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जो घाटे में रहा उसी पर ठीकरा

09/06/2019

डॉ. दिलीप अग्निहोत्री
पा और बसपा का गठबंधन एक सुखद परिकल्पना पर आधारित था। इसमें माना गया था कि लोकसभा चुनाव में किसी को बहुमत नहीं मिलेगा। सीटों के हिसाब से सपा-बसपा गठबंधन सबसे आगे होगा। इस आधार पर मायावती को प्रधानमंत्री बनाने में अखिलेश यादव सहयोग करेंगे। फिर इस गठबंधन का संयुक्त नारा होगा कि 'दिल्ली तो हमारी है, अब लखनऊ की बारी है'। मतलब 2022 में अखिलेश को मुख्यमंत्री बनाने में मायावती सहयोग करेंगी। लेकिन परिणाम आये तो यह सपना बिखर गया। ऐसे में मायावती को हिसाब बराबर करना ही था। उन्होंने अभी से 2022 की राह में कांटे बिछा दिए। उनका बयान सपा के लिए कांटों की तरह चुभने वाला है। गठबंधन की विफलता पर आत्मचिंतन की आवश्यकता सपा को अधिक थी। उसे ही गठबंधन का घाटा उठाना पड़ा था। लेकिन वह किसी निर्णय पर पहुंचती, उसके पहले ही मायावती ने नाकामी का ठीकरा सपा पर फोड़ दिया। सपा इसे किस रूप में लेगी, यह भविष्य में पता चलेगा। लेकिन मायावती का प्रत्येक वाक्य सपा पर बड़े प्रहार से कम नहीं है। उन्होंने सपा को पांच सीट तक सिमटने पर बोलने का मौका ही नहीं दिया। उल्टे स्वयं शून्य से दस तक के जीवनदान में उसके योगदान को भी नकार दिया। मायावती के अनुसार सपा का यादव वोट भी उनके साथ नहीं रहा। मुस्लिम वोट बसपा को मिला, इस कारण उसे दस सीट मिली। मतलब सपा से उसका ही वोट बैंक दूर जा चुका है और मायावती ने अपनी दम पर दस सीट हासिल की है। मायावती यहीं तक नहीं रुकीं। उन्होंने जान-बूझकर यह कहा कि अखिलेश और डिम्पल यादव उनका बहुत सम्मान करते हैं, उन्हें अपना आदर्श मानते हैं। यह कथन भी सपा समर्थकों को नाराज करने वाला है। इसके बाद उन्होंने अखिलेश को एक प्रकार से टास्क दिया है। कहा कि वह मिशनरी की तरह कार्य करें, गठबंधन के उपयुक्त अपने को साबित करें। यह शर्त पूरी करने के बाद सपा से फिर गठबंधन हो सकेगा। मतलब मायावती के हिसाब से अखिलेश को शर्तें पूरी करनी होगी। कितनी पूरी हुई, यह मायावती तय करेंगी। इसके बाद भी गठबंधन दोबारा टूटेगा नहीं, इसकी कोई गारंटी नहीं है। मायावती ने एक ही बैठक में गठबंधन की पूरी समीक्षा कर ली और उसके निष्कर्ष भी सार्वजनिक कर दिए। मायावती के अनुसार जब यादव बाहुल्य सीटों पर भी यादव समाज का वोट सपा को नहीं मिला। उसका आधार वोट बैंक उससे छिटक गया है, तो फिर उनका वोट बसपा को कैसे गया होगा। ठीकरा फोड़ने की पराकाष्ठा यह कि सपा ने अच्छा मौका गंवा दिया है। इसके बाद मायावती ने नसीहत भी दी। कहा कि सपा को सुधार लाने की जरूरत है। भाजपा के खिलाफ मजबूती से लड़ने की जरूरत है। मतलब सपा ऐसा करने में विफल रही है। यदि वह इस काम में सफल नहीं हो पाते हैं तो हमारा अकेले चलना ही बेहतर होगा। बसपा की ऐसी चुभने वाली टिप्पणी के बाद भी अखिलेश यादव का जवाब दो टूक नहीं रहा। उन्होंने कहा है कि अगर उपचुनाव में गठबंधन साथ नहीं होता है तो फिर समाजवादी पार्टी भी चुनाव के लिए तैयारी करेगी। मतलब इसके बाद भी उन्होंने उम्मीद नहीं छोड़ी है।
