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वरिष्ठ पत्रकार राम बहादुर राय की पुस्तक 'नीति और राजनीति' का लोकार्पण

22/02/2020

विजय लक्ष्मी
नई दिल्ली, 22 फरवरी (हि.स.)। वरिष्ठ पत्रकार राम बहादुर राय की पुस्तक 'नीति और राजनीति' का शनिवार को लोकार्पण किया गया। नेहरू स्मारक और संग्रहालय के साथ प्रज्ञा संस्थान ने संयुक्त रूप से पुस्तक का लोकार्पण और उस पर चर्चा आयोजित की। इस मौके पर वरिष्ठ चिंतक गोविंदाचार्य, वरिष्ठ पत्रकार अच्युतानंद मिश्र, जवाहरलाल कौल, एनके सिंह, हरीश खरे, जनसत्ता के संपादक मुकेश भारद्वाज, इंडिया टुडे के संपादक अंशुमान तिवारी, बीबीसी के स्तंभकार रेहान फजल ने पुस्तक और लेखक के महत्व पर प्रकाश डाला। 

चर्चा की शुरुआत करते हुए जनसत्ता के संपादक मुकेश भारद्वाज ने कहा कि नीति और राजनीति सत्ता से सवाल कैसे करें, यह बताती है। यह बताती है कि हर बार अच्छा कैसे लिखें। यह पत्रकार के भीतर की आग का प्रकटीकरण करती है। यह किताब बताती है कि पत्रकार के भीतर यह आग जलती रहनी चाहिए।

इंडिया टुडे के संपादक अंशुमान तिवारी ने कहा कि हम अपने निकट का इतिहास अवश्य ठीक से जानें। यह पुस्तक राजनीतिक संक्रमण काल को विस्तार से सामने रखती है। पत्रकारिता और राजनीति को समझने के लिए यह पुस्तक मददगार होगी। रेहान फजल ने कहा कि समसामयिक विषय पर पकड़ होने के साथ-साथ निर्भीकता भी है राय साहब के लेखन में। आपात काल के बहुत निकट जानकार हैं। चार दशक तक भारत की राजनीति को बहुत नजदीक से देखा है। 

वरिष्ठ पत्रकार एनके सिंह ने कहा कि राय साहब संत पत्रकार हैं। हर पत्रकार को पढ़नी चाहिए नीति और राजनीति। डीप रिपोर्टिंग के लिए जरूरी है पढ़ना। आज पत्रकारिता में जमीर बचाना बहुत मुश्किल है। जरा सी कीमत मिलते ही लोग अपना जमीर बेच देते हैं। राम बहादुर राय भारतीय संविधान की रचना की घटनाओं के वे अकेले और अधिकृत जानकार हैं। राय साहब का पूरा व्यक्तिव और लेखन तथा विचार यात्रा को अध्ययन के लिए जरूरी है। आज उसी तेवर की पत्रकारिता की जरूरत है जो 1998 से 2004 में राय साहब ने प्रकट की। जबकि हरीश खरे ने कहा कि पत्रकार होने के साथ राजनेता की निकट होने के बावजूद उनसे कैसे दूरी रखी जाए, यह राय साहब के जीवन व लेखन से सीखा जा सकता है। 

वरिष्ठ पत्रकार जवाहर लाल कौल ने कहा कि पुस्तक साफगोई की मिशाल है। उस दौर में जो चुनौतियां थीं, वे आज भी दिखती हैं। बात हमेशा लोकतंत्र की होती रही और पार्टियां लोगों के इर्द-गिर्द घूमने लगी हैं। निर्भीकता से बात कहने वाला साहस होना चाहिए। 

गोविंदाचार्य ने इस मौके पर कहा कि रामबहादुर के मामले में कह सकते हैं कि किसी भी पद से बड़ा उनका कद है। केवल सत्ता, राजनीति और दलगत राजनीति के खांचे में न देखें। यह पुस्तक एक कालखंड की बात कहती है जो हर कालखड के लिए प्रासंगिक है। भारत की तासीर के साथ मेल खाटी राजनीति अभी बनाना बाकी है। भारत की राजनीति में सभ्यता की यात्रा की यात्रा परिलक्षित होती है। उस यात्रा से होती हुई अपनी नियति को प्राप्त होगी। उन्होंने कहा कि एक समय में बाहुबल, फिर दो दशक तक धनवाल का प्रभाव रहा। जमीन, जल, जंगल और जानवर को जोड़कर समग्र विकास की बात सोचनी होगी। जो अच्छा करे उसे अपना नेता मानें। 

वरिष्ठ पत्रकार अच्युतानंद मिश्र ने परिचर्चा की अध्यक्षता करते हुए कहा कि इस पुस्तक में एक दौर की राजनीति का सामान्य विश्लेषण नहीं है। यह लेखक के अध्ययन और अनुभव के साथ मूल स्रोत से तथ्य जुटाकर अदभुत शैली को सामने लाती है। इस श्रृंखला की चारों पुस्तक जब सामने आएंगी तो पूरा प्रवाह दिखेगा और वह राजनीति को नई दिशा और चेतना दिखाने का काम करेगी। 

 हिन्दुस्थान समाचार


 
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