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इस्लाम की विविधता की चिंता कौन करेगा

02/11/2019

इस्लाम की विविधता की चिंता कौन करेगा

बनवारी

बंगाल में सुदीर्घ काल से दुर्गा पूजा बंगाली समाज के धार्मिक-सांस्कृतिक जीवन का प्रतिनिधित्व करने वाला मुख्य उत्सव रहा है। मध्यवर्ती काल में बंगाल में मुस्लिम शासन की स्थापना के बावजूद वह बंगाली समाज का प्रधान उत्सव बना रहा। उसका एक अंतरंग रूप है, जो धर्मनिष्ठ बंगाली हिन्दू व्रत और अनुष्ठानपूर्वक अपने घरों में मनाते हैं। अपने आपको सेक्यूलर बताने वाले पूर्व राष्ट्रपति भारत रत्न प्रणव मुखर्जी भी दुर्गा पूजा के पूरे नौ दिन राष्ट्रपति भवन छोड़कर पश्चिम बंगाल के वीरभूम स्थित अपने पुश्तैनी घर में चले जाते थे और व्रत-अनुष्ठानपूर्वक दुर्गा पूजा का आयोजन करते हुए उनके काली रूप की पूजा करते थे। इस उत्सव का एक वाह्य रूप है, जो बंगाली समाज की संपन्नता के साथ-साथ उत्तरोत्तर बंगालियों के सार्वजनिक जीवन का मुख्य अवसर होता जा रहा है। उसके इस सार्वजनिक रूप के आयोजन में सदा ही बंगाली समाज के सभी लोग सम्मिलित होते रहे हैं। बंगाली सांस्कृतिक जीवन में रमे-बसे बंगाली मुसलमानों के लिए भी यह उतना ही अपना उत्सव रहा है, जितना बंगाली हिन्दुओं के लिए। शास्त्रीय संगीत की मुख्य धारा में भी मुसलमानों की प्रधानता रही है। वे सभी उसी सहज भाव से मां दुर्गा की स्तुति में स्तोत्र वाचन करते हुए शास्त्रीय रागों का गायन- वादन करते रहे हैं।

पिछले दिनों जब देवबंद के दारूल-उलूम के एक मुμती ने तृणमूल की सांसद और प्रसिद्ध अभिनेत्री नुसरत जहां के दुर्गा पूजा में सम्मिलित होने पर कड़ी आपत्ति की और उन्हें इस्लाम छोड़ देने के लिए कहा तो हमारे बौद्धिक जगत से किसी ने इसका विरोध नहीं किया। नुसरत जहां रूही बंगाली सिनेमा की एक जानी-मानी अभिनेत्री हैं।

यह परंपरा नई शुरू हुई है, जिसमें मुल्ला-मौलवियों का एक वर्ग मुसलमानों के इन हिन्दू उत्सवों में सम्मिलित होने को इस्लाम के विरुद्ध घोषित करने लगा है। उससे भी खतरनाक प्रवृत्ति यह है कि हमारे राजनैतिक और बौद्धिक क्षेत्रों में इस नई प्रवृत्ति का कोई विरोध दिखाई नहीं देता। वामपंथी रूझान वाला बौद्धिक पर्व तो अक्सर इस वर्जन करने वाली प्रवृत्ति की रक्षा में ही खड़ा दिखाई देता है। उसके लिए यह अल्पसंख्यक समुदाय के अधिकारों का मामला है कि वह अपने आपको बहुसंख्यक समुदाय से अलग और भिन्न बनाए रखे। इसी प्रवृत्ति के कारण पिछले दिनों जब देवबंद के दारूल-उलूम के एक मुμती ने तृणमूल की सांसद और प्रसिद्ध अभिनेत्री नुसरत जहां के दुर्गा पूजा में सम्मिलित होने पर कड़ी आपत्ति की और उन्हें इस्लाम छोड़ देने के लिए कहा तो हमारे बौद्धिक जगत से किसी ने इसका विरोध नहीं किया। नुसरत जहां रूही बंगाली सिनेमा की एक जानी-मानी अभिनेत्री हैं। कुछ दिन पहले उनका उद्योगपति निखिल जैन से विवाह हुआ था। हाल के लोकसभा चुनाव से पहले उन्होंने तृणमूल कांग्रेस की सदस्यता ली और ममता बनर्जी ने उन्हें बशीरहाट संसदीय क्षेत्र से अपनी पार्टी का उम्मीदवार बना दिया। चुनाव में वे भाजपा के सायंतन बसु को लगभग साढ़े तीन लाख वोट से हराकर चुनाव जीत गईं। 25 जून को वे जब शपथ ग्रहण करने संसद भवन में उपस्थित हुईं तो कुछ मौलवियों ने उनके मांग में सिंदूर होने और गले में मंगलसूत्र होने को लेकर टीकाटि प्पणी की थी।

