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महिलाओं की सुरक्षा पर उठते सवाल

10/06/2019

लालजी जायसवाल 
माज से दिन-प्रतिदिन मानवीय मूल्य और संवेदनाएं तिरोहित होती जा रही हैं। इसका खामियाजा मासूम बच्चियों को अपने प्राणों की आहुति देकर करना पड़ रहा है। सवाल यह कि क्या पुरुष प्रधान समाज में महिलाओं और बच्चियों की समुचित सुरक्षा है? ध्यान रहे, पुरुषों का पुरुषत्व तभी तक विद्यमान है जब तक समाज में नारी की सुरक्षा बनी हुई है। आखिर क्यों 'यत्र नार्यस्तु पूज्यंते रमंते तत्र देवता' की अवधारणा तिरोहित होती जा रही है? निश्चित ही आज मानव समाज संवेदना शून्य समाज बन चुका है। व्यक्ति दानवता के उस शिखर पर पहुंच चुका है जहां माननीय मूल्य अपनी शून्यावस्था को प्राप्त करता है। कहना न होगा कि इंटरनेट पर अश्लीलता की पराकाष्ठा मानव को दानव बना रही है। हालांकि जब मोबाइल ,फोन ,इंटरनेट आदि नहीं थे तब भी समाज में अश्लील फिल्में और किताबें थीं लेकिन उस समय ऐसा करने से लोग डरते थे कि उसको पढ़ने और देखते हुए कोई देख न ले। इससे समाज में बदनामी होगी। लेकिन मोबाइल के इस दौर में दुनिया मुट्ठी में सिमट गई है और वे सारी बुराइयां भी जो पहले बहुत दूर थी। अब अश्लीलता को तूल प्रदान करने के लिए अनेक प्रकार के एप्प भी विद्यमान हैं जिससे कारण मनुष्य विकृत चित्त होता जा रहा है। दुष्कर्म तथा हत्या की अमानवीय कृत्यों को अंजाम देता रहा है। 
महिला सुरक्षा से जुड़े तमाम कानून और बहसों के बावजूद देश में अपराध कम नहीं हो पा रहे हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक, देश में हर घंटे में चार बलात्कार होते हैं। राजधानी दिल्ली में साल 2011 से 2016  के बीच महिलाओं के साथ दुष्कर्म के मामलों में 277 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई। दिल्ली में साल 2011 में जहां इस तरह के 572 मामले दर्ज किये गए थे, वहीं साल 2016 में यह आंकड़ा 2155 रहा। इनमें से 291 मामलों का अप्रैल 2017 तक नतीजा नहीं निकला था। निर्भया कांड के बाद दिल्ली में दुष्कर्म के दर्ज मामलों में 132 फीसदी की बढ़ोतरी हुई। साल 2017 में अकेले जनवरी महीने में ही दुष्कर्म के 140 मामले दर्ज किए गए थे। मई 2017 तक दिल्ली में दुष्कर्म के कुल 836 मामले दर्ज किए गए।
नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (एनसीआरबी) की 2016 की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में बलात्कार के मामले 2015 की तुलना में 2016 में 12.4 फीसदी बढ़े हैं। 2016 में 38,947 बलात्कार के मामले देश में दर्ज हुए। अकेले मध्य प्रदेश में बलात्कार के सबसे ज्यादा 4,882 मामले दर्ज हुए। दूसरे नंबर पर उत्तरप्रदेश रहा, जहां 4,816 बलात्कार के मामले दर्ज हुए। बलात्कार के 4,189 दर्ज मामलों के साथ महाराष्ट्र तीसरे नंबर पर रहा।
लगातार हो रही दुष्कर्म की घटनाएं मानवता को शर्मिंदा होने की ओर इशारा कर रही हैं। आखिर इस अमानवीय अपराध कृत्यों से समाज कब मुक्त होगा? क्या मात्र प्रशासनिक कार्रवाई से इन कृत्यों पर काबू पाया जा सकता है? बड़ा सवाल कि आखिर इससे निपटने के लिए क्या किया जाना चाहिए?  क्या मात्र कैंडल मार्च निकालने से इन कृत्यों पर कोई असर पड़ेगा? उत्तर है बिल्कुल भी नहीं। मानवीय मूल्यों का संरक्षण और संवेदनावान समाज के निर्माण के लिए हमें अपने अपने स्तर पर सामूहिक प्रयास करना होगा। साथ ही सरकार पर दबाव बनाना होगा कि इंटरनेट की अश्लीलता पर प्रतिबंध लगाने के लिए उचित कदम उठाए। नीतियों के निर्माण और प्रचालन में भ्रष्टाचार समाज झेल सकता है लेकिन मासूमों पर अत्याचार समाज के स्वाभिमान का प्रश्न है। अतः समाज की अपने स्तर पर सामूहिकता के साथ उपाय खोजने की दरकार है। प्रशासन पर उंगली उठना वाजिब है। लेकिन इस मानवता विरोधी कृत्य से मुक्ति तभी मिलेगी जब व्यक्ति अपने स्तर पर प्रयास करेगा। साथ ही समाज को अपनी स्वयं रक्षा करनी होगी। मासूम बच्चियों को सरकार और पुलिस प्रशासन के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता, क्योंकि इस मानवता बिरोधी कृत्य पर प्रतिबंध लगाने में प्रशासन पंगु नजर आ रहा है। इसलिए बच्चियों को आत्मरक्षा के गुण सिखाने की दरकार है। साथ ही सरकार को स्कूली शिक्षा की भांति बच्चियों को 1 साल की आर्मी ट्रेनिंग अनिवार्य करना चाहिए, अन्यथा मासूम बच्चियों और महिलाओं का जीवन अपराधियों की भेंट चढ़ता रहेगा। 
(लेखक शोध छात्र हैं।) 


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