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अबकी बार, फिर सरकार

13/11/2019

अबकी बार, फिर सरकार

अवधेश कुमार

हरियाणा व महाराष्ट्र चुनाव के नतीजे आ चुके हैं। इसे लेकर हर किसी की अपनी अलग-अलग व्याख्या है। हालांकि भले ही भाजपा की कुछ सीटें कम हुई हैं लेकिन सच तो यह है कि जनादेश उसी के पक्ष में है। वोट प्रतिशत में इजाफा इसकी तस्दीक कर रहा है। मंत्रियों की हार व भाजपा की सीटें घटने तथा कांग्रेस, राकांपा और जेजेपी के उभार के पीछे की वजहों की तलाश करती इस बार की आवरण कथा।

इस तरह के चुनाव परिणामों में हर दृष्टिकोण से अपने अनुकूल विश्लेषण की संभावना मौजूद रहती है। महाराष्ट्र में हालांकि भाजपा और शिवसेना ने बहुमत पा लिया लेकिन उनकी सीटें घट गईं। भाजपा 122 की जगह 105, शिवसेना 63 की जगह 56 तक पर आ गई। दूसरी ओर राकांपा 41 से 54 तथा कांग्रेस 42 से 44 पर पहुंच गई। हरियाणा में भाजपा सबसे बड़ा दल अवश्य बनी, पर वह बहुमत से छ: सीटें दूर रह गयी। उसकी सीटें 47 से घटकर 40 रह गई। कांग्रेस की सीटें 15 से 31 हुई। यानी कांग्रेस को 16 सीटों का फायदा हुआ। दुष्यंत चौटाला की जननायक जनता पार्टी (जेजेपी) ने अपने पहले विधानसभा चुनाव में ही 10 सीटें हासिल कीं। वहीं, इनेलो 19 से एक पर आ गई। इस चुनाव में हरियाणा भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष सुभाष बराला चुनाव हार गए।