छह अक्टूबर को वे कोलकाता में सुरूचि संघ द्वारा आयोजित दुर्गा पूजा पंडाल में पहुंची। वे न केवल महाअष्टमी के पुष्पांजलि समारोह में सम्मिलित हुईं, बल्कि उन्होंने पंडितों के मंत्रोच्चार का अनुकरण किया, हाथ जोड़कर प्रार्थनावत खड़ी हुईं और उसके बाद मां दुर्गा की आराधना में ढोल बजाते हुए नृत्य भी किया। इस समय भी उनकी मांग में सिंदूर और माथे पर बिंदी थी और वे मंगल सूत्र पहने सहज बंगाली की तरह दुर्गा पूजा में सम्मिलित हुईं थी। उनके इस व्यवहार पर दारूल-उलूम देवबंद के एक मुμती असद कासमी ने कड़ी आपत्ति करते हुए कहा कि उन्होंने अपने आचरण से इस्लाम को बदनाम किया है। इस्लाम में अल्लाह के अलावा किसी और की इबादत हराम है। कासमी ने उनके पूजा- अर्चना में शामिल होने और शरीर पर सिंदूर, बिंदी और मंगलसूत्र जैसे हिन्दू प्रतीक धारण करने की आलोचना की। फिर कहा कि उन्होंने गैर-मुसलमान से शादी की है इसलिए उन्हें मुसलमान बने रहने का कोई अधिकार नहीं है। उन्हें अपना धर्म परिवर्तन करके अपना नाम बदल लेना चाहिए।

देवबंद से जारी होने वाले फतवों पर सरसरी दृष्टि डालकर भी यह देखा जा सकता है कि वे मुसलमानों को हिन्दुओं के साथ सह-जीवन बिताने से रोकते हैं। अब तक हिन्दू-मुसलमानों के बीच दंगों का एक कारण किसी मस्जिद के बाहर हिन्दू देवताओं की शोभा यात्राओं के समय भजन-कीर्तन बनता रहा है। मुसलमानों का आग्रह होता है इस्लाम में संगीत का निषेध है। इसलिए किसी मस्जिद के सामने से गाते-बजाते कोई धार्मिक आयोजन जाए, यह उन्हें बर्दाश्त नहीं है।

नुसरत जहां इस तरह की आलोचना को लगातार झेलती रही हैं और उसे नजरअंदाज करती रही हैं। उन्होंने कहा है कि वे अपने मजहब के दायरे के बाहर विवाह करने के बाद भी मुसलमान हैं और मुसलमान होने के नाते सभी धर्मों का आदर करती हैं। अपनी इसी प्रवृत्ति के आधार पर वे दुर्गा पूजा में सम्मिलित हुई है। वे मुल्ला- मौलवियों की आलोचनाओं से प्रभावित नहीं होती। नुसरत जहां की बंगाली समाज में एक अभिनेत्री के रूप में प्रतिष्ठा है। तृणमूल कांग्रेस की सांसद होने के नाते वे राजनैतिक शक्ति से संपन्न हैं इसलिए वे मुल्ला- मौलवियों के विरोध की उपेक्षा कर सकती हैं। लेकिन जो लोग इतने शक्ति संपन्न या प्रतिष्ठित नहीं है, वे देवबंद के मुμती के विरोध की इतनी आसानी से उपेक्षा नहीं कर पाएंगे। क्या मुμती असद कासमी को यह कहने का अधिकार है कि जो मुसलमान अल्लाह के अलावा किसी की आराधना करता है, उसे मुसलमान बने रहने का अधिकार नहीं है? दारूल-उलूम देवबंद इस्लाम की शिक्षा का एक अत्यंत महत्वपूर्ण केंद्र हैं। उसकी प्रतिष्ठा भारत में ही नहीं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर है।

