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शिक्षा जीवन दृष्टि देने वाली हो

08/06/2019

राकेश राणा 
शिक्षा का मुख्य उद्देश्य इंसान को बंधनों से मुक्त करना और उसे सक्षम बनाना है। उसे बाहरी दुनियाँ से सामंजस्य बिठाने के लायक बनाना है। शिक्षा किसी समाज या राष्ट्र की संस्कृति का संरक्षण व संवर्द्धन करने एवं मानवीय जीवन की गरिमा स्थापित करने का एक आवश्यक संसाधन है। इसलिए यह जरूरी है कि शिक्षा नीति से जुड़े नियम व कानून प्रभावी ढंग से लागू हों। जिन्हें लेकर अक्सर शैक्षिक प्रशासन, राज्य सरकार एवं केन्द्र सरकार परेशानी व लाचारी दर्शा कर अपनी जिम्मेदारी से बचती रहती हैं। नीति निर्माण और नियमन को व्यवहारिक बनाने के लिए सभी की भागीदारी आवश्यक है। शिक्षक शिक्षा नीति का एक महत्वपूर्ण उपांग है इसलिए शिक्षा नीति शिक्षकों की भर्ती से लेकर उनके शिक्षण, प्रशिक्षण और प्रतिधरण तक को स्पष्ट रूप से सम्बोधित करे। शिक्षा नीति व्यापक सामाजिक दायरे को ध्यान में रखकर समान और समग्र दृष्टि तथा आवश्यक विशेषताओं एवं आवश्यकताओं द्वारा दिशा-निर्देशित हो। किसी भी नीति को रणनीतिक रूप में समग्रता के साथ व्यवहारिक, टिकाऊ तथा अपने स्थानीय संदर्भों के प्रति जवाबदेह और संवेदनशील होना ही पड़ेगा।
वर्ल्ड इकोनाॅमिक फोरम की स्टडी रिपोर्ट बताती है कि आने वाले कुछ सालों में भारत समेत दुनिया भर में तमाम नौकरियों का स्वरूप पूरी तरह से बदल जाएगा। परम्परागत नौकरियों की जगह नए ढंग की नौकरियाँ ले लेगी। भविष्य का श्रम बाजार नवाचारों की चाहत रखता है। जो इस बात को समय रहते समझ जायेंगे, वे विकास की दौड़ में बढ़त बना जायेेंगे। इसकी तैयारियां व्यक्तिगत स्तर पर भी और राष्ट्रीय स्तर पर भी हमें करनी चाहिए। इनइनोवेटिव नौकरियों हेतु सम्बन्धित एडवांस कोर्सेज, आधुनिक तकनीक और मौलिक सृजनात्मक दृष्टि विकसित करना हमारी शिक्षा नीति की केन्द्रीय चिंता होनी चाहिए। साथ-साथ भारतीय राज्य को सामाजिक कल्याण के प्रयास भी तेज करने होंगे। जैसे बाल मजदूरी निवारण कानून को पूर्ण रूप से लागू किया जाए। शिक्षा अधिकार अधिनियम की कानूनी अड़चने दूर की जाएं। हर बच्चा शिक्षा प्राप्त करे। शिक्षा प्राप्ति के माध्यम में एकरूपता लायी जाए। भारत जैसे विकासशील देशों में शिक्षा के लिए निर्धनता उन्मूलन, स्वास्थ्य संरक्षण, तकनीकी जानकारी का आदान-प्रदान, पर्यावरण का रक्षण, लिंगभेद समापन, प्रजातान्त्रिक प्रणाली को सुदृढ़ करना तथा शासन-प्रशासन में सुधार, सब के लिये न्याय सुलभता जैसे बड़े सवाल भी एकात्मक भाव के साथ हल होना जरूरी है।
भारत सरीखे विकासशील परम्परागत समाज में शिक्षा की कुछ अतिरिक्त जिम्मेदारियां भी हैं। हमारी अमूल्य निधि आध्यात्मिकता है, जो विश्व वन्दनीय है। हमारी संस्कृति का आधार ही आध्यात्मिकता है। आज हमारी शिक्षा प्रणाली में इसके समन्वय की आवश्यकता है। जो भारत को एक मजबूत और सशक्त राष्ट्र बनाये। देश की उच्च शिक्षा को शिक्षा की मूलभूत संकल्पना के साथ आधुनिक आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर भावी पीढ़ी को तैयार करना होगा। जिसके अनुरूप शिक्षा की पूरी रुपरेखा बने। अनुसंधान को दिशा मिले और शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार हो। शिक्षा में मूल्यों का समावेश हो। शैक्षिक संस्थाओं को स्वायत्ता हो। शिक्षा का पहला जिम्मा है कि राष्ट्रीय एकता और अखण्ता को अक्षुण्ण बनाये रखे और अपनी सांस्कृतिक परम्पराओं को निरन्तर पुष्पित ओर पल्लवित करे। शिक्षा प्रणाली में आध्यात्म और विज्ञान का समन्वय होगा तो सुरक्षा और विकास सुनिश्चित होंगे।
