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किस्सा ईमानदार सरकार का

17/02/2020

किस्सा ईमानदार सरकार का

अरविंद केजरीवाल भले ही भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की उपज हों, लेकिन उनका भ्रष्टाचार विरोध से कोई सरोकार नहीं है। उन्होंने सत्ता में आने के लिए इस तरह का स्वांग रचा था। कहा तो यही जा रहा है। उसकी वाजिब वजह भी है। वह यह है कि उनके कई मंत्री भ्रष्टाचार के आरोप में फंसे। लेकिन ईमानदार केजरीवाल ने मुंह तक नहीं खोला।

अरविंद केजरीवाल अन्ना आंदोलन की उपज हैं। हालांकि सब लोग यह नहीं मानते हैं। कुछ यह मानते हैं कि मीडिया ने उन्हें बनाया। कुछ लोगों का कहना है कि कांग्रेस ने अरविंद केजरीवाल को खड़ा किया। जो इससे इत्तेफाक रखते हैं, वे अपने पक्ष में तर्क देते हैं। वह यह है कि अरविंद केजरीवाल दो लोगों के प्रत्यक्ष संपर्क में थे। एक तो संदीप दीक्षित है। संदीप दीक्षित दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के पुत्र है। इनका गैर-सरकारी संगठनों में अच्छा दखल माना जाता है। इसी वजह से अरविंद केजरीवाल का इनसे संपर्क था। केजरीवाल भी परिवर्तन नाम की संस्था चलाया करते थे। इनके साथी मनीष सिसोदिया कबीर से जुड़े थे।
यही वजह है कि संदीप से जुड़े थे। दूसरा जो नाम है वह भी कम बड़ा नहीं है। या फिर यूं कहू कि उनकी तुलना संदीप से करना ठीक नहीं होगा। उसका कारण यह है कि दूसरे नाम ने अपना नाम, अपने दम पर बनाया है, जबकि संदीप विरासत की वजह से ज्यादा जाने जाते हैं। धमक भी उनकी उसी वजह से हैं। लेकिन अरूणा राय की धमक विरासत की देन नहीं हैं। उन्होंने अपना कद, अपने संघर्ष से बनाया है। वे सूचना के अधिकार के लिए लड़ी और जीती भी। सरकार ने सूचना के अधिकार को नागरिक का अधिकार माना और उसे दिया। इसके लिए अरूणा राय ने बड़ा भारी आंदोलन किया था। केजरीवाल ने भी उसमें सहयोग दिया था।
तभी से उनका संबंध अरूणा राय से है। कांग्रेस की संप्रग सरकार में अरूणा राय की गिनती उन लोगों में होती थी, जिनकी धमक दस जनपथ तक थी। वे सोनिया गांधी की अध्यक्षता वाली राष्ट्रीय सलाहकार परिषद की सदस्य थी। इस वजह से उनका दस जनपथ से सीधा संबंध था। यही वह दौर था जब सत्ता में मनमोहन सिंह की सरकार थी। उस सरकार को यही सलाहकार परिषद चलाती थी। अरूणा राय परिषद का हिस्सा थी। जनलोकपाल बनाने का जिम्मा इन्हीं के पास था। इसे अरूणा राय ने अरविंद केजरीवाल को सौंप दिया था। दावा तो यहां तक किया जाता है कि इसे लेकर परिषद की जो बैठक हुई थी, उसमें अरविंद केजरीवाल भी शामिल थे।

यही वह कालखंड था जब संप्रग सरकार घोटालों में फंसी थी। एक के बाद एक घोटाले सामने आ रहे थे। टाटा से लेकर अंबानी तक इन घोटालों में फंस गए थे। इनकी साख पर बट्टा लग चुका था। सरकार की तो फजीहत शुरू हो गई थी। जनता सरकार के घोटालों से त्रस्त थी। इसी दौरान स्वामी रामदेव ने भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान छेड़ दिया था।