मिस्र के अल अजहर विश्वविद्यालय के बाद दारूल-उलूम की सबसे अधिक प्रतिष्ठा है। मुसलमानों के आचरण से संबंधित शरिया का विधान क्या है, इसकी व्याख्या के लिए मुसलमान दारूल-उलूम ही जाते हैं। पिछले डेढ़ सौ वर्ष के इतिहास में शरिया की व्याख्या करते हुए यहां के मुμितयों ने असंख्य फतवे जारी किए हैं। उनके फतवे मुसलमानों के जीवन पर सभी पहलुओं पर जारी होते रहे हैं। उन्होंने दμतरों में मुस्लिम स्त्री-पुरुषों के एक साथ काम करने तक को हराम घोषित कर रखा है। उनके फतवे अगर शरिया की व्याख्या तक सीमित होते तो उन पर किसी को आपत्ति करने की आवश्यकता नहीं थी। लेकिन वे शरिया की केवल व्याख्या नहीं मुस्लिम समाज को निर्देश भी होते हैं और उनकी अवहेलना सामाजिक बहिष्कार का कारण बन सकती है। देवबंद से जारी होने वाले फतवों पर सरसरी दृष्टि डालकर भी यह देखा जा सकता है कि वे मुसलमानों को हिन्दुओं के साथ सह-जीवन बिताने से रोकते हैं। अब तक हिन्दू-मुसलमानों के बीच दंगों का एक कारण किसी मस्जिद के बाहर हिन्दू देवताओं की शोभा यात्राओं के समय भजन-कीर्तन बनता रहा है।

मुसलमानों का आग्रह होता है इस्लाम में संगीत का निषेध है। इसलिए किसी मस्जिद के सामने से गाते-बजाते कोई धार्मिक आयोजन जाए यह उन्हें बर्दाश्त नहीं है। उन्हें कोई याद नहीं दिलाता कि भारत पर विजय प्राप्त करने में सफल होने के बाद अधिकांश मुस्लिम शासक भारतीय संगीत और नृत्य के गुण ग्राहक बन गए थे। इससे शास्त्रीय नृत्य और संगीत देव आराधना के साथ-साथ दरबार का भी अंग हो गया था। अधिकांश गुणी संगीतकारों को शहंशाहों के आग्रह-दुराग्रह के कारण मुसलमान हो जाना पड़ा। फिर भी शास्त्रीय संगीत की उनकी साधना जारी रही, उन्हें कभी किसी ने संगीत साधना से रोका नहीं। उस्ताद बिस्मिल्लाह खां का जीवन काशी में बाबा विश्वनाथ की आराधना के लिए सुबह शहनाई बजाते हुए बीता। उस्ताद अलाउद्दीन खां जैसे शास्त्रीय संगीत के शिखर पुरुष ने अपनी प्रतिभा संपन्न बेटी का नाम अन्नपूर्णा रखा था और पंडित रविशंकर से उनका विवाह किया था। अन्नपूर्णा ने विवाह के समय हिन्दू धर्म स्वीकार किया था। हालांकि रविशंकर से उनका विवाह टूट गया था, लेकिन वे हिन्दू बनी रहीं और उन पर किसी ने कभी उंगली नहीं उठाई। शास्त्रीय संगीत में उनकी प्रतिष्ठा एक साधक की थी और रविशंकर से ऊंची थी। मुसलमानों की ओर से मजहबी कारणों से वंदेमारतम गाने की मनाही की जाती रही है। स्कूलों में सरस्वती पूजन को लेकर उनकी सदा आपत्ति रही है। अभी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी योग को अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा दिलवाने में सफल हो गए। मुस्लिम देशों में उनका किसी ने यह कहकर विरोध नहीं किया कि इस्लाम योग की अनुमति नहीं देता। लेकिन भारत में मुस्लिम नेतृत्व ने घोषित कर रखा है कि योग इस्लाम की शिक्षाओं के विरुद्ध है और मुसलमान उसे स्वीकार नहीं करेंगे।

