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शिक्षा तंत्र की जड़ता तोड़ने की जरूरत

19/05/2020

गिरीश्वर मिश्र
इस देश में ज्ञान को पवित्र और सभी तरह के क्लेशों से छुटकारा दिलाने वाला कहा गया था। इस उद्देश्य से शिक्षा व्यवस्था को स्वायत्त रखते हुए उसे अपनी व्यवस्था खुद करने का प्रावधान किया गया था। शासन की भूमिका इस व्यवस्था को संचालित करने के लिए संसाधन जुटाने तक सीमित थी। विश्वविद्यालयों की साधारण सभा या कोर्ट अपने कुलपति का चयन करती थी और उसे अपने निर्णय लेने और लागू करने की पूरी छूट होती थी। ऐसे में संस्था स्वत: अपनी शक्ति और सीमाओं का आकलन करते हुए विकसित होती थी।
इसकी अनोखी मिसाल के रूप में हम पाते हैं कि एक गहरे अपनत्व के साथ अंग्रेजी राज की चुनौतियों के बीच में महामना पंडित मदनमोहन मालवीय 1916 में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय जैसे समग्र विश्वविद्यालय को आकार दे सके और विभिन्न विषयों में अपने समय के श्रेष्ठ और समर्पित विद्वानों को एक परिसर में ला सके। अकादमिक सर्जनात्मकता का अवसर उपलब्ध कराते हुए उन्होंने परम्परागत ज्ञान के साथ समकालीन विज्ञान और प्रौद्यौगिकी को आदरपूर्वक प्रोत्साहित किया। और तो और यह सारी परियोजना जन सहयोग से पूरी की गई, जिसमें समाज के उच्च, मध्य और निम्न सभी वर्गों की भागीदारी थी। यह असाधारण परियोजना एक सामान्य और साधारण वित्त वाले व्यक्ति के तप, त्याग और निष्ठा का सुफल थी, जिसने सबको जोड़ा और एक 'सर्व विद्या की राजधानी' का निर्माण किया। आज के दौर में विश्वस्तरीय विश्वविद्यालय की दौड़ में शामिल होने के लिए प्रयास हो रहा है पर उन पैमानों पर हम खरे नहीं उतर पा रहे हैं। अभी भी भारत के प्रतिभाशाली और मेधावी छात्र विदेश की ओर आकर्षित हो रहे हैं।
स्वतंत्र भारत में शिक्षा की बागडोर कसती गई और शैक्षिक स्वायत्तता का यह माडल धीरे-धीरे शिक्षा के सरकारीकरण और बाजारीकरण के साथ कमजोर पड़ कर ध्वस्त होता गया। विश्वविद्यालय का कुलपति सरकारी दूत और सरकारी नीति को कार्यान्वयन करने वाला सरकार द्वारा नियुक्त एक अधिकारी हो गया, जिसे नैतिक-अनैतिक किस्म की राजनैतिक महत्वाकांक्षाओं से उपजती दखलंदाजी और नौकरशाही के दबावों के बीच नाव खेनी होती है। वर्तमान स्थिति यही है कि प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप में नियंत्रण स्थापित करने के लिए विविध प्रकार की युक्तियों का उपयोग करने से शैक्षिक संस्थानों की अकादमिक संस्कृति सभी जगह विषाक्त होने लगी है। सरकारी सहायता और सुविधा का लाभ आवश्यकता और पात्रता की जगह गैर-अकादमिक सरोकारों के मद्देनजर पहुंचने से संस्थाओं में असन्तोष पैदा होने लगते हैं। साथ ही लोग अपना कार्य छोड़ छिद्रान्वेषण और पर निन्दा कर व्यवस्था से अनुचित लाभ पाने के प्रयास में लगे रहते हैं। इसमें सत्तारूढ़ होने की अभिलाषा जुड़ जाने पर पूरा परिवेश ही कुरुक्षेत्र बनने लगता है। तब ज्ञान की राह में उत्कृष्टता की जगह समझौते होने लगते हैं। कुपात्र और अनधिकारी लोगों को भी आगे बढ़ने का मौका मिलने लगता है। इसके चलते वैमनस्य और क्षोभ आम बात होती जा रही है। तब लोग तटस्थ और उदासीन होकर संस्थाओं को अपना श्रेष्ठ न देकर सिर्फ कार्य की खानापूरी करने लगते हैं। ऐसे में तनाव, उठा-पटक, संघर्ष और हिंसा की घटनाएं भी बढ़ने लगी हैं।
