युगवार्ता

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व्यवहार ही नहीं प्रत्याहार भी चाहिए

25/06/2020

व्यवहार ही नहीं प्रत्याहार भी चाहिए

योग द्वारा मनुष्य विवेकपूर्ण ढंग से आत्म नियंत्रण विकसित करता है और अपने लिए तथा दुनिया के लिए कल्याण का मार्ग प्रशस्त करता है। योग हमें स्वस्थ जीवन के लिए प्रशिक्षित करता है।

गिरीश्वर मिश्र

नंद और सुख की तलाश जीवन का सहज स्वाभाविक उद्देश्य है। हालांकि आजकल के व्यस्त परिवेश में आम तौर पर हम सभी तनाव, कुंठा और चिंता की अनुभूति को लेकर जीवन जी रहे हैं। इस स्थिति में बहुतों के लिए जीवन एक युद्ध और संघर्ष का रूप लेता जा रहा है और सुख की अनुभूति दूर होती जा रही है। यह स्थिति पर्यावरण के विषाक्त होने से और जटिल होती जा रही है। स्वयं को सुरक्षित रखना और सकारात्मक रूप से क्रियाशील बना रहना जीवन में सफलता के लिए जरूरी है। इस संदर्भ में ‘स्वस्थ रहना और स्वास्थ्य की रक्षा करना’ इस लक्ष्य को एक वैश्विक चुनौती के रूप में स्वीकार करते हुए शताब्दी के लिए निर्धारित विकास-लक्ष्यों में प्रमुख स्थान दिया गया है।

बा‘ परिस्थितियों का सहयोग स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है परंतु पर्याप्त नहीं है। हम सभी देखते हैं कि अच्छी परिस्थिति और समृद्ध होने पर भी सभी लोग स्वस्थ नहीं रहते क्योंकि उनकी जीवन-दृष्टि और चेष्टाएं स्वास्थ्य के विरुद्ध होती हैं। भारतीय परम्परा में स्वस्थ शरीर और मन को स्वाभाविक स्थिति माना गया है क्योंकि हमारा स्वरूप मूलत: सत चित आनंद से अनुप्राणित है। अर्थात आनंद हमारा स्वभाव है परंतु एक प्राणी के रूप में हमारे आचरण या व्यवहार में विकार आने के कारण हमें दुख, कष्ट और पीड़ा से गुजरना पड़ता है। हमारा मूल स्वभाव बना रहे और हम समर्थ और सशक्त रहते हुए सक्रिय जीवन बिताएं इसके लिए योग का विधान किया गया है। योग द्वारा मनुष्य विवेकपूर्ण ढंग से आत्म नियंत्रण विकसित करता है और अपने लिए तथा अपनी दुनिया के लिए कल्याण का मार्ग प्रशस्त करता है। योग हमें स्वस्थ जीवन के लिए प्रशिक्षित करता है। भारत में प्राचीन काल से भक्ति योग, कर्म योग, राज योग , हठ योग, लय योग आदि की अनेक पद्धतियां प्रचलित रही हैं और आधुनिक युग में भी उनका विस्तार हुआ है। महर्षि पतंजलि द्वारा योगसूत्र में शास्त्र का विधिवत निरूपण किया गया और श्रीमद्भगवद्गीता भी योगेश्वर श्रीकृष्ण द्वारा योग के उपयोग का प्रतिपादन उपलब्ध कराती है। इन दोनों के विवेचन को देखें तो पता चलता है कि एक प्राणी के रूप में हमें सचेत हो कर अपने व्यवहार का परीक्षण, निरीक्षण और विश्लेषण कर उसका परिष्कार और परिमार्जन करना चाहिए।