मुसलमानों को हिन्दुओं से अलग रखने के लिए इस्लाम की जो व्याख्या प्रचारित की जा रही है, वह सामाजिक और आर्थिक दोनों रूप से खतरनाक है। वह मुसलमानों को सदा हिन्दुओं से अलग ही नहीं, उनके विरुद्ध भी बनाए रखेगी। क्या भारतीय संविधान इस्लाम की इस तरह की निषेधक भूमिका की अनुमति दे सकता है? यह प्रश्न सात दशक पहले ही हमारे विधि विशेषज्ञों के सामने आना चाहिए था। दुर्भाग्य से जवाहर लाल नेहरू जिस दृष्टि के पोषक थे, उसमें इस्लाम की अतिवादी व्याख्या को खलनायक चित्रित करने की बजाय हिन्दुओं की सर्वग्राह्यता पर कुछ इस तरह जोरÞ दिया गया कि मुसलमानों को अपने साथ रखने के लिए हिन्दू अपनी मान्यताएं छोड़ दें।

हमारे बौद्धिक वर्ग ने यह मान लिया है कि इस्लाम में अल्लाह के अतिरिक्त किसी की इबादत नहीं की जाती। लेकिन यह इस्लाम की एक व्याख्या है, एकमात्र व्याख्या नहीं है। इस्लाम में तुर्कों का प्रभाव बढ़ते ही उसकी एक और धारा उदित हो गई थी। सूफी मान्यताओं पर आधारित इस धारा में मनुष्य को इबादत के द्वारा उच्चतर स्थिति प्राप्त करने और मरने के बाद स्तुत्य-आराध्य मान लिए जाने की मान्यता प्रबल हुई। आज दुनिया के मुसलमानों में इसी मत की प्रधानता है। दक्षिण एशिया के 80 प्रतिशत मुसलमान इसी मत को मानते हैं। स्वयं देवबंद का दारूल-उलूम 1866 में सूफी निष्ठाओं को आधार बनाकर आरंभ हुआ था। एक तीसरी धारा शियाओं की है, जो मोहम्मद साहब को अल्लाह द्वारा भेजा गया संदेश ग्रहण करने के कारण अल्लाह के नूर से संपन्न मानते हैं और खिलाफत के उत्तराधिकार की लड़ाई में अली इब्न अबी तालिब के अनुयायी हैं। इस्लाम की इन विविध धाराओं और उनकी व्याख्याओं को जानबूझ कर आंखों से ओझल रखा जाता है। देवबंद के दारूल-उलूम में इस्लाम की इन विविध धाराओं को अस्वीकार करना तब आरंभ किया गया जब सऊदी अरब से मिलने वाली आर्थिक सहायता पाते रहने के लिए उन्हें वहाबी व्याख्या का समर्थन करना पड़ा। मुसलमानों में इन तीन धाराओं के अलावा भी अनेक धाराएं हैं, जिनमें से कुछ राजनैतिक कारणों से पाकिस्तान जैसे देशों में प्रतिबंधित की जाती रही हंै। यह दुर्भाग्य की बात है कि हमारे बौद्धिक वर्ग में कोई इस्लाम की इस विविधता की रक्षा करने की बात नहीं करता। हमारे वामपंथियों के लिए तो विविधता का उपदेश केवल हिन्दुओं को दिया जाना आवश्यक है, जहां वास्तव में उसकी कोई आवश्यकता नहीं है। क्योंकि हिन्दू जीवन पद्धति में विविधता प्रासंगिक नहीं है, अंतर्भूत है।