अकादमिक दृष्टि से आगे बढ़ने और समाज तथा उद्योग-धन्धों के लिए प्रासंगिक बने रहने के लिए शिक्षा में संदर्भ के प्रति संवेदनशीलता गतिशील ढंग पुनर्नवीकृत करते रहना जरूरी है। इसके लिए पाठ्यक्रम और शिक्षण की प्रक्रियाओं में नवाचार और मौलिकता के लिए जगह होनी चाहिए। इसे संभव बनाने के लिए संसाधनों का निवेश और शैक्षिक प्रक्रियाओं का सुचारू रूप से संचालन आवश्यक है। पिछले कई दशकों से हो रही निरंतर उपेक्षा के कारण किस तरह की विसंगति की स्थिति पैदा हुई है इसका अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि जहां प्राइमरी से लेकर विश्वविद्यालयों तक में स्वीकृत पदों पर भी नियुक्तियां नहीं हो पाने से अध्ययन-अध्यापन ठीक से नहीं हो पा रहा है, वहीं छात्रों की संख्या निरंतर बढती जा रही है। समितियों और अधिकारियों की शृंखला में जकड़ा हुआ शिक्षा का प्रशासनिक तंत्र नियमपूर्वक इतनी उलझनें खड़ी करता है कि शोध और अन्य संसाधनों आदि की योजनाओं की धनराशि समय से मिल ही नहीं पाती और उनका उपयोग ही नहीं हो पाता है। ऐसे में आज अधिकांश संस्थानों में शिक्षा की जगह शिक्षा के अनुष्ठान या रिचुअल ही अधिक पूरे किए जा रहे हैं। इसके परिणाम गुणवत्ता की दृष्टि से हीन कोटि के उत्पाद के रूप में दिख रहे हैं। शोध में दुहराव, साहित्यिक चोरी और पिष्ट पेशण ही अधिक हो रहा है। ज्ञान में समृद्धि की दृष्टि से हम पिछड़ते गए हैं। यह जरूर हुआ कि बिना बिचारे शिक्षा संस्थाओं की संख्या खूब बढ़ी पर अधिकांश बिना जरूरी आधार संरचना के बनाए गए। फलत: अधकचरे डिग्रीधारियों की संख्या खूब बढ़ी और उससे बेरोजगार युवाओं की संख्या बढ़ी।
अब शिक्षा एक व्यापार का रूप लेती जा रही है। सरकार द्वारा उससे अपेक्षा की जा रही है कि वह अपनी प्रामाणिकता धन उगाही की शक्ति द्वारा सिद्ध करे। सरकार विश्वविद्यालयों को कर्ज दे रही है जिसे सूद के साथ उनको चुकाना है। अब स्थितियां ऐसी हो गई है कि नर्सरी और प्राइमरी की शिक्षा दिलाना सबसे कठिन और सबसे मंहगा काम हो गया है। यह तब है जब बच्चों की शिक्षा को शुल्क मुक्त रखने का संवैधानिक प्रावधान है। इस परिदृश्य में निजी क्षेत्र के विद्यालय और विश्वविद्यालय महंगा ढांचा प्रस्तुत कर रहे हैं जो संपन्न लोगों को अवसर देते हैं पर शिक्षा के स्तर की दृष्टि से मिश्रित किस्म के हैं। कुछ अच्छे हैं तो कुछ सामान्य के आसपास हैं। उनकी स्वायत्तता की अपनी ही कहानी है जिसमें शिक्षा के प्रति व्यावसायिक दृष्टिकोण के अनिवार्य दुष्परिणाम को नकारा नहीं जा सकता। यह अवश्य है कि वे सेवामुक्त वरिष्ठ प्राध्यापकों की सेवा ले रहे हैं और जीवन्त परिवेश बनाने को उद्यत हैं। इनमें से कुछ विदेशी विश्वविद्यालयों के तर्ज पर नवाचारों पर भी ध्यान दे रहे हैं।
अब जब नई शिक्षा नीति बन रही है राज्य सरकारों और केन्द्र की सरकार को शिक्षा पर वरीयता देते हुए विचार करना आवश्यक है। आज न शिक्षा जगत की समस्याओं का ठीक से आकलन हो पा रहा है और न उनपर अपेक्षित कारवाई हो पा रही है। संस्थाओं के स्तर पर और सरकारी प्रशासनिक तंत्र भारी भरकम होकर इतनी मंथर गति से चल रहा है कि निर्णय लेने और उसके कार्यान्वयन में बड़ा अंतराल आ जाता है। पांच वर्ष बीत रहे हैं और अभी भी शिक्षा की नीति को अन्तिम रूप नहीं मिल सका है, उसके कार्यान्वयन की बात तो अभी बहुत दूर है। उसके मसौदे में दूरगामी महत्व के प्रस्ताव थे जिनका संरचना और प्रक्रिया की दृष्टि से बड़ा महत्व है। शिक्षा तंत्र की जड़ता के परिणाम न केवल संस्थाओं के के लिए बल्कि पूरे देश के लिए घातक हैं। अत: समाज के व्यापक हित को सर्वोपरि रखते हुए इस जड़ता को तोड़ने की जरूरत है। साथ ही यह विचार भी विमर्श के केन्द्र में लाना होगा कि देश की शिक्षा देश के समाज और संस्कृति के साथ कितनी जुड़ती है और हमारी विरासत संभालने और समस्याओं का समाधान करने में कितनी उपयोगी है न कि हम कितने ऐसे युवा पैदा कर रहे हैं जो विदेशों में कार्य करने योग्य हैं।
(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)


 
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