संदीप देव ने अपनी किताब ‘केजरीवाल : साजिश या सच्चाई’ में लिखते हैं कि 2010 में जनलोकपाल का मसौदा तैयार हो गया था। इसे अरूणा राय की संस्था ने तैयार किया था। उसमें अरविंद केजरीवाल की अहम भूमिका थी। यही वह दौर था जब संप्रग सरकार घोटालों में फंसी थी। एक के बाद एक घोटाले सामने आ रहे थे। टाटा से लेकर अंबानी तक इन घोटालों में फंस गए थे। इनकी साख पर बट्टा लग चुका था। सरकार की तो फजीहत शुरू हो गई थी। जनता सरकार के घोटालों से त्रस्त थी। इसी दौरान स्वामी रामदेव ने भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान छेड़ दिया था। वे लाखों लोग के साथ दिल्ली में धरने पर बैठ पर गए थे। संदीप देव लिखते हैं कि इससे संप्रग सरकार घबरा गई थी। उसे लगा कि यदि रामदेव का आंदोलन जोर पकड़ेगा तो 2014 के चुनाव में कांग्रेस को भारी नुकसान होगा।
दूसरी ओर औद्योगिक घराने, घोटाले में नाम आने की वजह से बदनाम हो रहे थे। उनकी साख गिरती जा रही थी। वे भी चाहते थे कि किसी भी तरह से साख को बचाया जाए। उसका महज एक तरीका था, वह यह कि लोगों का ध्यान भटकाया जाए। उसके लिए जरूरी था कि देश में कुछ ऐसा किया जाए जिससे जनता का सारा ध्यान औद्योगिक घरानों के बजाय सरकार पर चला जाए। मीडिया की भी यही मनसा थी। स्पेक्ट्रम के खेल में उसका भी चरित्र हनन हो चुका था। जनता जान चुकी थी कि जिसे चौथा खंभा कहा जाता है, वह दलाल बन चुका है। उसकी खबर दिखाने में कोई रूचि नहीं है। उसकी अगर कही रूचि है तो वह खबर छुपाने में है। कारण, वह खुद उस भ्रष्टाचार का शिकार हो चुका है जो सरकारी तंत्र में फैला हुआ है। इसलिए मीडिया दलाली के दाग को धोना चाहता था।

पहला आरोप तो भाई- भतीजवाद का ही है। कहा जाता है कि अरविंद केजरीवाल ने अपने साढू के लिए सरकार का खजाना खोल दिया था। वे जो चाहे उसमें से ले सकते थे। जितने का चाहे, उतने का बिल पास करा ले। सरकार में उनकी ठसक इतनी थी कि उन्हें, उस काम का भी पैसा मिल जाता था जो सिर्फ कागजों पर रहा।

इसमें ज्यादातर वे लोग थे जो इलेक्ट्रानिक मीडिया से आते है। इस वजह से वे भी चाहते थे कि साख को दोबारा बहाल किया जाए। वह तब तक संभव नहीं था जबतक कि सरकार को आड़े हाथ न लिया जाए। स्वामी रामदेव के आंदोलन ने मीडिया को एक अवसर दिया था। पर सरकार उसे ज्यादा तब्बजों देने के पक्ष में नहीं थी। वह चाहती थी कि स्वामी रामदेव के आंदोलन को फुस किया जाए। इसके लिए आवश्यक यह था कि उस आंदोलन के समानांतर दूसरा आंदोलन खड़ा किया जाए। वह आंदोलन ऐसा हो जिससे संप्रग को आगामी चुनाव में नुकसान भी न हो और भ्रष्टाचार का मुद्दा भी समाप्त हो जाए। कहा जाता है कि इस लिहाज से कांग्रेस को अरविंद केजरीवाल सबसे मुफीद दिखे। लिहाजा अन्ना की अगुनाई में भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन खड़ा हुआ।
उसे व्यापक बनाने के लिए मीडिया को कारपोरेट घराने ने खूब फंडिग की। दावा किया जाता है कि वह ऐसा कालखंड था जब मीडिया हाउस को कुछ चुनिंदा घरानों ने खूब विज्ञापन दिया। वह सिर्फ इसलिए ताकि कारपोरेट घरानों से जनता का ध्यान भटके। इसमें कारपोरेट घराने सफल भी रहे। नीरा राडिया टेप में आए लोगों का नाम इस आंदोलन की वजह से नेपथ्य में चला गया। किसी को ध्यान ही नहीं रहा कि कौन सा कारपोरेट घराना स्पेक्ट्रम का ठेका लेने के लिए कितना नीचे गिर गया था। इसी आंदोलन की वजह से कुछ बड़े उद्योगपतियों के चरित्र का किस्सा भी ठंड़े बस्ते में चला गया। यह मीडिया के लिए भी जरूरी था। कारपोरेट घरानों की तरह ही कई मीडिया हाउस के पत्रकार भी नीरा राडिया टेप के शिकार थे। इसलिए वे नहीं चाहते थे कि राडिया टेप पर कोई बात हो।