साथ ही मनोहर लाल खट्टर मंत्रिमंडल के 7 मंत्रियों को पराजय का मुंह देखना पड़ा। स्वास्थ्य मंत्री अनिल विज और बनवारी लाल को छोड़कर खट्टर सरकार के सभी मंत्री चुनाव हार गए हैं। महाराष्ट्र में भी देंवेंद्र फडणवीस मंत्रिमंडल के 7 मंत्रियों को हार मिली है। हालांकि हरियाणा में भी भाजपा की सरकार बनना निश्चित है, लेकिन सीटें घटने के कारण परिणाम को उसकी पराजय या भाजपा की विजय रथ रोके जाने के रूप में विश्लेषित किया जा रहा है। भारत जैसे देश के राजनीतिक चरित्र में ऐसी जय और पराजय या इसके बीच अटक जाने के जनादेश के अतिवादी विश्लेषण का खतरा बना रहता है। यही इस बार भी हो रहा है। इसे भाजपा के राष्ट्रवाद से लेकर हिन्दुत्व, जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने आदि न जाने किस किस के खिलाफ बताया जा रहा है।
इसमें तो दो राय नहीं कि भाजपा ने दोनों राज्यों के लिए जो लक्ष्य निर्धारित किया था उसकी दृष्टि से परिणाम निराशाजनक है। किंतु हरियाणा में कांग्रेस या जेजेपी या फिर महाराष्ट्र में कांग्रेसराकांपा उससे आगे निकल गई होती तो उसके लिए प्रसन्नता का विषय होता। ऐसा तो हुआ नही। फिर कांग्रेस इस परिणाम को अपने पक्ष में क्यों बता रही है? मूल्यांकन का एक आधार प्राप्त मत होता है। अगर 2014 के विधानसभा चुनावों से तुलना करें तो हरियाणा में भाजपा को तीन प्रतिशत ज्यादा वोट मिले हैं।
2014 में भाजपा को 33.2 प्रतिशत वोट मिले थे, जबकि इस बार उसे 36.44 प्रतिशत से ज्यादा वोट मिले हैं। 2014 की तुलना में कांग्रेस को अवश्य आठ प्रतिशत वोट का फायदा हुआ। 2014 विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को 20.6 प्रतिशत वोट मिले थे जबकि इस बार उसें 28.42 प्रतिशत मिले हैं। सबसे बड़ा नुकसान इनेलो को हुआ है। 2014 के विधानसभा चुनाव में इनेलो को 24.1 प्रतिशत वोट मिले थे। इस बार उसे सिर्फ 2.45 प्रतिशत वोट मिले हैं। इससे अलग होकर बनी दुष्यंत चौटाला की जननायक जनता पार्टी को 18 प्रतिशत वोट मिले हैं। इसका अर्थ साफ है कि कांग्रेस और जजपा दोनों ने मुख्यत: इनेलो के वोट को खाया।
हां, लोकसभा चुनाव से तुलना करें तो भाजपा का मत 58.02 प्रतिशत से काफी कम हैं। कांग्रेस को लोकसभा चुनावों में 28.42 प्रतिशत वोट मिले थे। इस तरह उसका वोट कायम रहा। किंतु विधानसभा चुनाव की लोकसभा से तुलना करनी चाहिए या नहीं यह आप विचार करिए। महाराष्ट्र में भाजपा को पिछले विधानसभा चुनाव में 27.81 प्रतिशत तथा शिवसेना को 19.35 प्रतिशत मत मिले थे। इस बार इन्हें क्रमश: 25.34 प्रतिशत और 16.97 प्रतिशत मिले हैं। किंतु मत भूलिए कि दोनों पिछली बार अलगअलग थे एवं इस कारण ज्यादा सीटों पर लड़े थे। मसलन, तब भाजपा 260 सीटों पर लड़ी थी जबकि इस बार 150 पर। इसमें मत तो घटना ही है।
लोकसभा चुनाव में भाजपा को 27.59 एवं शिवसेना को 23.29 प्रतिशत मत मिले थे। 2014 विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को 17.95 प्रतिशत तथा राकांपा को 17.24 प्रतिशत मत मिला था, जबकि इस बार उन्हें क्रमश: 15.78 प्रतिशत तथा राकांपा को 16.70 प्रतिशत मत मिला है। इस तरह इनके मत भी घटे हैं। अब अगर इसका संक्षेप में विश्लेषण करें तो तस्वीर ज्यादा साफ हो जाएगी। कांग्रेस को हरियाणा के विशेष क्षेत्र में, जिसे जाट लैंड कहते हैं बड़ी बढ़त मिल गई है।
उसी तरह महाराष्ट्र में पश्चिमी महाराष्ट्र में राकांपा की सीटें 19 से बढ़कर 27 हो गई है। कांग्रेस की भी 10 से 12 हो गई। इसके विपरीत भाजपा की 26 से 20 तथा शिवसेना की 14 से घटकर पांच हो गई। उत्तर महाराष्ट्र में भी राकांपा की सीटे सात से 12 हो गई। विदर्भ में भाजपा को 44 से 29, राकांपा की एक से छ: तथा कांग्रेस की 10 से 15 हो गई। इस तरह पश्चिमी महाराष्ट्र और विदर्भ दो क्षेत्र राकांपा-कांग्रेस के पक्ष में गए हैं। इसके विपरीत भाजपा को पूरे महाराष्ट्र से सीटें मिलीं हैं। चुनाव में सारे तथ्य आंकड़ों से ही निकलते हैं। इसे आप यह बता दीजिए कि भाजपा के राष्ट्रवादी और हिन्दुत्व तेवर को लोगों ने नकार दिया, सावरकर को भारत रत्न देने की घोषणा भी गले नहीं उतरी, किसानों में भाजपा के खिलाफ असंतोष था, मजदूर वर्ग खासकर औद्योगिक कर्मचारी वर्ग भाजपा को हराना चाहता था …तो इसे अतिवाद के सिवा कुछ नहीं कहा जा सकता।
आप हरियाणा में देखेंगे तो पिछली बार 17 शहरी सीटें भाजपा ने जीती थी जो इस बार बरकरार है। तो शहरों में उद्योग एवं कारोबार के कर्मी कैसे विरोध में हुए? महाराष्ट्र के मुंबई में भाजपा पिछली बार से एक सीट ज्यादा जीती है। उत्तरी हरियाणा में भाजपा ने भारी जीत प्राप्त की है लेकिन जिसे जाट लैंड कहते हैं वहां की मोटामोटी 35 में से केवल सात सीटें भाजपा ने जीती। भाजपा के सभी प्रमुख जाट नेता चुनाव हार गए। ग्रामीण क्षेत्र में भी भाजपा पिछली बार की तुलना में केवल 4 सीटें हारी है। महाराष्ट्र में पश्चिमी महाराष्ट्र एवं उत्तर विदर्भ में भाजपा ग्रामीण सीटें हारीं हैं। तो यह हुआ कैसे? जिन लोगों ने चुनाव पर काम किया है उन्हें इसका उत्तर पता है। हरियाणा एवं महाराष्ट्र दोनों में भाजपा के मंत्रियों, अनेक विधायकों एवं नेताओं के खिलाफ पार्टी के अंदर असंतोष था। हरियाणा में यह ज्यादा था। महाराष्ट्र में भाजपा का बड़ा वर्ग शिवसेना से गठबंधन का विरोधी था।
गठबंधन से वे नाराज हो गए। दोनों राज्यों में पार्टी के आम कार्यकर्ता और स्थानीय पदाधिकारी अनेक क्षेत्रों में टिकट बंटवारे से भी नाराज हुए। महाराष्ट्र में 52 तथा हरियाणा में 16 बड़े और प्रभावी विद्रोही उम्मीदवार खड़े थे। महाराष्ट्र में इनमें से जीते तो 10-11 ही लेकिन भाजपा और शिवसेना को नुकसान खूब पहुंचाया। इसका लाभ राकांपा एवं कांग्रेस को मिला। आप पश्चिमी महाराष्ट्र एवं विदर्भ के चुनाव परिणाम देखेंगे तो यह ज्यादा स्पष्ट हो जाएगा। हरियाणा में इनमें से छ: जीते एवं अन्य जगहों पर भाजपा को नुकसान पहुंचाया। दोनों राज्यों में भाजपा के कार्यकर्ता तथा स्थानीय पदाधिकारी अनेक जगह उदासीन होकर बैठ गए।
हरियाणा में मतदान प्रतिशत में आठ प्रतिशत गिरावट का यह बड़ा कारण था। इस तरह कार्यकतार्ओं की नाराजगी एवं विद्रोहियों का मैदान में उतरना भाजपा के बड़े लक्ष्य के सपने को चकनाचूर करने वाला साबित हुआ है। विद्रोही केवल निर्दलीय ही खड़े नहीं थे, दूसरी पार्टियों के भी उम्मीदवार बने थे। जजपा के पास अपने उम्मीदवारों की कमी थी। भाजपा से टिकट न पाने वाले अनेक को जजपा ने अपना उम्मीदवार बना दिया। यह भी भाजपा के खिलाफ गया। जजपा के चार विधायक तो पूर्व भाजपाई ही हैं। दूसरी ओर हरियाणा में जाटो के अंदर यह भाव पैदा हुआ कि मनोहर लाल खट्टर सरकार में उनका वैसा प्रभाव नहीं है जैसा पहले होता था।
जाट नेताओं ने इसका प्रचार करना आरंभ किया। भूपेन्द्र सिंह हुड्डा ने अपना अंतिम चुनाव कहकर भावुक अपील की। 30 सीटों पर जाट जिसे चाहे विजयी बना सकते हैं। इसके अलावा 20 सीटों पर भी उनका प्रभाव है। इनेलो प्रभावी रूप में उपलब्ध नहीं थी और जजपा नई पार्टी थी। इसका लाभ कांग्रेस को मिल गया। महाराष्ट्र में भी शरद पवार ने अपनी पूरी ताकत लगा दी। भाजपा शिवसेना की रणनीति में कमजोरी के कारण उनकी अपील का असर हुआ। ईडी द्वारा उनको नोटिस दिया जाना सही हो सकता है, लेकिन पवार ने इसका रणनीतिक उपयोग किया और उनके समर्थकों में इसका संदेश वही गया जो वे देना चाहते थे।

