सधा रहे। इसके लिए जरूरी है कि सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक गतिविधियां प्रकृति अभिमुखी हों। सभी समुदाय त्यौहारों को प्रदूषण रहित ढंग से मनाएं। प्राकृतिक संसाधनों से निर्मित वस्तुओं के प्रति मितव्ययी बनें। पर्यावरण संरक्षण आज मुख्य चुनौती है। इसके लिए जमीनी और दीर्घकालीन प्रयास करने होंगे। भावी पीढ़ियों को प्रकृति के प्रति संवेदनशील बनना होगा। बच्चों में बचपन से वे संस्कार डालने होंगे जो पर्यावरण को पोषित करने वाले हों। उनमें पशु-पक्षियों और पेड़-पौधों के प्रति लगाव तथा प्रकृति के प्रति अनुराग पैदा करना होगा। हवा-पानी जैसे जीवन स्त्रोतों के प्रति आस्था भाव पैदा करना जरूरी है। यह सब प्रयास हमारी जीवन शैली का हिस्सा बनें। तभी पर्यावरण बचेगा और तभी मनुष्य भी बचेगा। सामुदायिक जीवन पद्धति में ही पर्यावरण संरक्षण निहित है। यह बात समय रहते मानव जाति को समझ लेनी होगी। इसलिए मानव-समाज को सामुदायिक जीवन पद्धति का निरंतर संरक्षण और संवर्द्धन करना होगा। मानवीय क्रिया-कलापों को प्रकृति की ओर लौटना होगा। समय रहते संभलिए, आने वाली नस्लों को जवाब देना होगा। अन्यथा भाषणों और आलेखों में विश्व पर्यावरण दिवस मनाने का औचित्य नहीं है।
(लेखक युवा समाजशास्त्री हैं।)


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