कांग्रेस को अरविंद केजरीवाल सबसे मुफीद दिखे। लिहाजा अन्ना की अगुनाई में भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन खड़ा हुआ। उसे व्यापक बनाने के लिए मीडिया को कॉरपोरेट घराने ने खूब फंडिग की। दावा किया जाता है कि वह ऐसा दौर था जब मीडिया हाउस को कुछ चुनिंदा घरानों ने खूब विज्ञापन दिया। वह सिर्फ इसलिए ताकि कॉरपोरेट घरानों से जनता का ध्यान भटके।

दूसरा मीडिया को भी अपनी छवि सुधारनी थी। लिहाजा अन्ना आंदोलन को सरकार, मीडिया और कारपोरेट जगत ने मिलकर खड़ा किया। उस आंदोलन के हीरो अरविंद केजरीवाल बने। लेकिन एक धड़ा ऐसा भी है जो भ्रष्टाचार के खिलाफ खड़े हुए दोनों आंदोलन को सहज भाव से देखता है। उसका कहना है कि स्वामी रामदेव सरकार से डर गए थे। इसलिए जान बचाकर भाग निकले थे। उनके अंदर सरकारी हिंसा का खौफ इतना अधिक घर कर चुका था कि वे दोबारा आंदोलन खड़ा करने का साहस नहीं जुटा पाए। उसके विपरीत अन्ना डटे रहे। उन्हें न तो सरकार का भय था और न कुछ पाने की लालसा। वह तो बस देश और समाज को भ्रष्टाचार के कीड़े से मुक्त कराना चाहते थे। कारण, इसने हिन्दुस्तान को खोखला बना दिया था। भारत की समृद्धि रूक चुकी थी।
विकास का पहिया पटरी से उतर चुका था। उसे पटरी पर लाने के लिए भ्रष्टाचार को भागना जरूर हो गया था। उसके लिए ही अन्ना हजारे अपने शिष्य अरविंद केजरीवाल के साथ रामलीला मैदान में डटे थे। वे चाहते थे कि सरकार लोकपाल लाए और देश को भ्रष्टाचार से मुक्त कराए। उनकी योजना थी कि लोकपाल ऐसा हो जिसमें सबकी जवाबदेही तय हो। पर सरकार उनकी तरह सीधा-सपाट नहीं सोचती थी। वह लोकपाल लाने के पक्ष में तो थी, लेकिन जैसा अन्ना चाहते थे, वैसा नहीं। लेकिन अन्ना के अड़ने की वजह से सरकार बहादुर डरी थी। इसलिए फौरी तौर पर उसने वह सब मान लिया जो अन्ना चाहते थे। अन्ना को भी लगा कि उनका आंदोलन रंग लाया। यह सब चल रहा था और अरविंद केजरीवाल के मन में राजनीतिक महत्वाकांक्षा हिलोरी ले रही थी।

विज्ञापन की वजह से मीडिया घराने केजरीवाल के घोटाले पर पर्दा डाले है। इसका ताजा उदाहरण केजरीवाल का शिक्षा घोटाला है जो 2000 करोड़ रु का है। लेकिन किसी भी मीडिया घराने ने इतनी बड़ी खबर को जगह नहीं दी। कायदे से इस खबर को अभियान की तरह चलाया जाना चाहिए था। पर किसी ने नहीं चलाया। उस दौरान के अखबार को गौर से देखिए तो खबर न चलाने का रहस्य पता चल जाएगा।