महाराष्ट्र में 52 तथा हरियाणा में 16 बड़े नेता बागी उम्मीदवार थे। इनमें से जीते तो 10-11 ही लेकिन भाजपा और शिवसेना को नुकसान खूब पहुंचाया। इसका लाभ राकांपा एवं कांग्रेस को मिला। यही हाल हरियाणा में भी रहा।

बड़बोले शिवसेना नेताओं ने इसका विरोध करके इस आशंका को पुख्ता करने में भूमिका निभाई कि सरकार पवार को बदनाम करना चाहती है। जब साझेदार ही उल्टा बयान दे रहा हो तो भाजपा के लिए समाधानपरक जवाब देना कठिन हो गया। तो जीत-हार के कारणों को खींचतान कर जितना बड़ा बना दिया जाए उससे धरातली सच नहीं बदलता। हां, भाजपा के लिए यह आत्मनिरीक्षण करने का समय अवश्य है। आखिर उसके मंत्रियों, विधायकों के खिलाफ पार्टी के अंदर ही इतना रोष क्यों था? उम्मीदवारों के खिलाफ विद्रोह क्यों हो गया? लोकसभा चुनाव में जो कार्यकर्ता और समर्थक तन-मन-धन लगाकर काम कर रहे थे वे उदासीन क्यों हो गए? अनुच्छेद 370 जैसा ऐतिहासिक कदम जिसे पूरे देश का समर्थन है वह वोट दिलाने में उतनी बड़ी भूमिका क्यों नहीं निभा सका जितनी निभा सकता था?
अयोध्या विवाद के अनुकूल समाधान की व्यक्त की जा रही संभावनायें क्यों नहीं प्रभावी हुईं? निश्चय ही भाजपा सरकारों के आचार-विचार पर गंभीर प्रश्न खड़े हुए हैं। हर राज्य में इस तरह का असंतोष अपने घर में ही है और इसका असर तो चुनाव पर पड़ना ही है। नरेन्द्र मोदी और अमित शाह भारतीय मतदाताओं की सोच को जाति, क्षेत्र से बाहर निकालकर राष्ट्रीय आयाम देने में जिस सीमा तक सफल हुए हैं अगर उनकी राज्य सरकारें इनको अपने यहां सशक्त नहीं करेंगी तो मतदान जाति और क्षेत्र की ओर खींच सकता है। इन चुनावों ने यही प्रमाणित किया है। किंतु यह विपक्ष के लिए उसकी वर्तमान अवस्था में किसी बडी उम्मीद का कारण नहीं हो सकता। अगर कोई ऐसा सोचता है तो यह अतिवादी विश्लेषण है।


 
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