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क्या यह ‘रिहर्सल’ है

06/01/2020

क्या यह ‘रिहर्सल’ है

संजय कुमार झा

नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ जिस तरह की हिंसा फूट पड़ी है, वह चिंताजनक है। ऐसा इसलिए नहीं कि इस कानून का विरोध हो रहा है। विरोध लोकतंत्र का हिस्सा है। उत्तर-पूर्व के विरोध का एक कारण है और उसे सुलझाने का प्रयास किया जाएगा पर पश्चिम बंगाल और दिल्ली के जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय में जो दिखा, उसका मकसद क्या था। क्या इसका असल मकसद वही है, जो 1947 में अधूरा रह गया था।

इस्लाम को लेकर अपने खुले विचारों के कारण कट्टरपंथियों को फूटी आंख ना सुहाने वाले इमाम तौहीदी ने एक साक्षात्कार में कहा था कि दुनिया का हर मुसलमान दोहरी नागरिकता रखता है। प्रत्यक्ष तौर पर वह उस देश का नागरिक होता है, जहां वह रहता है। लेकिन मूल रूप में वह स्वयं को खिलाफत यानी कि इस्लामी राज्य का हिस्सा मानता है। 13 दिसंबर को जुमे की नमाज के बाद पश्चिम बंगाल में जो हुआ, वह यही बताता है।
जामिया मिलिया इस्लामिया के कथित छात्रों ने भी वैसा ही किया। प्रधानमंत्री ने जब कहा कि हिंसा करने वालों को देख कर पहचाना जा सकता है कि इसका विरोध कौन कर रहे हैं, तो उनका इशारा इसी ओर था। क्या अब हिंसक जेहादी भीड़ यह तय करेगी कि भारत सरकार कौन-सा कानून बनाए? एक ऐसा कानून जिसका भारतीय मुसलमानों से कोई लेना-देना नहीं है, उसका विरोध सिर्फ इसलिए किया जा रहा है कि इसमें धार्मिक उत्पीड़न के शिकार जिन लोगों को नागरिकता दिया जाना है, उसमें मुसलमानों को शामिल नहीं किया गया है।
ऐसा तो उन हिन्दुओं के साथ भी हुआ है, जो पाकिस्तान, बांग्लादेश या आफगानिस्तान से नहीं आए हैं। जैसे कि श्रीलंका से आए तमिल शरणार्थी। परन्तु वे या उनके लिए कोई हिन्दू इस तरह से मरने-मारने पर कहां उतारू है। उनकी चर्चा भी वही लोग कर रहे हैं, जो चाहते हैं कि बांग्लादेशी घुसपैठियों और रोहिंगिया मुसलमानों को नागरिकता दे दी जाए। इस मुगालते में मत रहिएगा कि वे तमिल हिन्दुओं के शुभचिंतक हैं। वे तो बस अपने-आप को निष्पक्ष दिखाने के लिए ऐसा खेल कर रहे हैं। परदे के पीछे से मोदी राज में परेशान राजनीतिक दल, सिमी, पीएफआई, जमात-ए-इस्लामी जैसे इस्लामिक संगठन और कुछ एनजीओ जिनकी दुकानदारी मोदी सरकार ने खत्म कर दी है। साथ में हैं मुट्ठी भर स्वघोषित बुद्धिजीवी जिन्हें लगता है कि संविधान की रक्षा का ठेका उन्होंने ही ले रखा है।
चाहे वह योगेन्द्र यादव हों या रामचंद्र गुहा। ये लोग वार्ड काउंसलर का चुनाव नहीं जीत सकते पर संसद के दोनों सदनों द्वारा पास किए गए कानून को कूड़ा बता रहे हैं। सवाल है कि दर्द कहां है। कारण कई हैं पर सबसे बड़ा कारण है, अवैध घुसपैठिए, रोहिंगिया और देश भर में फैले उनके हमदर्द। ममता बनर्जी की राजनीतिक मजबूरी के कारण मुर्शिदाबाद, मालदा और चौबीस परगना वगैरह में मुसलमान बहुसंख्यक हो गए हैं और उनमें बांग्लादेशी घुसपैठियों की संख्या काफी बड़ी है। नागरिकता संशोधन कानून के विरोध के नाम पर उन्हीं जिलों के आसपास सबसे अधिक हिंसा हुई, जहां अवैध रूप से रह रहे लोगों की अधिकता थी। हावड़ा, नदिया, पश्चिम मेदिनीपुर में जमकर हिंसा की गयी।
