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जहरीली जुबान से किसका भला चाहते हैं ओवैसी

03/06/2019

डॉ. मयंक चतुर्वेदी 
ल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन के अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी जिस तरह से अपनी जहरीली जुबान का प्रयोग करते हैं, उससे लगता है कि पता नहीं कब भारत की सर्वधर्म सद्भाव की फिजां खराब हो जाए। हाल में मक्का मस्जिद में एक सभा को संबोधित करते हुए उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर निशाना साधा है। कहा कि 'हम यहां पर बराबर के शहरी हैं, किराएदार नहीं हैं। हिस्सेदार रहेंगे। अगर कोई यह समझ रहा है कि हिंदुस्तान के वजीरे-ए-आजम 300 सीट से हिंदुस्तान पर मनमानी करेंगे तो नहीं हो सकेगा....।' 
ओवैसी की जुबान हिन्दू-मुसलमानों को भाईचारे के साथ रहते हुए देश का विकास करने से रोकती है। राजनेता समाज का दिशा-निर्देशक होता है। उसे इस तरह के बयानों से बचना चाहिए। इससे दोनों ही समुदायों के बीच खाई गहरी होती है। आखिर ओवैसी के इस बयान का क्या औचित्य है? क्या कभी स्वतंत्र भारत में बहुसंख्यक हिन्दुओं ने मुसलमानों को किराएदार माना है? उनसे कोई दोयम दर्जे का व्यवहार किया है? इस संदर्भ में कुछ एतिहासिक तथ्यों को खंगालने की जरूरत है। हो सकता है कि उसके बाद ओवैसी और उनकी जैसी सोच रखनेवाले लोगों की मानसिकता में कुछ परिवर्तन आ जाए।  
प्रश्न यह है कि क्या भारत में बहुसंख्यक हिन्दुओं ने कभी खण्डित आजादी की कल्पना की थी? जो देश 15 अगस्त 1947 को दो टुकड़ों में भारत को मिला। यहां के लोग तो आज भी यही दुआ करते हैं कि भारत फिर से अखण्ड हो जाए। धर्म के आधार पर हुआ बंटवारा अनुचित है। यही वजह है जो 14 अगस्त को 'अखण्ड भारत' दिवस के रूप में मनाने की प्रेरणा देता है। देश विभाजन से जुड़ी सच्चाइयों को इतिहास से कभी हटाया नहीं जा सकता है। इतिहासकार वामपंथी हो या दक्षिणपंथी अथवा स्वयं को तटस्थ कहनेवाले। भारत विभाजन और देश की स्वतंत्रता को लेकर कुछ तथ्य ऐसे हैं जिन पर सभी एकमत हैं। क्या यह सच नहीं कि देश के विभाजन के लिए मुसलमानों का धर्म प्रेम सबसे अधि‍क जिम्मेदार रहा है। पूरी तरह से धर्म आधारित राजनीतिक पार्टी मुस्लिम लीग ने ही सर्वप्रथम अलग देश की मांग की थी। हालांकि इतिहास का एक सच यह भी है कि मौलाना आजाद, खान अब्दुल गफ्फार खान,  मौलाना सज्जाद, तुफैल अहमद मंगलौरी जैसे कुछ लोग ऐसे भी थे जो इस विभाजन के विरोधी थे। लेकिन इन मुट्ठीभर लोगों की अपनी कौम में सुननेवाला कौन था? इतिहासकार बिपिन चंद्रा विभाजन के लिए सीधे मुसलमानों की सांप्रदायिकता को जिम्मेदार ठहराते हैं। फ्रांसिस रॉबिनसन और इतिहासकार प्रो. वेंकट धुलिपाला इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि 'यूपी के खानदानी मुसलमान (रईस और जमींदार) समाज में अपनी हैसियत को हमेशा के लिए बनाए रखना चाहते थे।' उन्हें लगता था कि भारत में उनका पुराना रुतबा नहीं रह जाएगा। इसलिए उनका अपना धर्म आधारित अलग देश होना ही चाहिए। 
विभाजन से जुड़ा एक तथ्य यह भी है कि महात्मा गांधी लम्बे समय तक देश विभाजन के विरोधी बने रहे।  उन्होंने यहां तक कहा था कि 'अगर बंटवारा होगा तो वह मेरी लाश पर होगा। जब तक मैं जीवित हूं तब तक भारत का विभाजन नहीं होने दूंगा।' मई 1947 में महात्मा गांधी के आए इस बयान के बाद जो हिन्दू, मुस्लिम बहुल पाकिस्तान क्षेत्र से बहुसंख्यक हिन्दू जनसंख्या वाले स्थानों पर आ रहे थे, वे सभी बापू के इस संकल्प की जानकारी के बाद फिर वहीं रुक गए। हिन्दुओं को लगा कि अब भारत का विभाजन किसी भी हालत में नहीं होगा। तभी इस बयान के बाद जिन्ना की मुस्लिम लीग और पाकिस्तान के मुसलमान धर्म से मदान्ध होकर हिन्दुओं और अन्य गैर मुसलमानों को मारना शुरू कर देते हैं। हिन्दुओं की लाशों से भरी हुई ट्रेन जब भारत आने लगती हैं तो यहां भी जगह-जगह दंगे होने लगते हैं। तब आखिरकार गांधीजी को लगता है कि अब भारत के बंटवारे की घोषणा कर देनी चाहिए। 