सनातन धर्म अपनी अनंत शाखाओं में फलता-फूलता रहा है और फलता-फूलता रहेगा। उसकी विविधता नष्ट होने की आशंका दोहराते रहने वाले लोग केवल राजनैतिक उद्देश्यों से हीे ऐसा कर रहे होते हैं। जबकि इस्लाम में जो आंतरिक विविधता है, वह कुछ और लचीली होकर उसके लिए अन्य धर्मावलंबियों से सह-जीवन का रास्ता खोल सकती है। वरना इस्लाम की मूल प्रवृत्ति निषेधात्मक ही है। नुसरत जहां सामाजिक और राजनैतिक रूप से समर्थ हैं। वे मुμती असद कासमी जैसे लोगों की तीखी से तीखी आलोचना की उपेक्षा कर सकती हैं। एक हिन्दू-जैन परिवार में विवाह के कारण वे इस्लामी प्रतिबंधों से परे हैं। लेकिन यह केवल उनका व्यक्तिगत मामला नहीं है। यह हमारे सामाजिक और राजनैतिक जीवन का एक केंद्रीय मुद्दा है। क्या किसी को यह कहकर इस्लाम से खारिज किया जा सकता है कि उसने इस्लाम की मूल मान्यता का विरोध किया है। हमें यह स्मरण रखना चाहिए कि अगर इस्लाम की मूल मान्यताएं शरिया द्वारा सख्ती से व्याख्यित हों तो हमें दुनियाभर के मुसलमानों को इस्लाम से खारिज करना पड़ेगा। क्योंकि दुनिया के किसी देश में शरिया का पूर्णत? पालन नहीं किया जाता, न किया जा सकता है। सऊदी अरब और पाकिस्तान जैसे देशों में भी नहीं। क्या यह आश्चर्य की बात नहीं है कि जो सर्वाेच्च न्यायालय खाप पंचायतों को सगोत्रीय प्रेम विवाह र्विजत करने पर प्रतिबंधित करने के बारे में सोच सकता है, वह देवबंद के उन सभी फतवों पर चुप्पी साधे रहता है जो आम मुसलमानों को भारतीय सभ्यता की मुख्य धारा का अंग बनने से रोकते हैं और उन्हें हिन्दू समाज से दूरी बनाए रखने के लिए मजबूर करते हैं। क्या यह व्यक्ति के मौलिक अधिकारों में नहीं आता कि वह मुसलमान होते हुए भी हिन्दू देवी-देवताओं की आराधना कर सकें।

नुसरत जहां सामाजिक और राजनैतिक रूप से समर्थ हैं। वे मुμती असद कासमी जैसे लोगों की तीखी से तीखी आलोचना की उपेक्षा कर सकती हैं। एक हिन्दू-जैन परिवार में विवाह के कारण वे इस्लामी प्रतिबंधों से परे हैं। लेकिन यह केवल उनका व्यक्तिगत मामला नहीं है। यह हमारे सामाजिक और राजनैतिक जीवन का एक केंद्रीय मुद्दा है। क्या किसी को यह कहकर इस्लाम से खारिज किया जा सकता है कि उसने इस्लाम की मूल मान्यता का विरोध किया है। हमें यह स्मरण रखना चाहिए कि अगर इस्लाम की मूल मान्यताएं शरिया द्वारा सख्ती से व्याख्यित हों तो हमें दुनियाभर के मुसलमानों को इस्लाम से खारिज करना पड़ेगा।

आखिर अधिकांश भारतीय मुसलमानों के पूर्वज इन्हीं देवीदे वताओं के उपासक थे। यह एक भ्रामक धारणा है कि इस्लाम में प्रतीकों की उपासना निषिद्ध है। अगर यह सच हो तो अजमेर के दरगाह शरीफ पर कोई नहीं जाएगा। इतना ही नहीं मक्का शरीफ का हज भी उसी आधार पर अमान्य हो जाएगा। एक मूर्ति पूजा के विरोधी ईसाई से महात्मा गांधी ने यही प्रश्न किया था कि अगर वे प्रतीक उपासना के विरोधी हैं तो क्रास को गले में क्यों लटकाए रहते हैं, मरियम की उपासना क्यों करते हैं या ईसा मसीह की भक्ति का दिखावा क्यों करते हैं। मन में ईश्वर की धारणा भी आखिर एक प्रतीक ही है। मुसलमानों को हिन्दुओं से अलग रखने के लिए इस्लाम की जो व्याख्या प्रचारित की जा रही है, वह सामाजिक और आर्थिक दोनों रूप से खतरनाक है। वह मुसलमानों को सदा हिन्दुओं से अलग ही नहीं, उनके विरुद्ध भी बनाए रखेगी। क्या भारतीय संविधान इस्लाम की इस तरह की निषेधक भूमिका की अनुमति दे सकता है? यह प्रश्न सात दशक पहले ही हमारे विधि विशेषज्ञों के सामने आना चाहिए था। दुर्भाग्य से जवाहर लाल नेहरू जिस दृष्टि के पोषक थे, उसमें इस्लाम की अतिवादी व्याख्या को खलनायक चित्रित करने की बजाय हिन्दुओं की सर्वग्राह्यता पर कुछ इस तरह जोर दिया गया कि मुसलमानों को अपने साथ रखने के लिए हिन्दू अपनी मान्यताएं छोड़ दें।