उसे केजरीवाल आम आदमी पार्टी बनाकर साकार किया। केजरीवाल के इस कदम की बहुत आलोचना हुई। वह इसलिए क्योंकि उन्होंने एक आंदोलन की संभावना को खत्म कर दिया था। उसकी साख को धूमिल कर दिया था। उनके इस कदम से आंदोलन को लोग शक की निगाह से देखने लगे। कहने लगे कि कल ये पार्टी बना लेगे और राजनीति के पंडित बन जाएगे। शायद इस तरह की बात तब ज्यादा नहीं होती जब केजरीवाल, जिस आंदोलन से खड़े हुए है, उसके सिद्धांतों पर चलते। लेकिन केजरीवाल ने ऐसा किया नहीं। वे भले ही भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की उपज है, पर उनकी सरकार में इसका कोई विरोध नहीं है। सरकार भ्रष्टाचार के तमाम आरोपों में घिरी है।
पहला आरोप तो भाई-भतीजवाद का ही है। कहा जाता है कि अरविंद केजरीवाल ने अपने साढू के लिए सरकार का खजाना खोल दिया था। वे जो चाहे उसमें से ले सकते थे। जितने का चाहे, उतने का बिल पास करा ले। सरकार में उनकी ठसक इतनी थी कि उन्हें, उस काम का भी पैसा मिल जाता था जो सिर्फ कागजों पर रहा। वहीं पर काम दिखाकर साढू ने करोड़ों रु. सरकार से ऐठ लिए। इस मामले में साढू के दमाम निकुंज अग्रवाल भी पीछे नहीं रहे। सरकार ने भी पूरी मदद की। वे कहने के लिए तो डाक्टर है, पर डाक्टरी का अनुभव नदारद है। इसके बाद भी 2015 में केजरीवाल सरकार ने उन्हें सरकारी डाक्टरी बना दिया। इसके लिए निकुंज को कोई खास मेहनत नहीं करनी पड़ी। सरकार ने उनसे कहा कि वे एक आवेदन पत्र डाल दे।
उन्होंने हाथ से लिखकर आवेदन पत्र डाल दिया। चार दिन के भीतर उन्हें नियुक्ति पत्र मिल गया। पांचवे दिन वे सरकारी डाक्टर बन गए। उसके कुछ दिन बाद दमाद बाबू को स्वास्थ्य मंत्री सत्तेंद्र जैन का ओएसडी बना दिया गया। यह सब नियम कानून को ताख पर रख कर किया गया। दावा किया जाता है कि इसी तरह मनीष सिसोदिया के साले ने भी खूब पैसा बनाया। विज्ञापन को लेकर जो खेल हुआ है, उसमें सिसोदिया के साले का नाम सीधे तौर पर आता है। उसे केजरीवाल सरकार ने 3.254 करोड़ रु. का ठेका दिया था। इसके लिए जो जरूरी नियम-कानून है उसका पालन नहीं किया गया था। यह बात कोई और नहीं, नियंत्रक और महालेखा परीक्षक कह रहे हैं। कुछ ऐसा ही मामला स्वास्थ्य मंत्री की बेटी का भी है। उसे बिना किसी काबिलियत के सलाहकार बना दिया गया। मोटी तनख्वाह तय कर दी गई। मुख्यमंत्री का भी सलाहकार जिन लोगों को बनाया गया, वे भी तय योग्यता नहीं रखते हैं।
उन्हें बस केजरीवाल सरकार ने इसलिए रख लिया क्योंकि वे केजरीवाल के विश्वस्त है। इसलिए केजरीवाल ने हेराफेरी होने दी। हेराफेरी का यह अकेला मामला नहीं है। उनके मुख्य सचिव राजेन्द्र कुमार को ले लीजिए। उन पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगे। सीबीआई ने उनके दμतर पर छापे तक मारे। लेकिन अरविंद केजरीवाल ने राजेन्द्र कुमार के भ्रष्टाचार पर एक शब्द नहीं बोला। अलबत्ता वे राजेन्द्र कुमार के बचाव में उतर आए और कहने लगे केन्द्र सरकार उनके सहयोगियों को जानबूझ कर परेशान कर रही है।
