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'आजादी' के लिए हुंकार भरने की याद दिलाती अगस्त क्रांति

08/08/2019

('अंग्रेजों भारत छोड़ो' दिवस, 9 अगस्त पर विशेष)

सियाराम पांडेय 'शांत'
स्वतंत्रता आंदोलन का इतिहास संघर्षों भरा है। उसमें ढेर सारे खट्टे-मीठे अनुभव छिपे हैं। देश के लिए मर मिटने का जज्बा छिपा है। वैसे तो भारत में स्वतंत्रता का इतिहास बहुत लंबा है। लेकिन जिन्हें शिद्दत से याद किया जाता है, वे दो ही हैं। पहला 1857 का स्वतंत्रता संग्राम और दूसरा 9 अगस्त 1942 का अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन। अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन 9 अगस्त, 1942  को राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के आह्वान पर शुरू हुआ था। भारत को गुलामी की बेड़ियों से मुक्त कराने के लिए ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ बापू का यह बड़ा देशव्यापी 'नागरिक अवज्ञा आंदोलन' था। 'क्रिप्स मिशन' की असफलता के बाद ऐसा जरूरी भी था, क्योंकि द्वितीय विश्व युद्ध में अंग्रेजों ने भारतीयों का साथ तो लिया, लेकिन भारत को आजाद करने संबंधी अपने वादे से मुकर गए थे। उन्हें सबक सिखाने के लिए उन्हें सीधा जवाब देना था और 'अंग्रेजों भारत छोड़ो' से बड़ा संदेश उनके लिए दूसरा कुछ नहीं हो सकता था। भारत छोड़ो आंदोलन या अगस्त क्रान्ति, भारतीय स्वतन्त्रता आंदोलन की अन्तिम बड़ी लड़ाई थी, जिसने ब्रिटिश शासन की नींव हिलाकर रख दिया था। क्रिप्स मिशन के खाली हाथ भारत से वापस जाने पर भारतीयों को अपने साथ हुए विश्वासघात का अहसास हुआ था। द्वितीय विश्वयुद्ध के कारण अंग्रेजों के लिए परिस्थितियां विपरीत हो गई थीं। सिंगापुर, मलाया और बर्मा पर कब्जा कर जापान भारत की ओर बढ़ रहा था। युद्ध के कारण आवश्यक वस्तुओं के दाम आसमान छूने लगे थे। इससे अंग्रेज सत्ता के खिलाफ भारतीय जनमानस में असन्तोष बढ़ने लगा था। जापान के बढ़ते हुए प्रभुत्व को देखकर 5 जुलाई, 1942 को महात्मा गांधी ने हरिजन में लिखा था कि 'अंगेजों! भारत को जापान के लिए मत छोड़ो, बल्कि भारत को भारतीयों के लिए व्यवस्थित रूप से छोड़ जाओ।' उस समय द्वितीय विश्वयुद्ध चल रहा था। ब्रिटिश सेनाएं दक्षिण-पूर्व एशिया में हारने लगी थीं। ऐसा लगता था कि अब जापान भारत पर आक्रमण कर देगा। मित्र देश, अमेरिका, रूस व चीन, ब्रिटेन पर लगातार दबाव डाल रहे थे कि इस संकट की घड़ी में वह भारतीयों का समर्थन प्राप्त करने के लिए पहल करे। अपने इसी उद्देश्य को पूर्ण करने के लिए उन्होंने स्टेफोर्ड क्रिप्स को मार्च, 1942 में भारत भेजा था। ब्रिटेन सरकार भारत को पूर्ण स्वतंत्रता नहीं देना चाहती थी। वह भारत की सुरक्षा अपने हाथों में ही रखना चाहती थी। साथ ही गवर्नर-जनरल के वीटो अधिकारों को भी पहले जैसा ही रखने के पक्ष में थी। यही वजह थी कि भारतीय प्रतिनिधियों ने क्रिप्स मिशन के सारे प्रस्तावों को सिरे से खारिज कर दिया। 
