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रानी लक्ष्मी बाई के वंशजों की कौन लेगा सुध!

17/06/2019

(पुण्यतिथि, 18 जून पर विशेष) 

प्रो. श्रीराम अग्रवाल
'मैं अपनी झांसी नहीं दूंगी' के उद्घोष के साथ अंग्रेजों के विरुद्ध 1857 की क्रान्ति का शंख फूंकनेवाली महारानी लक्ष्मीबाई को कौन नहीं जानता। उनकी वीरता के किस्से लोगों की जुबान पर हैं। 16 जून 1858 को झांसी के किले से प्रत्यक्षतः युद्धभूमि में कूदकर उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ दुर्घर्ष प्राणन्तक संघर्ष किया। 18 जून 1858 को अन्तिम सांस लेने तक उन्होंने समर्पण नहीं किया। मां भारती के स्वाभिमान की रक्षा के लिए अंतिम क्षण तक संघर्ष करती रहीं। ग्वालियर में बाबा गंगादास की कुटी में उन्होंने प्राणोत्सर्ग किया। उनके शरीर को अंग्रेज छू न सकें, इसके पहले ही खुद को आग के हवाले कर दिया। इस तरह इस वीरांगना ने अपने आन-बान और शान की रक्षा की। अपना,अपनी झांसी का और राष्ट्र का स्वाभिमान बनाये रखा। रानी के उसी स्वाभिमान की धरोहर संजोये उनकी पीढ़ी आज भी स्वावलम्बन और स्वाभिमान के साथ आम नागरिक की तरह शांतिपूर्वक जीवन यापन कर रही है। अंग्रेजों के शासनकाल में, उनकी पीढ़ियों ने दुर्घर्ष संघर्ष के साथ अभावपूर्ण जीवनयापन किया। अपने को लगभग गुमनामी में रखते हुए रानी की तीसरी व चौथी पीढ़ी के वंशज, क्रमशः लक्ष्मण दामोदर राव एवं कृष्ण लक्ष्मण राव, परिवार पालने के लिए कोर्ट-कचहरियों में स्वतंत्र रूप से टाइपिंग आदि कार्य करते रहे। बदलते हुए जमाने के अनुसार तमाम अभावों में भी सन्तुष्ट रहकर अगली पीढ़ी के राजकुंवरों को उच्च शिक्षा प्रदान कराई। वे अपनी मेधा और लगन के साथ प्रतिष्ठित शिक्षा संस्थानों से उच्च तकनीकी शिक्षा ग्रहण कर स्वतंत्र भारत की उन सरकारों के संस्थानों में सेवारत हुए जो सरकारें, उनके पूर्वजों के बलिदान के परिणामस्वरूप, स्वतंत्र भारत में सत्ताधीश बन पायीं। रानी की 5वीं पीढ़ी के वंशज अरुण कृष्ण राव मध्यप्रदेश विद्युत मण्डल में सहायक इंजीनियर के पद से सेवा निवृत्त हुए और वर्तमान में अपने पुत्र झांसी राजवंश की 6वीं पीढ़ी के कुंवर योगेश अरुण राव जो इस समय नागपुर स्थित एक बहुराष्ट्रीय कम्पनी में सॉफ्टवेयर इंजीनियर के रूप में कार्यरत हैं, के परिवार के साथ नागपुर में निवास कर रहे हैं।
रानी के बलिदान और ग्वालियर में उनके आत्मोसर्गी आत्मदाह के बाद उनके 7-8 वर्षीय पुत्र दामोदर गंगाधर राव नेवालकर जूदेव का क्या हुआ, इसका किसी को भान नहीं था। सभी ने यह मान लिया था कि झांसी के इस प्राणांतक स्वतन्त्रता संग्राम में, युद्धभूमि में अपनी मां की पीठ पर बंधे इस बालक का बच पाना कैसे संभव हो सका होगा। 5 मई, 1860 को जिन हालातों में इन्दौर पहुंचा कर, उन्हें संरक्षित किया जा सका, उन हालातों के चलते दामोदर राव और उनके साथ रह रहे रानी के विश्वस्त साथियों ने 1906 में दामोदर राव की मृत्यु तक लगभग अज्ञातवास जैसा जीवन ही व्यतीत किया। बाद में उनके पुत्र लक्ष्मण राव ने भी कभी किसी से कोई गिला-शिकवा नहीं किया। 