सोशल मीडिया पर उपलब्ध वीडियो में देखा जा सकता है कि किस तरह उन्होंने रेलगाड़ियों को निशाना बनाया, जिसका खामियाजा निर्दोष लोगों को भुगतना पड़ा। उलुबेरिया रेलवे स्टेशन जला दिया गया और 4 लाख रुपये भी लूट लिए गए। उधर दिल्ली के जामिया और सीलमपुर में जो हुआ उसमें भी ऐसे ही तत्वों का हाथ था। बताया जाता है कि दिल्ली पुलिस ने केंद्रीय गृह सचिव एके भल्ला को जो जानकारी दी है, उसमें भी कहा गया है कि हिंसा फैलाने में बांग्लादेशी घुसपैठियों की बड़ी भूमिका रही। सीलमपुर में तो दिल्ली पुलिस को जान बचाना मुश्किल हो गया था। ध्यान रहे दिल्ली के जफराबाद, जाकिर नगर, त्रिलोकपुरी, गाजीपुर मंडी, खोड़ा, शास्त्री पार्क, कल्याणपुरी, सरिता विहार, शाहीन बाग और आसपास के इलाकों में अवैध बांग्लादेशियों का जमावड़ा है।
ये लोग इसलिए इतने आक्रोश में हैं, क्योंकि इन्हें लगता है कि अब उनके लिए भारत में रहना आसान नहीं होगा। या तो उन्हें वापस अपने देश जाना होगा या फिर शरणार्थी बन कर रहना होगा। पैसे के लालच में काम करने वाले दलालों और जेहादी मुसलमानों की मदद से मतदाता पहचान पत्र और आधार बना लेने के बाद लगता था कि अब उन्हें यहां से कोई निकाल नहीं सकता। पर गृह मंत्री अमित शाह ने साफ कर दिया कि बाहर के लोगों खासकर बांग्लादेशी और रोहिंगिया मुसलमानों को वापस जाना ही होगा। सरकार देश भर में एनआरसी कराएगी और अवैध रूप से रह रहे लोगों को वापस भेजा जाएगा। अगर वापस भेजना संभव नहीं हुआ तो उनकी पहचान कर उनके मताधिकार वापस ले लिए जाएंगे। यही बात उन लोगों को हजम नहीं हो पा रही है, जो देश में मुसलमानों की संख्या बढ़ाने के लिए अवैध रूप से घुस आए लोगों को अब तक मदद कर रहे थे। इसी का परिणाम है यह हिंसा और प्रदर्शन।
आखिर इनका मकसद क्या है? सच जानने के लिए जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय और अलीगढ़ विश्वविद्यालय में लगाए जा रहे नारों पर गौर कीजिए। ‘नाराए तकबीर अल्ला हू अकबर’। देश के प्रधानमंत्री और गृह मंत्री के साथ ही हिन्दुओं से आजादी मांगने वाले नारों का क्या अर्थ हो सकता है? एक अलग देश जहां सिर्फ मुसलमान हों? यह कैसे होगा तभी ना जब मुसलमानों की संख्या ठीक-ठाक हो जाए। इसी मकसद से घुसपैठियों और रोहिंगिया को देश भर में बसाने का प्रयास काफी समय से चल रहा है। इसकी धुरी हैं जिहादी मानसिकता के लोग जो हर बात में शरिया को ले आते हैं और कहेंगे कि यह हमारे इस्लाम के खिलाफ है।
दुर्भाग्य से अपने यहां इनकी संख्या बहुत अधिक है। इनमें पढ़े िलखे और अनपढ़, अमीर-गरीब, हर तबके के लोग हैं। इसका असर देखना हो तो कभी पश्चिम बंगाल के किसी सीमावर्ती गांव में जाकर एक रात बिताइए। पता चलेगा कि इन जिहादियों ने किस तरह से गांव के गांव खाली करा लिए। बटाईदार बनकर आए और सारा खेत ही जबरदस्ती लिखवा लिया। कुछ गांव तो ऐसे हो गए हैं, जहां मंदिर में दिया जलाने वाला भी नहीं बचा। कमाल की बात यह है कि ऐसे लोगों को अपनी बात चाशनी में डुबो कर परोसने में दिक्कत नहीं होती। क्योंकि प्रगतिशील हिन्दुओं का एक बड़ा तबका उनसे पहले ही उनकी वकालत करने लगता है। तारिक फतह ने ठीक ही कहा है कि भारत में पाकिस्तान से ज्यादा पाकिस्तानी हैं। जामिया की घटना में शामिल दो जिहादी मानसिकता की लड़कियों को जिस तरह पेश किया गया, वह सब कुछ साफ कर देता है। जबकि उन दोनों की फेसबुक प्रोफाइल कुछ और ही बयां करती है।