 इससे पूर्व वर्धा की बैठक में 14 जुलाई, 1942 को गांधी जी ने कहा था कि मैं देश की बालू से ही कांग्रेस से भी बड़ा आंदोलन खड़ा कर दूंगा। इस बैठक में गांधीजी के इस विचार को पूर्ण समर्थन मिला कि भारत में संवैधानिक गतिरोध तभी दूर हो सकता है, जब अंग्रेज भारत से चले जायें। वर्धा में कांग्रेस कार्यसमिति ने 'अंग्रेजों भारत छोड़ो प्रस्ताव' पारित किया। आंदोलन की सार्वजनिक घोषणा से पूर्व 1 अगस्त, 1942 ई. को इलाहाबाद में 'तिलक दिवस' मनाया गया। इस अवसर पर जवाहरलाल नेहरू ने कहा कि हम आग से खेलने जा रहे हैं। हम दुधारी तलवार का प्रयोग करने जा रहे हैं, जिसकी चोट उल्टी हमारे ऊपर भी पड़ सकती है।  8 अगस्त, 1942 ई. को 'अखिल भारतीय कांग्रेस' की बैठक बम्बई के ऐतिहासिक 'ग्वालिया टैंक' में हुई। इसमें यह निर्णय लिया गया कि अंग्रेजों को हर हाल में भारत छोड़ना ही पड़ेगा। भारत अपनी सुरक्षा स्वयं ही करेगा और साम्राज्यवाद तथा फासीवाद के विरुद्ध रहेगा। यदि अंग्रेज भारत छोड़ देते हैं, तो अस्थाई सरकार बनेगी। गांधीजी के 'भारत छोड़ो प्रस्ताव' को कांग्रेस कार्यसमिति ने कुछ संशोधनों के बाद स्वीकार कर लिया। प्रस्ताव का अंतिम अंश था कि देश ने साम्राज्यवादी सरकार के विरुद्ध अपनी इच्छा जाहिर कर दी है। अब उस बिन्दु से लौटने का बिल्कुल औचित्य नहीं है। अतः समिति अहिंसक ढंग से, व्यापक धरातल पर गाधीजी के नेतृत्व में जनसंघर्ष शुरू करने का प्रस्ताव स्वीकार करती है। इस सम्मेलन में महात्मा गांधी ने देशवासियों को 'करो या मरो' का सीधा संदेश दिया था। गांधीजी ने कहा था कि देश तब तक आजाद नहीं हो सकता, जब तक कि उसमें रहने वाले लोग एक-दूसरे पर भरोसा नहीं करते। बापू के इन शब्दों ने भारत की जनता पर जादू-सा असर डाला और वे स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़े। देश के कोने-कोने में 'करो या मरो' की आवाज गूंजने लगी। 9 अगस्त को भोर में ही कांग्रेस के सभी महत्त्वपूर्ण नेता गिरफ्तार कर लिये गए। गांधीजी को पूना के 'आगा खां महल' में तथा कांग्रेस कार्यकारिणी के अन्य सदस्यों को अहमदनगर के दुर्ग में रखा गया। कांग्रेस को अवैधानिक संस्था घोषित कर ब्रिटिश सरकार ने इस संस्था की सम्पत्ति जब्त कर ली और जुलूसों को प्रतिबंधित कर दिया। सरकार के इस कृत्य से जनता में आक्रोश व्याप्त हो गया। जनता ने स्वयं अपना नेतृत्व संभाल कर जुलूस निकाला और सभाएं कीं। स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान यह पहला आंदोलन था, जो नेतृत्व विहीनता के बावजूद उत्कर्ष पर पहुंचा। सरकार ने जब आंदोलन को दबाने के लिए लाठी और बंदूक का सहारा लिया तो आंदोलन हिंसक हो गया। कई स्थानों पर रेल की पटरियां उखाड़ी गईं और स्टेशनों में आग लगा दी गई। बम्बई, अहमदाबाद एवं जमशेदपुर में मजदूरों ने संयुक्त रूप से विशाल हड़ताल की। संयुक्त प्रांत में बलिया एवं बस्ती, बम्बई में सतारा, बंगाल में मिदनापुर एवं बिहार के कुछ भागों में 'भारत छोड़ो आंदोलन' के समय अस्थाई सरकारों की स्थापना की गई। इन स्वशासित समानान्तर सरकारों में सर्वाधिक लम्बे समय तक सरकार सतारा तक थी। यहां पर विद्रोह का नेतृत्व नाना पाटिल ने किया था। सतारा के महत्त्वपूर्ण नेता वाई.