1959 में, एक मराठी पुस्तक में वाई. एन. केलकर की 'श्रीमन्त महाराज दामोदर जी के कथित स्वलिखित संस्मरण' के रूप में प्रकाशित लेख से उनके दुर्घर्षपूर्ण बचपन की व्यथा गाथा, स्वतन्त्र भारत के लोगों को संभवतः पहली बार जानने को मिली। इस औपन्यासिक विवरण में नयी-नयी मनगढ़ंत बातें भी जुड़ती चली गयीं। हालांकि परिवार के लोगों का दावा है कि इस लेख के लेखक ने कभी उनसे सम्पर्क नहीं किया। न ही उससे कोई बात हुई। परिवार के लोग स्वीकार नहीं करते कि दामोदर राव ने इन्दौर के पॉलिटिकल एजेन्ट के समक्ष समर्पण किया था (तब दामोदर राव की आयु तो मात्र 09 वर्ष ही रही होगी।)। हां, परिवार को इस बात की जानकारी दी गई है कि उनके साथ रहे 7-8 विश्वस्त संरक्षक दामोदर राव को लेकर रानी साहिबा के राज-मित्र झालारपाटन के महाराजा पृथ्वी सिंह के पास पहुंचे थे और उन्होंने इन लोगों को कुछ समय अपने किले में अपनी संरक्षा में रखा। तब झांसी में ब्रिटिश अधिकारियों तथा सैनिकों की आशातीत जनक्षति होने के कारण, अंग्रेजी फौज के लोग रानी के पुत्र की हत्या करने के लिए उन्हें भूखे भेड़ियों की तरह ढूंढते फिर रहे थे। फिर महाराजा पृथ्वी सिंह के सिफारिशी पत्र पर इन्दौर के पॉलिटिकल एजेण्ट सर हेमिल्टन तथा छावनी के कर्नल रिचमण्ड शेक्सपियर ने उनको इन्दौर में आकर रहने की इजाजत दे दी।
इस सन्दर्भ में उल्लेखनीय है कि प्रसिद्ध उपन्यास लेखिका सुश्री महाश्वेता देवी के 1956-57 में प्रकाशित उपन्यास 'झांसी की रानी' में महाश्वेता की लक्ष्मी बाई के इन वंशजों से भेंट का संदर्भ मिलता है। अंग्रेजों द्वारा उन्हें संरक्षण दिये जाने का संभवतः एक कारण तो यह भी रहा हो कि 1858 तक रानी की बलिदान गाथा देश-विदेश में प्रचलित हो चुकी थी। अंग्रेजों को आशंका रही होगी कि कहीं उनके पुत्र के जनता के बीच पहुंचने से रानी के नाम पर लोगों के मन में फिर किसी विद्रोह की आग न भड़क जाए। कहा जाता है कि उनके सम्मान में स्थानीय ब्रिटिश रेजीमेंट के सैनिकों के लाल कोट के बटन पर रानी लक्ष्मीबाई की मूर्ति उकेरी जाने लगी थी। परिवारजनों के अनुसार, इन्दौर में संरक्षण प्राप्त करते समय केवल 3 लोगों को उनके साथ रहने की अनुमति दी गयी थी। इसके पश्चात उनका पूरा जीवन अंग्रेजों की सैनिक छावनी में उनको दिये गये मकान में, अंग्रेज गुप्तचरों की कड़ी निगरानी में बीता। उनके प्रत्येक क्रियाकलाप तथा उनसे मिलने वालों की अंग्रेज एजेन्ट बहादुर को रिपोर्टिंग की जाती थी। इनके व्यय हेतु 10 हजार रुपये प्रतिवर्ष की सम्मान राशि निर्धारित कर दी गयी थी, जो कि लक्ष्मण राव के समय मात्र दो सौ रुपये प्रति माह व कृष्ण लक्ष्मण राव के समय मात्र सौ रुपये प्रतिमाह कर दी गयी थी। बाद में यह पूरी तरह बंद कर दी गई। तथापि अंग्रेजों ने जो वादा किया था कि रानी के सभी आभूषण तथा झांसी महल से लूटी गई सम्पत्ति तथा महाराजा गंगाधर राव के 7 लाख रुपये दामोदर राव के बालिग होने पर लौटा दिया जाएगा (जिसका उल्लेख बताते हैं कि ब्रिटिश म्यूजियम में रखी ब्लू बुक में सुरिक्षत है), उससे अंग्रेज पूरी तरह मुकर गये और उनके बालिग होने पर उन्हें कुछ भी नहीं लौटाया गया। 
