युगवार्ता

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बाहरी उपायों से नहीं बनेगी बात !

11/07/2019

बाहरी उपायों से नहीं बनेगी बात !

पूनम नेगी

भारत में जनसंख्या वृद्धि के कारण बेरोजगारी, प्रति व्यक्ति निम्न आय, खाद्य समस्या, कुपोषण, रहने की समस्या और कृषि विकास में बाधा जैसी समस्या दिनोंदिन बढ़ रही है। इसलिए यथाशीघ्र जनसंख्या पर नियंत्रण जरूरी है।

हमारा राष्ट्र आज दुनिया की तमाम अर्थव्यवस्थाओं को चुनौती देते हुए लगातार उन्नति के पथ पर अग्रसर है। पिछले कुछ वर्षो में हमने शिक्षा, स्वास्थ्य, तकनीक, खेल, प्रौद्योगिकी व रक्षा क्षेत्र में उल्लेखनीय उपलब्धियां हासिल की हैं और यह उम्मीद भी है कि आने वाले कुछ वर्षो में हम विश्व की पांच प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में से एक होंगे। मगर, स्वावलम्बन एवं आत्मनिर्भरता के पथ पर सतत गतिमान भारत की इस राह का सबसे बड़ा रोड़ा है जनसंख्या विस्फोट। सुरसा के मुंह की तरह बढ़ती जा रही आबादी विकास योजनाओं पर भारी पड़ती जा रही है। आप चाहे कहीं भी हों; सड़क, बाजार, रेलवे स्टेशन, सामाजिक या सार्वजनिक समारोह, सभी जगह सिर्फ भीड़ ही भीड़ नजर आती है। दुनिया की वर्तमान जनसंख्या 762 करोड़ है, जिसमें से 135 करोड़ से ज्यादा लोग भारत में रहते हैं। यानी दुनिया की कुल आबादी में 17.9 प्रतिशत भारतीय हैं।
चीन के बाद हमारा देश दुनिया की सबसे ज्यादा आबादी वाला वाला देश है। आजादी के समय भारत की जनसंख्या 33 करोड़ थी जो आज चार गुना तक बढ़ गयी है। इनमें आधे बिलियन से अधिक भारतीय 25 वर्ष से कम आयु के हैं। एक अनुमान के मुताबिक हमारी आबादी में हर दिन पचास हजार की वृद्धि हो रही है। अगर हमने अपनी जनसंख्या वृद्धि दर पर रोक नहीं लगाई तो 2027 तक चीन को पछाड़ कर भारत दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाला देश बन जाएगा। गौरतलब हो कि 11 जुलाई 1987 को जब विश्व की जनसंख्या ने पांच अरब का आंकड़ा छुआ तो देश-दुनिया के प्रबुद्धजनों का ध्यान इस ओर गया कि धरती पर मौजूद प्राकृतिक संसाधनों की उपलब्धता के मद्देनजर मानव आबादी को नियंत्रित करना अति आवश्यक है।
तब इस विशेष दिन को यूनाइटेड नेशन्स डेवलपमेन्ट प्रोग्राम द्वारा ‘विश्व जनसंख्या दिवस’ घोषित कर प्रति वर्ष इसे मनाने की परम्परा डाली गयी ताकि जनसंख्या को काबू रखने के लिये लोगों को शिक्षित एवं जागरूक किया जा सके। सनद रहे कि आजादी के बाद 1952 में ही परिवार नियोजन कार्यक्रम को लागू करने वाला भारत विश्व का पहला देश था। बावजूद इसके आज हमारे देश की जनसंख्या जिस तेजी से बढ़ती जा रही है, वह वाकई चिंताजनक है। यूं तो अलग-अलग देशों में देशकाल और परिस्थितियों के अनुसार जनसंख्या वृद्धि के अलग-अलग कारण होते हैं मगर भारत के संदर्भ में कारणों की पड़ताल करें तो पाएंगे कि वर्तमान में इसका सबसे बड़ा कारण देश की कुल जनसंख्या में 60 प्रतिशत से ज्यादा युवाओं का होना है।
जाहिर है, जिस देश में साठ प्रतिशत से ज्यादा प्रजनन आयु समूह के युवा होंगे, वहां आप फर्टिलिटी को कम करने की चाहे कितनी भी कोशिश कर लें, समुचित जीवन दृष्टि के अभाव में जनसंख्या बढ़ती ही रहेगी। इसके अतिरिक्त जन्मदर में वृद्धि, मृत्युदर में कमी, निर्धनता, धार्मिक एवं सामाजिक अन्धविश्वास, शिक्षा का अभाव इत्यादि कारणों से भी आबादी पर नियंत्रण टेढ़ी खीर साबित हो रहा है। इसके अलावा जल्दी शादी होने से गर्भधारण करने की अवधि भी बढ़ जाती है। आबादी के तेजी से बढ़ने का एक अन्य कारण गरीबी और निरक्षरता भी है। यूनिसेफ की रिपोर्ट बताती है कि भारत अब भी गर्भ निरोधकों और जन्म नियंत्रण विधियों के इस्तेमाल में पीछे है। मुस्लिम वर्ग में बहु-विवाह की प्रथा तथा कई बच्चों को अल्लाह की देन मानने की सोच ने भी इस समस्या को जटिल बनाता है। अवैध प्रवास भी आबादी बढ़ने का एक अन्य कारण है। हम इस तथ्य को नहीं नकार सकते कि बांग्लादेश, नेपाल से अवैध प्रवासियों की लगातार वृद्धि से भी देश के जनसंख्या घनत्व में बढ़ोतरी हुई है।
देश में जनसंख्या नियंत्रण पर जागरूकता के नाम पर साल दर साल विभिन्न कार्यक्रम चलाने की कवायद की गयी। बढ़ती आबादी का सबसे बुरा असर हमारे प्राकृतिक संसाधनों पर पड़ रहा है। इस तरह बढ़ती हुई आबादी ने हमारे प्राकृतिक ताने-बाने को क्रूरता से क्षतिग्रस्त कर डाला है। रोजगार की तलाश में शहरों को पलायन की प्रवृति जनसंख्या असंतुलन का बड़ा कारक है। नगरों में यदि एक ओर बढ़ती नागरिक सुविधाएं हैं तो दूसरी ओर तेजी से पैर पसारते स्लम। दिल्ली, मुंबई जैसे महानगरों में 40 फीसदी आबादी स्लम के प्रदूषित गटर और नाले किनारों के नारकीय माहौल में रहती है। भारी आबादी को राहत पहुंचाने का सरकारी प्रयास ऊंट के मुंह में जीरा नजर आता है। अधिक जनसंख्या के कारण बेरोजगारी की विकराल समस्या हमारे सामने है। यदि जनसंख्या विस्फोट यूं ही होता रहा तो वह दिन दूर नहीं जब लोगों के समक्ष रोटी, कपड़ा और मकान की विकराल स्थिति उत्पन्न हो जाएगी।


 
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