शिक्षा का अर्थ तभी है जब वह संकटों से निपटना सिखाती हो। जीवन मूल्यों को उद्घाटित करती हो। राष्ट्रीय चरित्र निर्माण और व्यक्तित्व विकास की संभावनाओं को पैदा करती हो। समसामयिक चुनौतियों को समग्रता में सम्बोधित करने की क्षमता रखती हो। शिक्षा सूचनात्मक होने के साथ-साथ सर्जनात्मक भी हो। समाज को सांस्कृतिक समृद्धि प्रदान करती हो। मानव को सांस्कृतिक प्रदूषण से बाहर निकलने में मदद करती हो और अंततः एक स्वस्थ समाज का निर्माण करती हो। आधुनिकता के नाम पर पुरातन धरोहर और परम्परागत बुध्दिमत्ता से विछोह हो रहा है। हम अपनी सांस्कृतिक थाती भूलते जा रहे है। यह जिम्मेदारी शिक्षा व्यवस्था की थी कि हम पूरी मानवता को अपने जीवनानुभवों से लाभान्वित करते। हम यह कार्य करने में चूक गये और पुनः उपनिवेशी ताकतों के चंगुल में फंसते जा रहे हैं।
नयी विश्व व्यवस्था की दिशा में 1991 से नयी आर्थिक नीतियों ने नव उदारवाद के नाम पर जो चौतरफा हमले किये है, उनमें शिक्षा पहला निशाना बनी है। देशभक्ति, स्वास्थ्य-संरक्षण, सामाजिक संवदेनशीलता तथा आध्यात्मिकता- यह शिक्षा के भव्य भवन के चार स्तम्भ हैं। शिक्षा बाजार नहीं अपितु मानव मन को तैयार करने का उदात्त सांचा है। कोरी बौद्धिकलब्धता व्यक्ति को अहम्वादी बनाती है। बौद्धिकता, भाव बोध तथा आध्यात्मिकता की इन तीन उपलब्धियों के साथ ही शिक्षा जीवन के मकसद तक सफलतापूर्वक पहुंचा सकती है। ज्ञान, भावना और क्रिया के संगम पर शिक्षा तीर्थराज प्रयाग बनती है। तभी अपने उद्देश्य में सफल होती है। जिस नये भारत की संकल्पना हम कर रहे हैं उसमें शिक्षा धुरी है। हमें अपने समाज के तनावों के स्थायी समाधान शिक्षा के जरिए अहिंसात्मक वातावरण के साथ देने होगें। जिनसे हम जाने-अनजाने जूझ रहे हैं। सामाजिक, लैंगिक, क्षेत्रीयता और धार्मिकता के तनाव हमारी उर्जा का निरन्तर ह्रास कर रहे है। ऐसे में शिक्षा की भूमिका अहम है। शिक्षा समावेशी प्रवृत्ति की हो, गुणवत्ता वाली हो, ज्ञानार्जन के साथ-साथ कौशल युक्त और मूल्यों पर आधारित हो।
हम दुनियां से जुड़ रहे हैं, विश्व की अर्थव्यवस्था ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ रही है। हमें भविष्य की अपनी जरूरतों को समझना होगा। दुनियां के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलना होगा और अपनी मूल पहचान को बनाए रखना होगा। हमारी पहचान और हमारी शक्ति हमारी आध्यात्मिक प्रवृत्ति है। आध्यात्मिकता के स्रोत से शिक्षा को जोड़ने में इस उपभोक्तावादी दौर में कहां तक सफल हो पायेंगे? विश्व जिन समस्याओं से जूझ रहा उन चुनौतियों का सफल समावेशन राष्ट्रीय शिक्षा नीति में कर पाने में कहां तक सक्षम हो पायेगें? यह हमारे सम्मुख बड़ी चुनौती है। शिक्षा ऐसी हो जो सामाजिक मनुष्य के साथ-साथ एक उत्पादक मनुष्य के रूप में एक स्वावलंबी और आत्मनिर्भर समाज का निर्माण कर सके। देशज ढंग की विशेषताओं को विकसित कर भारतीयता से भरे समाज का विकास कर सके। नागरिकों को जीवन दृष्टि प्रदान कर सके। मानवीय प्रतिष्ठा और गारिमा स्थापित कर सके। तभी शिक्षा अपने उददेश्य में सफल होगी और मानव मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करेगी। 
(लेखक युवा समाजशास्त्री हैं)


 
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