इतना सब होने के बाद भी क्या स्थिति है हिन्दू और मुसलमानों की, जरा सोचें? पाकिस्तान और बांग्लादेश में गैर मुसलमान किस स्थिति में हैं और भारत में रहनेवाले मुसलमानों की स्वायत्तता एवं उनके विशेष अधिकार किस सीमा तक हैं, देखा जा सकता है। 1947 में पाकिस्तान में हिन्दू और सिखों की आबादी एक करोड़ के आसपास थी। इसमें पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) शामिल नहीं था। लेकिन, अब पाकिस्तान में मात्र 12 लाख हिन्दू और 10 हजार सिख रह गए हैं। बड़ा प्रश्न है, आखिरकार इतनी बड़ी संख्या कहां गई? किसी भी देश की जनसंख्या समय के साथ बढ़ती है। फिर क्या हो गया? इसका जवाब ओवैसी के पास नहीं है। बांग्लादेश में भी हिन्दू जनसंख्या तेजी से कम हो रही है। यहां 1951 की जनगणना बताती है कि मुस्लिम 03 करोड़ 22 लाख और हिन्दू 92 लाख 39 हजार थे जो कि 2011 में हुई जनगणना में कुछ इस तरह से दिखते हैं, मुसलमान 60 वर्ष बाद बढ़कर 12 करोड़ 62 लाख हो जाते हैं लेकिन हिन्दू 01 करोड़ 20 लाख रहते हैं। मानवाधिकार कार्यकर्ता प्रोफेसर रिचर्ड बेंकिन के तथ्य  बताते हैं कि यहां 1947 के वक्त हिंदुओं की संख्या कुल आबादी में एक तिहाई थी, वह 2016 आते-आते घटकर कुल आबादी का 15 वां हिस्सा रह गई। अमेरिका के रहने वाले रिचर्ड बेंकिन का शोध यह कहता है कि बांग्लादेश की वर्तमान में कुल आबादी 15 करोड़ है जिसमें 90 प्रतिशत मुसलमान हैं। हिंदू आबादी घटकर 9.5 प्रतिशत रह गई है। 
अब प्रश्न यह है कि क्या भारत में मुसलमानों के साथ ऐसा हुआ है। जहां एक ओर पाकिस्तान और बांग्लादेश में लगातार हिन्दुओं की जनसंख्या घटी है। इसके उलट भारत में मुसलमानों की जनसंख्या उनके अनुपात से कहीं ज्यादा बढ़ी है। 1951 में भारत में मुसलमानों की संख्या 03 करोड़ 54 लाख थी जो वर्तमान में करीब 19 करोड़ 4 लाख है। अमेरिकी थिंक टैंक प्यू रिसर्च सेंटर के मुताबिक चालीस साल बाद भारत सबसे अधिक मुस्लिम आबादी वाला देश बन जाएगा। 2060 में भारत की मुस्लिम आबादी 33 करोड़ हो जाएगी, यानी दुनिया की कुल मुस्लिम आबादी में भारत का योगदान 11 फीसद होगा।
यहां सीधा प्रश्न है कि आज ओवैसी को इतने वर्षों बाद एक मुसलमान होने के नाते अचानक क्यों  लगने लगा है कि वे भारत में 'बराबर के शहरी हैं, किराएदार नहीं हैं और हिस्सेदार रहेंगे' जैसी बातें करने लगे हैं भारत ने तो इस्लामिक पाकिस्तान या बांग्लादेश की तरह धर्म आधारित देश होने की घोषणा भी नहीं की है। ओवैसी को समझना होगा कि ऐसा इसीलिए ही संभव हो सका क्योंकि भारत जब खंडित आजादी पा रहा था तो यहां बहुसंख्यक हिन्दू आबादी थी, जो प्राकृत रूप से सर्वधर्म-पंथ सद्भाव में सहज विश्वास रखती है और उसके अनुरूप अपना आचरण रखती है। यही कारण है कि जब देश के लिए नियम और कानून तय हो रहे थे, तभी संविधान की प्रस्तावना में सीधे तौर पर घोषणा कर दी गई थी कि संविधान के अधीन समस्त शक्तियों का केंद्रबिंदु अथवा स्त्रोत 'भारत के लोग' ही हैं। आज सभी को यह समझना होगा कि यह उद्घोषणा किसी विशेष को ध्यान में रखकर नहीं, सभी की समग्रता को समझते हुए की गई है। काश, ओवैसी इस बात को समझ पाते। 
(लेखक हिन्दुस्थान समाचार से सम्बद्ध हैं।)


 
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