अगर इसे एकबारगी सही मान भी लिया जाए तो भी जो सबूत राजेन्द्र कुमार के खिलाफ मिले हैं, उस पर केजरीवाल और उनकी सरकार को कुछ बोलना चाहिए था। पर उन्होंने भ्रष्टाचार के आरोप में घिरे राजेन्द्र कुमार के खिलाफ कुछ बोलना मुनासिब नहीं समझा। यह स्वभाविक था। ऐसा इसलिए कहा जा रहा है क्योंकि जिस डीएम सपोलिया के खिलाफ अरविंद केजरीवाल ने मोर्चा खोल रखा था, सत्ता में आते ही उसे क्लीन चिट दे दी। जबतक केजरीवाल सत्ता में नहीं थे तबतक वे सपोलिया पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाते रहे। कुर्सी मिलते ही सपोलिया ईमानदार हो गए। इससे एक बात तो साफ हो गई थी कि अरविंद केजरीवाल भले ही भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की उपज हो, लेकिन उनका भ्रष्टाचार विरोध से कोई सरोकार नहीं है। उन्होंने सत्ता में आने के लिए इस तरह का स्वांग रचा था।
कहा तो यही जा रहा है। उसकी वाजिब वजह भी है। वह यह है कि उनके कई मंत्री भ्रष्टाचार के आरोप में फंसे। कुछ के घर जांच एजेंसियों ने छापा भी मारा। छापे में आय से अधिक संपत्ति वरामद हुई। लेकिन ईमानदार केजरीवाल ने उस मुंह तक नहीं खोला। मनीष सिसोदिया का मामला ले लीजिए। उन पर बतौर शिक्षामंत्री 2000 करोड़ रु. के घोटाले का आरोप है। पर केजरीवाल उसे मानने के लिए तैयार नहीं है। कुछ ऐसा ही आरोप कैलाश गहलोत पर लगा था। उनके यहां एजेंसी ने छापा मारा था। एजेंसी को 120 करोड़ रु. की कर चोरी का कागज मिला था। सत्येन्द्र जैन का मामला भी कुछ ऐसा ही है। पर किसी भी मसले पर भ्रष्टाचार विरोधी अरविंद केजरीवाल ने कुछ नहीं कहा। अगर कुछ कहा तो वह इतना भर कि यह केन्द्र सरकार की साजिश है।
हालांकि साजिश क्या होती है? यह केजरीवाल को याद दिलाने की जरूरत है। वे शायद भूल गए है कि बिजली के खंभों पर चढ़कर उन्होंने शीला सरकार और बिजली कंपनियों के खिलाफ अभियान छेड़ा था। कहा था कि सरकार में आते ही बिजली का दाम कम करेगे और बिजली कंपनियों की आडिटिंग करेंगे। तब यह सवाल खूब उठा था कि बिजली का दाम कम कैसे होगा। इसका जवाब केजरीवाल यह कहकर देते थे कि बिजली कंपनियां मुनाफाखोरी कर रही है, उसे बंद करवा दिया जाए तो दाम कम हो जाएगा। लोगों को लगा था कि केजरीवाल सच बोल रहे है। लिहाजा जनता ने उन्हें चुन लिया। उसे भरोसा जो था। बारी अब केजरीवाल की थी। उन्हें जनता के भरोसों को कायम रखना था। उसके लिए उन्हें दो काम करना था जिसका विपक्ष में रहते हुए, उन्होंने सबसे ज्यादा शोर मचाया था। पहला बिजली का दाम कम करना था और बिजली कंपनियों का आडिट कराना था।
और दूसरा मुकेश अबानी के खिलाफ कार्रवाई करनी थी। चुनावों में केजरीवाल कहा करते थे कि कांग्रेस और भाजपा अंबानी की दुकान है। अंबानी ही दोनों की सरकार चलाते हैं और मनमाने फैसले करवाते हैं। केजी बेसिन वाले मामले पर तो सीधा हमला बोलते हुए केजरीवाल ने मुकेश अंबानी के खिलाफ मामला दर्ज कराने का वादा किया था। सरकार बनने के बाद इसे पूरा करने का समय आ गया था। लिहाजा केजरीवाल ने पूरे जोश के साथ भ्रष्टाचार निरोधी शाखा में मुकेश अंबानी के खिलाफ मामला दर्ज कराया। यह बात 2014 फरवरी की है। लेकिन कुछ दिनों बाद ही सरकार चली गई। वे दोबारा वापसी फरवरी 2015 में हुई। तब से चार साल बीत चुका है। अरविंद केजरीवाल उस मसले पर बात नहीं कर रहे हैं। वह पूरा मामला कूडेदान में फेंक दिया गया है। शायद इसलिए क्योंकि अब केजरीवाल को उसकी जरूरत नहीं है। वे सरकार बना चुके हैं। जनता को ठग चुके हैं।