अगर रास्ते अलग-अलग हैं तो उसका भी स्वागत है। सपा की कमान संभाले अखिलेश यादव को अभी करीब चार वर्ष हुए हैं। इस अवधि में उन्होंने अकेले चलने का हौसला प्रदर्शित नहीं किया। चार वर्ष में उन्होंने दो पार्टियों से गठबंधन किये। दोनों से उनको निराशा ही मिली। इसके पहले अखिलेश पर अपने पिता और चाचा पर निर्भर रहने का आरोप लगता था। बाद में उन्होंने कांग्रेस और बसपा पर विश्वास किया। विधानसभा चुनाव में उन्होंने कांग्रेस से और लोकसभा चुनाव में बसपा से गठबंधन किया था। सपा के संस्थापक इन दोनों ही निर्णयों से असहमत बताए जा रहे थे। उनका आकलन दोनों बार सही साबित हुआ। मुलायम सिंह का कहना था कि कांग्रेस से समझौता सपा को नुकसान पहुंचाएगा। वही हुआ। वह गठबंधन किसी सिद्धांत पर आधारित नहीं था। उस समय भी कांग्रेस की जनाधार और संगठन के स्तर पर दयनीय दशा थी। इसके अलावा विधानसभा चुनाव के पहले कांग्रेस ‘27 साल यूपी बेहाल’ अभियान चला रही थी। इसका नेतृत्व राहुल गांधी कर रहे थे। इन 27 वर्षों में सपा ने ही सर्वाधिक समय तक शासन किया था। मतलब कांग्रेस के अभियान के हिसाब से सपा सबसे अधिक गुनाहगार थी। तब अखिलेश यादव ने नारा दिया था कि ‘काम बोलता है’। इस नारे के हिसाब से उन्हें अकेले ही चुनाव में उतरना चाहिए था। इससे यह सन्देश जाता कि उन्हें अपनी सरकार की उपलब्धियों के प्रति आत्मविश्वास है। लेकिन जिस क्षण उन्होंने कांग्रेस से समझौता किया, उसी समय आत्मविश्वास के कमजोर होने का सन्देश प्रसारित हो गया। इस प्रकार अखिलेश द्वारा किया गया गठबंधन का पहला प्रयोग शर्मनाक ढंग से विफल हुआ। यह माना गया कि वह इससे सबक लेंगे। भविष्य में आसानी से गठबंधन नहीं करेंगे। लेकिन अखिलेश ने एक बार फिर गठबंधन को आजमाने का निर्णय लिया। फर्क यह था कि इस बार कांग्रेस से बैर हो गया और बसपा से दोस्ती हो गई। यह कांग्रेस के मुकाबले कहीं ज्यादा सिद्धांतविहीन गठबंधन था। गेस्ट हाउस कांड के बाद सपा और बसपा की दुश्मनी ही चर्चा में रहती थी। एक-दूसरे के प्रति मर्यादा लांघ कर आरोप लगाने में भी किसी को संकोच नहीं था। सामान्य शिष्टाचार और बातचीत तो बहुत दूर की बात थी। मुलायम सिंह से विरासत में मिली यह राजनीतिक रंजिश अखिलेश ने भी संभाले रखी। इसी में दोनों का फायदा था। एक-दूसरे को कोस कर सत्ता की अदला-बदली होती रही। अखिलेश ने मायावती को जब भी बुआ कहा, उसमें व्यंग्य और तंज ही रहता था। विधानसभा चुनाव में अखिलेश अपनी प्रत्येक जनसभा में कहते थे कि पत्थर वाली बुआ से सावधान रहना, ये भाजपा के साथ चली जाएगी। इसी प्रकार मायावती ने बबुआ शब्द का सदैव नकारात्मक प्रयोग ही किया। डेढ़ दशक की इस अदावत को रिश्ते में बदलना असंभव था। ऊपर तो दोस्ती हो गई। संयुक्त जनसभा होने लगी। एक-दूसरे में अच्छाई दिखने लगी, लेकिन जमीन पर यह सब आसान नहीं था।