ममता बनर्जी को यही कांग्रेसी दृष्टि उत्तराधिकार में मिली है। उन्होंने मुसलमान उलेमाओं को खुश करने के लिए हिजाब पहनकर इबादत की। पिछले वर्ष उन्होंने मोहर्रम के दिन मां दुर्गा की मूर्तियों का विर्सजन रूकवा दिया था। इस तरह के दुराग्रहों को लेकर चलने वाले लोगों को कभी यह समझ में नहीं आएगा कि हिन्दू-मुस्लिम सौहार्द को हिन्दुओं से नहीं मुसलमानों से खतरा है। इस्लाम की प्रवृत्ति दूसरे मत-विश्वासों का निषेध करने की है, जबकि हिन्दू दृष्टि सबके प्रति उदार रही है। भारत में हिन्दू-मुस्लिम एकता इस्लाम को भारतीय सभ्यता की मान्यताओं के अनुकूल बनाने से ही सिद्ध हो सकती है, इस्लाम की निषेधात्मक प्रवृत्ति को बढ़ावा देने से नहीं। अक्सर हम यह भूल जाते हैं कि हिन्दुओं का सामाजिक-धार्मिक जीवन अधिक उदात्त परंपराओं पर आधारित है। उससे आम मुसलमानों को जुड़ने में कोई समस्या नहीं होती। मुस्लिम समाज की मजहबी परंपराएं उतनी उदात्त मान्यताओं पर आधारित नहीं हैं, वे सदा मुसलमानों को औरों से अलग बनाए रखने के लिए बनी है। इसकी जब राजनैतिक अभिव्यक्ति होती है तो वह बहुत खतरनाक स्वरूप ले लेती है। याद कीजिए कि खिलाफत आंदोलन जब तुर्की में खलीफा का पद समाप्त कर दिए जाने के बाद निरर्थक हो गया था तो अली भाइयों ने महात्मा गांधी को मुसलमानों से दूर करने के लिए तर्क दिया था कि इस्लाम के अनुसार एक पापी मुसलमान भी एक संत काफिर से ऊंचा होता है।

दुर्भाग्य से स्वतंत्र भारत में इस दृष्टि का पोषण मुल्ला-मोलवियों से भी एक कदम आगे जाकर वामपंथी और कांग्रेसी नेताओं ने किया है। इस भारतीय समाज और देशविरोधी दृष्टि को हमारे बौद्धिक वर्ग और न्यायपालिका तक की मौन स्वीकृति मिली रही है। यह भ्रामक धारणा बनी हुई है कि वे अपने अलग पर्सनल लॉ के कारण अपनी बिल्कुल अलग पहचान बनाए रखने के अधिकारी हंै। क्या यह अधिकार उन्हें बहुसंख्यक समाज की मान्यताओं का निषेध करते रहने की इजाजत दे सकता है? यह याद रखना चाहिए कि पर्सनल लॉ केवल विवाह और उत्तराधिकार के मामलों में ही लागू होता है। भारत में शरिया लागू नहीं है। वैसे भी दुनियाभर का मुस्लिम समाज अब शरिया से काफी दूर चला गया है। इस्लाम की विविधता उसकी शक्ति हो गई है, उसकी इस विविधता की रक्षा आवश्यक है। इसलिए इस्लाम की वहाबी व्याख्या पर प्रश्न उठने चाहिए। उसे हमारे बौद्धिक विमर्श का अंग होना चाहिए।


 
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