यथावत

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तबाही से सचेत करती पर्यावरण की चिंता

18/09/2019

तबाही से सचेत करती पर्यावरण की चिंता

यथावत

ब्दों की साधना, अनुभव की गहराई और कल्पना की स्याही से तपकर कुछ पुस्तकें पाठकों का ध्यान बरबस अपनी ओर खींचती हैं। इसी कड़ी में ‘माटी मानुष चून’ भी है। अभय मिश्रा की यह पुस्तक इसी वर्ष 2019 में वाणी प्रकाशन से आई है। अभय मिश्रा सिर्फ पर्यावरणविद् नहीं हैं, बल्कि वह इससे आगे प्रकृति की गोद में ही अपना जीवन तलाशते रहते हैं। इन्होंने पूरे गंगा पथ (गोमुख से गंगासागर तक) की चार बार यात्रा की है। देश की हर नदी के तट को सशरीर भी स्पर्श किया है। इन्होंने ‘माटी मानुष चून’ से पहले ‘दर दर गंगे’ लिखी थी, जो पाठकों के द्वारा काफी सराही गई थी। ‘माटी मानुष चून’ की कहानी भविष्य की एक झलक है। इस कहानी की धुरी है सन 2074 में फरक्का बांध का टूटना।

यह घटना किस कदर प्रलय को जन्म देगी, उसकी बात इस पुस्तक में की गई है। जिस तरह से कोई भविष्यवक्ता किसी घटना का लाभ-हानि बताने में खुद को सक्षम पाता है, कुछ उसी तरह से अभय मिश्रा ने भी भविष्य की आंखों से यह देखने का प्रयास किया है कि अगर फरक्का बांध टूट जाता है तो कितनी बड़ी विपदा आएगी। मानव का जीवन यंत्रों पर निर्भर हो चला है। यह यंत्र कब यंत्रणा में बदल जाएगा, इस पर कोई वैज्ञानिक या उपभोक्ता बात करने के लिए तैयार नहीं दिखता है। सब जानते हुए भी लोग बात करने से डरते हैं। इस पुस्तक के लेखक इस यंत्र के असफल हो जाने पर जो तबाही होगी, उस पर लोगों का ध्यान खींचने में सफल रहे हैें।

पुस्तक-नाम
माटी मानुष चून
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लेखक
अभय मिश्रा
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मूल्य
199 रुपये
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प्रकाशक का नाम
वाणी प्रकाशन
4695, 21-ए, दरियागंज
नयी दिल्ली-110002

लेखक को पता है कि आंकड़ों का खेल सरकारी महकमे के लिए तो ठीक है, लेकिन जनमानस को वही बातें बताने के लिए किस्से- कहानियों का सहारा लेना होगा। प्राचीन समय से इस विधा का उपयोग हमारे पूर्वज करते आए हैं। उसी विधा का सहारा लेकर अभय मिश्रा ने गंगा के तट पर बसे लोगों के जीवन कैसा होगा, उस पर चर्चा की है। ‘माटी मानुष चून’ को उपन्यास शैली में लिखा गया है। इस उपन्यास की नायिका साक्षी है। साक्षी बाढ़ के बाद तबाही का आकलन करने के लिए विदेश से भारत आती है। सरकार अपनी नाकामी को छुपाने के लिए हर संभव प्रयास करती है। आप सड़ चुके व्यवस्था पर कालीन तो बिछा सकते हैं लेकिन उठते हुए सड़ांध और बदबू का क्या भरोसा, वह कब फैलने लगे। सरकारी अधिकारी सुब्रतो दासगुप्ता हर संभव प्रयास करते हैं कि साक्षी को वही दिखे, जो वह दिखाना चाहते हैं। इसके विपरीत साक्षी की अनुभवी आंखें वह देखने में सक्षम है, जिसे सरकार छुपाना चाहती है। नदी हमारी मां है, फिर उसे बांधने की क्या जरूरत आ पड़ी?

मानव के लिए ज्यादा जरूरी क्या है-बिजली या पानी? नि:संदेह पानी। बस अभय मिश्रा यही चाहते हैं कि मानव अपनी जरूरत को समझे। पानी-बिजली की लड़ाई मानव को उस दिशा में ले जा रही है, जिसमें तबाही के सिवा कुछ प्राप्त नहीं होने वाला है। प्रकृति प्रदत्त बाढ़ जहां एक ओर संतुलन लाती है,वहीं मानव की बेलगाम व्यवहार से बुलाई गई बाढ़ असंतुलन पैदा करती है। इस पुस्तक को पढ़ते हुए आप डर जाएंगे, लेकिन यह 2074 में होने वाला है अत: चाहें तो हम संभल भी सकते हैं। इस विपदा को पीछे धकेला जा सकता है। समाजसेवी और पर्यावरण की समझ रखने वाले अनुपम मिश्र कहा करते थे – ‘‘हम अपने जीवनचर्या से धीरे-धीरे ही नदी को खत्म करते हैं और जीवनचर्या से धीरे-धीरे ही उसे बचा सकते हैं।’’ अभय मिश्रा की पुस्तक प्रकृति को बचाने के लिए लिखी गई है।

हम जिस विकास के बारूद के ढेर पर बैठे हैं, उससे कैसी तबाही आने वाली है, उसकी एक झलक इस पुस्तक में देखने को मिलती है। उस तबाही का स्वरूप बहुत भयावह है। प्रकृति से हर व्यक्ति जाने-अनजाने गहराई से जुड़ा हुआ है। सुधी पाठक के लिए आवश्यक हो जाता है कि वह इस पुस्तक को पढ़े और विनाश की दिशा में बढ़ा रहे कदम को रोकने के लिए हर संभव प्रयास करे। कामना करें कि 2074 में वह त्रासदी देखने-सुनने को ना मिले, जिसकी चर्चा इस पुस्तक में की गई है। आने वाली तबाही और प्रलय से किस तरह से बचें, पुस्तक ‘माटी मानुष चून’ इसके लिए प्रयास करती दिखती है।


 
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