अब तो ऐसा लगता है कि मायावती सपा की बेअदबी कभी भूली ही नहीं थीं। उन्होंने सपा को नीचा दिखाने की रणनीति बना ली थी। इस चक्रव्यूह में सपा फंसती चली गई। इस रणनीति का परिणाम यह रहा कि सपा धोखे में रह गई। जहां थी, वहां से आगे नहीं बढ़ सकी। गोरखपुर और फूलपुर उपचुनाव जीतने का जोश ठंडा भी नहीं पड़ा था, ये दोनों सीट भी निकल गईं। पहली बार सैफई परिवार के तीन लोग पराजित हुए। अखिलेश अपनी पत्नी को भी जीता नहीं सके।
अब अखिलेश के पास गठबंधन छोड़ने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। गठबंधन से बसपा को जीवनदान मिल गया। सपा कराहती ही रह गई। एक बार फिर अखिलेश अवसर चूक गए। वह बसपा के खिलाफ मुंह खोलने से बचते रहे। मायावती ने एक बार फिर बाजी मार ली। उन्होंने गठबंधन की विफलता का पूरा ठीकरा सपा पर फोड़ दिया। सच्चाई यह है कि बसपा का आधार वोट सपा से दूर रहा। यह बेमेल गठबंधन बसपा के लिए वरदान साबित हुआ। लोकसभा में वह शून्य से दस पर पहुंच गई। कई क्षेत्रों में सपा का वोट बसपा को मिला। इसके विपरीत गठबंधन का खामियाजा सपा को भुगतना पड़ा। पिछली लोकसभा में उसके पांच सदस्य थे। इस बार भी पांच ही रह गए। इसका मतलब है कि बसपा का वोट सपा में ट्रांसफर नहीं हुआ। कन्नौज में बसपा समर्थकों ने सपा का सहयोग किया होता, तो शायद डिम्पल यादव पराजित नहीं होतीं। गठबंधन के समय दावा तो यही किया गया था। इन पार्टियों के शीर्ष नेता बहुत उत्साहित थे। जाति मजहब के आंकड़ों के आधार पर वह भाजपा के सफाये का दावा कर रहे थे। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। राष्ट्रीय लोकदल तो कहीं का नहीं रहा। जाहिर है कि गठबंधन का पूरा लाभ बसपा को हुआ। अन्य दोनों पार्टियों को नुकसान उठाना पड़ा है। यह नुकसान केवल सीट तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सिद्धांतों तक विस्तृत है।
ऐसा लग रहा था जैसे समझौते के लिए बसपा बिल्कुल भी उत्साहित नहीं है। बसपा प्रमुख ने साफ कहा था कि राजनीति में न वह किसी की बुआ हैं, न कोई उनका भतीजा है। यदि उनकी पार्टी को सम्मानजनक सीट मिलेगी तभी वह समझौता करेंगी। बसपा प्रमुख का यह कथन सुनियोजित रणनीति का हिस्सा था। दलीय स्थिति में पीछे होने के बाबजूद वह गठबंधन की कमान अपने नियंत्रण में रखना चाहती थीं। वह सपा प्रमुख से मिलने एक बार भी नहीं गईं, वार्ता के लिए उन्होंने कई बार अखिलेश को बुलाया था। बताया जाता है कि सपा प्रमुख कांग्रेस को भी गठबंधन में शामिल करना चाहते थे, लेकिन बसपा इसके खिलाफ थी। अंततः कांग्रेस को शामिल नहीं किया गया। सपा और बसपा ने अपना वजूद बनाने के लिए गठबंधन किया था। इनके पास भविष्य की कोई योजना नहीं थी। विकास की चर्चा नहीं होती थी। शिखर पर तो दोनों पार्टियों की दोस्ती हो गई, लेकिन जमीन पर ऐसा खुशनुमा माहौल नहीं बन सका। नतीजा सामने है।
(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)  


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