युगवार्ता

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आग के ढेर पर डेढ़ लाख छात्र

30/10/2019

आग के ढेर पर डेढ़ लाख छात्र

विजय माथुर

होस्टलों में रहकर कोचिंग करने वाले डेढ़ लाख छात्रों का जीवन खतरे में है। सवाल है कि प्रशासन इस ओर से आंखें क्यों मूंदे हुए है।

अक्टूबर की शुरुआत में कोटा के एक प्रमुख समाजसेवी रामहेत दुबे ने निकाय प्रशासन को सचेत किया था कि जिस तरह होस्टल नियम-कायदों को ठेंगा दिखा रहे हैं, उससे किसी दिन यह हजारों छात्रों की कब्रगाह बन जाएंगे। लेकिन अफसरों का जवाब सुनकर वह सन्न रह गए कि उन्होंने होस्टलों के सुरक्षा उपायों को हर तरह जांच-परख लिया है। उनमें कोई खोट नहीं है। यह अफसरों का अतिआत्मविश्वास से उपजा जवाब था। शायद उन्हें किसी भी अनहोनी का अंदेशा नहीं था। अफसरों ने जिस तरह तबाही के अंदेशों को तवज्जो नहीं दी।
वो जिम्मेदारी को खारिज करने वाला था। आखिर 5 अक्टूबर को अनहोनी होकर रही। बोरखेड़ा इलाके का नया नोहरा स्थित 6 मंजिला महाकाल रेजीडेंसी होस्टल सुबह 6.30 बजे उस वक्त भभक उठा जबकि छात्र अभी नींद में गाफिल थे। 90 से ज्यादा रिहायशी क्षमता वाले इस होस्टल में जिस समय आग लगी उस वक्त वहां 45 छात्र मौजूद थे। आग की ऊंची लपटें तेजी से कमरों की तरफ बढ़ रही थी। पूरा होस्टल धुंए की घुटन में घिर गया था। हड़कंप इस कदर मचा कि कई छात्र तो जान बचाने के लिए ऊपरी मंजिलों से ही कूद गए। जान बचाने की खातिर कूद फांदकर चोटिल हुए छात्रों की आपबीती हतप्रभ करने वाली थी।
जैसे-तैसे अपना बचाव करने वाले छात्र रणवीर सिंह का कहना था, जब वह नीचे उतर रहा था रेलिंग पूरी तरह गर्म थी। रेलिंग से हाथ छूते ही झुलस गया। नीचे देखा तो सोफा आग की लपटों से अटा हुआ था। चारों तरफ फैली आग की लपटों और धुएं से आंखे बंद हो रही थी। दम घुट रहा था। मैंने जान बचाने की खातिर बालकनी से कूदना ही बेहतर समझा। उल्लेखनीय है कि होस्टल कुछ महीने पहले ही शुरू हुआ था। हादसे से दो दिन पहले ही उसमें लिμट लगी थी। आग शार्ट सर्किट के कारण लगी थी। हद तो यह कि होस्टल संचालकों ने फायर का अनापत्ति प्रमाण पत्र तक नहीं ले रखा था। यहां तक कि अग्नि शमन उपकरण भी नहीं थे। कोचिंग विद्यार्थियों को रिहायश के लिए होस्टलों को 20 हजार रुपये तक का किराया देना पड़ता है। फिर भी असुरक्षा का इतना बड़ा खतरा।
इसे होस्टल संचालकों की लूट-खसोट नहीं तो क्या कहा जाए। अग्नि कांड की जांच रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि होस्टल का निर्माण दो भूखंडों को जोड़कर किया गया था। इसकी वैधानिक स्वीकृति लेना तो दरकिनार होस्टल निर्माण भी बिना स्वीकृति के कर लिया गया। बदहाली की इससे बड़ी मिसाल क्या होगी कि डॉक्टर-इंजीनियर बनने का सपना संजोकर कोटा आने वाले डेढ़ लाख छात्र भगवान भरोसे ही जिन्दगी गुजार रहे हैं । कोटा में लगभग 32 हजार होस्टल है। इनमें केवल 675 ही पंजीकृत है। ताज्जुब है कि भारी संख्या में अवैध होस्टल चल रहे हैं।
लेकिन जिला प्रशासन बेखबर है। एडमिशन के समय कोचिंग संस्थान छात्रों को इतना तो बताते हैं कि कौन सा होस्टल अच्छा है और कहां रहना बेहतर होगा। लेकिन नियमों की अवहेलना करने वाले होस्टलों की बाबत उन्हें बिल्कुल आगाह नहीं किया जाता। कोचिंग संस्थान आखिर ऐसे होस्टलों की सूची चस्पा क्यों नहीं करते ताकि छात्र इस संबंध में सावधानी बरत सकें। लोगों का कहना है कि इस तरह के हादसों के पीछे संबंधित एजेंसियों का अपनी जिम्मेदारी के प्रति कोताही बरतना है।
अग्निशमन उपकरणों को लेकर अनापत्ति प्रमाणपत्र देना और निर्माण की स्वीकृति देना नगर निगम की जिम्मेदारी है। अगर नियम विरुद्ध होस्टल चल रहे हैं तो नगर विकास न्यास की जिम्मेदारी बनती है। लेकिन क्यों वे आंख बंद कर लेते हैं। छात्रों की सुरक्षा के सवाल पर बड़ी जिम्मेदारी पुलिस की बनती है। लेकिन पुलिस ने होस्टलों के सुरक्षा बंदोबस्त की कभी जांच की हो सवाल ही नहीं उठता। जिला प्रशासन ने कोई तीन साल पहले होस्टलों के लिए गाइड लाइन बनाई थी। लेकिन उनकी पालना हो रही है या नहीं देखा तक नहीं। सवाल है कि प्रशासन को जागने के लिए कितने अग्निकांड चाहिए।



 
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