वह भी मुकेश अंबानी वाले केजरी जुमले को भूल चुकी है। उसके जेहन में बिजली वाला मामला भी नहीं होगा। इसलिए उसे याद दिलाना जरूरी है। तभी वह समझ पाएगी कि केजरीवाल सरकार ने उन्हें किस तरह मूर्ख बनाया है। उसके लिए कुछ बातें जानना आवश्यक है। पहला यह कि केजरीवाल सरकार ने बिजली कंपनियों का आडिट नहीं कराया है। इसका वादा उन्होंने दिल्ली की जनता से किया था। दूसरा, बिजली का दाम इसलिए कम हुआ है क्योंकि केजरीवाल सरकार कंपनियों को सब्सिडी दे रही है। इसका मतलब यह हुआ कि बिजली कंपनियां जो मुनाफाखोरी कर रही थी, वह जारी है। उसमें कोई कमी नहीं आई है। केजरीवाल ने जनता से झूठा वादा किया था। इतना ही नहीं केजरीवाल ने यह भी झूठ बोला था कि उनका कारपोरेट घरानों से कोई संबंध नहीं है। केजरीवाल सरकार का सीधा संबंध कारपोरेट घरानों से है। उनको फायदा पहुंचाने में केजरीवाल सरकार लगी हुई है। यह है तो चचौंकाने वाली बात, पर सच यही है। दिल्ली में बिजली आपूर्ति का ठेका अनिल अंबानी और टाटा के पास है।
ये वही लोग है जो दिल्ली की जनता से बिजली का ज्यादा बिल वसूला करते थे। बिल के आड़े में मुनाफाखोरी करते थे। यह दावा खुद केजरीवाल ने चुनावों के दौरान किया था। लेकिन सरकार में आने के बाद केजरीवाल ने इन दोनों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की। अलबत्ता इन्हें मुनाफा कमाने का पूरा मौका दिया। देते भी क्योंकि नहीं टाटा ने तो अरविंद केजरीवाल की संस्था को संघर्ष के दिनों में काफी आर्थिक मदद दी थी। उसका कर्जा जनता की जेब काट कर चुकाया जा रहा है। पर जनता केजरीवाल के इस सच से बेखबर है। उसकी वजह वह विज्ञापन है जिस पर मीडिया घराना जिंदा है। हर मीडिया घराने को केजरीवाल सरकार से करोड़ो का विज्ञापन मिलता है। उस विज्ञापन की वजह से मीडिया घराने केजरीवाल के घोटाले पर पर्दा डाले है। इसका ताजा उदाहरण केजरीवाल का शिक्षा घोटाला है जो 2000 करोड़ रु का है। लेकिन किसी भी मीडिया घराने ने इतनी बड़ी खबर को जगह नहीं दी।
कायदे से इस खबर को अभियान की तरह चलाया जाना चाहिए था। पर किसी ने नहीं चलाया। अगर उस दौरान के अखबार को गौर से देखिए तो खबर न चलाने का रहस्य पता चल जाएगा। उस दरमियान केजरीवाल सरकार ने डेढ़ पेज का विज्ञापन देना शुरू कर दिया था। फुल पेज वाले विज्ञापन पर केजरीवाल हुआ करते थे और आधे पेज वाले विज्ञापन मनीष सिसोदिया। इस डेढ़ पेज के विज्ञापन में शिक्षा घोटाले की खबर ने दम तोड़ दिया। ऐसे ही केजरीवाल सरकार की कई खबरें है जो विज्ञापन की भेंट चढ़ गई। मगर फिर भी केजरीवाल सरकार ईमानदार है।


 
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