दामोदर गंगाधर राव नेवालकर के पुत्र लक्ष्मण राव ( 23 अक्टूबर 1879 - 04 मई 1959) का जीवन अति अल्प आय में गुजरा। उन्होंने इन्दौर की जिला जज के प्रांगण में निजी तौर पर स्वतंत्र टाइपिस्ट का कार्य करते हुए अपने परिवार के साथ जीवन यापन किया। इन्दौर में सुरक्षित छावनी क्षेत्र में अंग्रेजों द्वारा दामोदर राव को रहने के लिये जो कोठी दी गई थी, 1906 में उनकी मृत्यु के पश्चात परिवार से खाली करा ली गई थी। उस कोठी को अंग्रेजों ने किसी प्रकार से ऐतिहासिक रूप नहीं लेने दिया। इसके पश्चात लक्ष्मण राव अपने परिवार के साथ इमली बाजार स्थित पीरगली के एक मकान में किराये पर रहने लगे। यह राजवंशी परिवार उसी पुराने व क्रमशः जर्जर हो चुके परिवार में लगभग 70 वर्ष यानी 1975 तक रहता रहा।
लक्ष्मण दामोदर राव के पुत्र कृष्ण लक्ष्मण राव (15 जून 1909-21 अगस्त 1967) ने भी अपने पिता की तरह सादगीपूर्ण जीवन व्यतीत किया। वे इन्दौर की प्रसिद्ध हुकुमचन्द कपड़ा मिल में स्टेनो व टाइपिस्ट के रूप में कार्य करते रहे। कृष्ण लक्ष्मण राव के पुत्र अरुण कृष्ण राव (जन्म 1945) की प्रतियोगी प्रतिभा के बलबूते नियुक्ति मध्य प्रदेश इलेक्टिसिटी बोर्ड में हो गयी। वे 1994 में परिवार सहित इन्दौर के धन्वतरि नगर स्थित अपने निर्मित कराये नये मकान में आ गये। 2003-2004 में असिस्टेंट इंजीनियर के पद से सेवा निवृत्त होने के उपरान्त वे अपने पुत्र योगेश अरुण राव के परिवार के साथ नागपुर में निवास कर रहे हैं। उनके पुत्र योगेश अरुण राव (जन्म 1978) ने इन्दौर में ही एक बहुराष्ट्रीय कम्पनी में साफ्टवेयर क्वालिटी विश्लेषक के पद पर कार्य करना प्रारम्भ किया। वे अपने क्षेत्र में उच्च स्तरीय विशेषज्ञता रखते हुए कई बार विदेशों में भी अपनी सेवायें प्रदान कर चुके हैं। योगेश अरुण राव के पुत्र कुंअर प्रियेश योगेश राव तथा पुत्री धनिका अभी प्रारम्भिक कक्षाओं में अध्ययनरत हैं।
झांसी के इन राजवंशियों ने न केवल ब्रिटिश सरकार परन्तु स्वतंत्र भारत की वर्तमान सहित अभी तक आयी किन्हीं भी सरकारों के समक्ष कभी हाथ पसारकर अपने परिवार के वंशानुगत किले या महलों पर अपना दावा पेश करने का प्रयास तो क्या, इच्छा भी व्यक्त नहीं की। दुखद यह कि आजाद भारत की सरकारों ने भी यह जानने की आवश्यकता नहीं समझी कि झांसी राजघराने के लोग किस किस हालत में हैं।
( लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)


 
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