आज जो भीम वाले उनके साथ गलबहियां कर रहे हैं, उन्हें सोचना चाहिए कि जिनके साथ वे उठ-बैठ रहे हैं, उनका असल मकसद आसमानी किताब का शासन है, बाबा साहब के संविधान का शासन नहीं।

सोशल मीडिया पर कई वीडियो मिल जाएंगे जिनमें कुछ मुसलमान एक और बंटवारे की बात करते दिखते हैं। यह यूं ही नहीं है। असल में यही वह मकसद है, जिसके लिए अवैध घुसपैठियों को नागरिकता दने की मांग की जा रही है। ताकि जिहादियों का वोट प्रतिशत बढ़े और वे अपने मकसद को उसी राह ले जाएं जिस रास्ते जिन्ना चले थे। ध्यान से देखेंगे तो पाएंगे कि यह डायरेक्ट एक्शन का कच्चा रिहर्सल है। पर अधिकांश लोग ‘सेकुलर’ दिखने के चक्कर में सच बोलने से हिचकते हैं, जबकि ऐसी अराजक भीड़ की हिंसा का खामियाजा अंतत: उन्हें ही भुगतना पड़ेगा, जो उनके आसपास रहेगा। अगर इसी तरह मुसलमान यहां आते रहे और उन्हें नागरिकता दी जाती रही तो एक दिन यह देश भी पाकिस्तान हो जाएगा और यहां भी वही सब होगा जो वहां होता है।
और वहां क्या होता है, यह जानने के लिए हरियाणा चले जाइए जहां बेनजीर भुट्टो की सरकार में मंत्री रहा एक शख्स आज मंूगफली बेचकर गुजारा कर रहा है। वैसे वह पहले नहीं हैं। जिन्ना के पाकिस्तान में भी एक जोगेन्दर नाथ मंडल थे, जो वहां के पहले कानून मंत्री बने पर 1950 में ही उन्हें भागना पड़ा। भागकर यहीं आए और परित्यक्त जिंदगी जीकर 1968 में बनगांव में मरे। उनके साथ पाकिस्तान गए हिन्दुओं को इज्जत-आबरू की खातिर मुसलमान बनना पड़ा। आज जो भीम वाले उनके साथ गलबहियां कर रहे हैं, उन्हें सोचना चाहिए कि जिनके साथ वे उठ-बैठ रहे हैं, उनका असल मकसद आसमानी किताब का शासन है, बाबा साहब के संविधान का शासन नहीं।


 
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