बी. चव्हाण थे। पहली समानांतर सरकार उत्तर प्रदेश के बलिया में चितू पाण्डेय के नेतृत्व में बनी। बंगाल के मिदनापुर जिले में तामलुक अथवा ताम्रलिप्ति में गठित राष्ट्रीय सरकार 1944 ई. तक चलती रही। यहां की सरकार को जातीय सरकार के नाम से जाना जाता है। सतीश सावंत के नेतृत्व में गठित इस जातीय सरकार ने स्कूलों को अनुदान दिये और 'सशस्त्र विद्युत वाहिनी सैन्य संगठन' बनाया। इस आंदोलन से सर्वाधिक प्रभावित क्षेत्र थे- बंगाल, बिहार, उत्तर प्रदेश, मद्रास एवं बम्बई। जयप्रकाश नारायण, राममनोहर लोहिया एवं अरुणा आसफ अली जैसे नेताओं ने भूमिगत रहकर इस आंदोलन को नेतृत्व प्रदान किया। बम्बई में उषा मेहता एवं उनके कुछ साथियों ने कई महीने तक कांग्रेस रेडियो का प्रसारण किया। राममनोहर लोहिया नियमित रूप से रेडियो पर बोलते थे। नवम्बर 1942 ई. में पुलिस ने इसे खोज निकाला और जब्त कर लिया।
'भारत छोड़ो आंदोलन' में भारत का हर जाति वर्ग का व्यक्ति शामिल था। ब्रिटिश सरकार ने 13 फरवरी, 1943 ई. को 'भारत छोड़ो आंदोलन' के समय हुए विद्रोहों का पूरा दोष गांधीजी एवं कांग्रेस पर थोप दिया। अंग्रेजी सत्ता के दमन के सभी उपाय नाकाफी साबित होने लगे थे। सरकारी आंकड़ों के अनुसार इस जनांदोलन में 940 लोग मारे गए, 1630 घायल हुए, 18000 डीआईआर में नजरबंद हुए तथा 60,229 लोग गिरफ्तार किए गए थे। वाराणसी में डॉ. संपूर्णानंद, त्रिभुवन सिंह, रघुनाथ सिंह और कमलापति त्रिपाठी भूमिगत होकर आंदोलन की रणनीति बनाने में जुट गए। इन नेताओं द्वारा हर बड़े मोहल्ले में एक-एक डिक्टेटर नियुक्त किया गया था। करीब सप्ताहभर तक इन नेताओं ने पुलिस को छकाया। तब तक भारत छोड़ो आंदोलन की मुहिम वाराणसी समेत पूरे पूर्वांचल में पहुंच चुकी थी। उन दिनों काशी हिंदू विश्वविद्यालय देश में छात्र राजनीति का बड़ा केंद्र था। राजनारायण, प्रभुनारायण सिंह जैसे छात्र नेता बीएचयू की अगुवाई करते थे। भारत छोड़ो आंदोलन की भावना को ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाने के लिए छात्रों की टोलियां शहर के अलावा आसपास के जिलों में भी सक्रिय हो गई। अन्य कॉलेज के छात्रों से संपर्क कर आंदोलन को धार दी जाने लगी थी। 
हालांकि बाद में राजनारायण और प्रभुनारायण समेत कई छात्रनेता गिरफ्तार कर लिए गए थे। लाल बहादुर शास्त्री और पं. कमलापति त्रिपाठी को इलाहाबाद से गिरफ्तार कर लिया गया था। महात्मा गांधी की गिरफ्तारी के बाद 10 अगस्त को बीएचयू से दशाश्वमेध तक जुलूस निकाला गया। जुलूस बढ़ता गया और कारवां जुड़ता गया। 11 अगस्त को ऐसा ही जुलूस कचहरी तक गया। 12 अगस्त को काशी विद्यापीठ को डकैतों का अड्डा बताकर बंद कर दिया गया। 13 को बीएचयू बंद हुआ। 14 और 15 अगस्त को पूरे पूर्वांचल में जगह-जगह जुलूस निकाले गए। रेल की पटरियां उखाड़ दी गई। इस लड़ाई में राजनारायण, राम मनोहर लोहिया, रुस्तम सैटिन, वीरेश्वर मुखर्जी आदि ने भाग लिया था। आज अगर यह देश आजाद है तो इसके पीछे अगस्त क्रांति का बड़ा योगदान है। 
(लेखक हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।) 


 
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