विचार करें तो यह सहज ही ज्ञात होता है कि बाहर की दुनिया के साथ सम्पर्क के माध्यम के रूप में हमारे पास आंख, कान, नाक, जिह्वा, त्वचा जैसी यदि बा ज्ञानेंद्रियां मौजूद हैं तो अंदर की सुख-दुख की नाना प्रकार की अनुभूतियों को जानने के लिए आंतरिक ज्ञानेंद्रिय के रूप में मन जैसा अंत: करण भी उपलब्ध है। मन के चार पक्षों की पहचान की गई है : मानस, बुद्धि, अहंकार और चित्त। ज्ञानेंद्रियां और अंत:करण चतुष्टय ये दोनों मिल कर जीवन जीने की कार्य सूची तय करते हैं। इस क्रम में जीवन में हम मुख्यत: तमाम लक्ष्यों और उद्देश्यों की ओर आगे बढ़ते हैं और कुछ की उपेक्षा कर छोड़ देते हैं। इस तरह इंद्रियों का विषयों के साथ सन्निकर्ष या सम्पर्क द्वारा जीवन का ताना-बाना रचा जाता है। दुनिया में विषयों (पदार्थों) की बहुतायत है और वे हमको आकर्षित करते हैं। हम उनके संसर्ग में आकर उन्हीं की तरह ढलते जाते हैं। उनका अधिक व्यसन हो जाने पर हमारी विवेक-बुद्धि जाती रहती है। तब हम अच्छे-बुरे, उचित-अनुचित का भेद नहीं करते। गीता में भगवान कृष्ण कहते हैं कि ‘अपने-अपने विषयों में विचरण करते हुए इंद्रिय मन को अपना अनुगामी बना लेती है और मन जल में स्थित नाव को जैसे वायु बहा ले जाती है उसी तरह बुद्धि को हर लेती है। दूसरे शब्दों में इंद्रिय मन को हर कर उसे भोगों में लगा देती है’ (गीता, अध्याय 2। 67)। इंद्रिय के प्रत्येक विषय में राग और द्वेष उपस्थित रहते हैं। इसलिए विषयों का चिंतन करने वाले मनुष्य की उन उन विषयों में आसक्ति या लगाव हो जाता है। आसक्ति से कामना जन्म लेती है। यदि कोई बाधा आ जाय और कामना पूरा न हो तो क्रोध उपजता है। जब क्रोध पैदा होता है तो सम्मोह या मूढता पैदा होती है। सम्मोह से स्मृति नष्ट भ्रष्ट होती है। स्मृति गई तो बुद्धि या विवेक समाप्त हो जाता है और बुद्धि नष्ट होने पर मनुष्य का सर्वनाश या पतन हो जाता है (गीता, अध्याय 2, 62-63)। इंद्रियां इतनी प्रमथनशील होती हैं कि बलपूर्वक मन को हर लेती हैं। इसलिए इंद्रियों को संयमित या वश में करना जरूरी है। जिसकी इंद्रियां वश में हैं उसी की बुद्धि स्थिर है : वशे हि यस्येंद्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता (गीता, 2,61)। यदि मन और इंद्रियां संयमित नहीं हैं उसके विवेक नहीं होता और ऐसे अयुक्त मनुष्य में अनासक्त कर्म की प्रवृत्ति( भावना) नहीं होगी और ऐसे में शांति नहीं मिलेगी और शांति न होने पर सुख कहां मिलेगा :  नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना, न चाभावयत: शांतिरशांतस्य कुत: सुखम (गीता, 2,66)। कृष्ण भगवान अर्जुन को आगे भी समझाते हुए कहते हैं कि ‘जो मनुष्य मन से इंद्रियों पर नियंत्रण कर के आसक्ति रहित हो कर कर्म योग  का आचरण करता है वही श्रेष्ठ है’ (गीता 5,2)।

यह स्मरणीय है कि जिस जितेंद्रिय की बात की जा रही है निष्क्रिय नहीं है। वह कर्मयोगी है सबसे जुड़ा हुआ है : योगयुक्तो विशुद्धात्मा विजितात्मा जितेंद्रिय:, सर्वभूतात्मभूतात्मा कुर्वन्नपि न लिप्यते (गीता, 5-7) अर्थात जिस जिसकी इंद्रियां अपने वश में हैं, जिसका अंत:करण निर्मल है, जिसका शरीर अपने वश में है और सम्पूर्ण प्राणियों की आत्मा ही जिसकी आत्मा है ऐसा कर्मयोगी कर्म करते हुए भी लिप्त नहीं होता। उल्लेखनीय है योग की दिशा में आगे बढ़ने वाले के लिए गीता में ‘युक्त’ होने पर बड़ा बल दिया गया है। अर्थात उसके सभी कार्य उपयुक्त होने चाहि, ठीक मात्रा और अनुपात में। उसे उपयुक्त आहार ( भोजन), विहार, चेष्टा करनी चाहिए, उपयुक्त मात्रा में सोना और जागना चाहिए (युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु, युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दु:खहा, गीता, 6-17)। ऐसे व्यक्तियों के लिए योग दुख का नाश करने वाला होता है।

आज के जीवन में आधुनिकता, विकास, प्रगति और उन्नति के आकर्षक विस्तारवादी रवैये में संतोष और उपयुक्त का विचार वर्जित सा हो रहा है। बिना विचार के अधिकाधिक अर्जित करने, संग्रह करने और उपभोग की लालसा ने सभी को अंधी दौड़ में शामिल कर दिया है। दूसरे शब्दों में विषयों का आकर्षण ही प्रबल हो रहा है और उसी के साथ राग द्वेष बढ़ रहे हैं। भय और आक्रोश भी बढ़ रहा है। दूसरी ओर अनिद्रा, अवसाद, चिंता, तनाव आदि सबके जीवन में प्रवेश कर रहे हैं। इनसे मनोदैहिक रोग तीव्र गति से बढ रहे हैं। अब यदि परिवर्तन लाना है तो इंद्रियों में आसक्ति कम करनी पड़ेगी। इस हेतु योग में प्रत्याहार का विधान किया गया है। यह अष्टांग योग का पांचवां चरण है। शाब्दिक रूप से प्रति का अर्थ होता है ‘विपरीत’ और आ का अर्थ है ‘की ओर’ । इस तरह प्रत्याहार का अर्थ हुआ पीछे की ओर वापस लाना ताकि चैतन्य की उचित अवस्था की ओर पूरी शक्ति के साथ आ सकें।

यम से प्राणायाम तक और प्रत्याहार से समाधि तक योग के दो पंख हैं। इन दोनों के सिद्ध हो जाने पर योगी आत्मस्थ हो जाता है। ज्ञानेंद्रियों और मन को नियंत्रित कर चित्त को आत्म की ओर तथा आत्म को परमात्मा की ओर ले जाते हैं। स्मरणीय है कि अनेक योग पद्धतियों में भिन्न-भिन्न रूपों में प्रत्याहार  का उपयोग किया जाता है। उदाहरणार्थ विपस्सना में चेतना के उच्च स्तर की ओर आगे बढ़ते हैं। अनापना सति में भी प्रत्याहार ही प्रयुक्त है, महाप्रज्ञ द्वारा प्रवर्तित प्रेक्षा ध्यान भी इसी तरह मानसिक विकलता को कम करता है। मन का अनुबंध बदला जाता है या कहें डी कंडीशनिंग की जाती है और पूर्व की आदत के विरुद्ध होती है। प्रत्याहार में ज्ञानेन्द्रियां बुद्धि द्वारा अनुशासित होती हैं।

प्रत्याहार से ऊर्जा की बचत होती है। दुहराने की लालसा कम होती है। प्रत्याहार शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक और आध्यामिक सभी स्तरों पर होता है। कर्मेंद्रियों और ज्ञानेंद्रियों से ऊर्जा को खीचना शारीरिक या भौतिक प्रत्याहार है। मस्तिष्क की क्रियाओं को शांत करना मानसिक प्रत्याहार हुआ। बुद्धि को मस्तिष्क की ओर ले जाना बौद्धिक प्रत्याहार है, बुद्धि और चेतना को चित्शक्ति की ओर ले जाना आध्यात्मिक प्रत्याहार है। मनोरोगों के उपचार के लिए विपासना ( विशेष रूप से देखना), शवासन, योगनिद्रा , अंतर्मौन, अंतर्दर्शन आदि का उपयोग किया जा रहा है। इन सबका उद्देश्य इंद्रियों पर नियंत्रण स्थापित करना होता है। इसके लिए उद्दीपन से अलगाव की जरूरत पड़ती है। इससे जीवन के तनावों से बचाव होता है और शांति मिलती है। उपनिषदों, योग सूत्र, जैन और बौद्ध सभी परम्पराओं में योग का आन्तरिक भाग प्रत्याहार से शुरू होता है। यहीं से बहिरंग योग से अंतरंग योग की ओर मुड़ते हैं। इस तरह प्रत्याहार एक सेतु का कार्य करता है। प्रत्याहार में अंतर्मन की खोज और सूक्ष्म विचारों की भावना शुरू होती है और ऐंद्रिक उन्मुखता को अंदर की ओर दिशा दी जाती है। अंतर्दर्शन में आंतरिक विमर्श का उपयोग करते हुए आंतरिक क्रियाओं को समझना और नियमित किया जाता है। दूसरे शब्दों में प्रत्याहार द्वारा सांवेदिक नियंत्रण से आत्म-नियंत्रण की ओर आगे बढ़ते हैं। इससे शरीर, प्राण और मन को विश्राम मिलता है और चैतन्ययुक्त व्यवहार से सुख और शांति प्राप्त होती है।



 
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