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कुपोषण व रोगों से बचाएगा रंगीन गेहूं

29/06/2019

दधिबल यादव 
जीवन में रंगों का कितना महत्व है, वैदिक काल से ही इस पर शोध होते रहे हैं। इन शोधों से साबित हो चुका है कि हर रंग का अपना महत्व होता है, जिसका असर हमारे जीवन से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर दिखाई देता है। इन रंगों का प्रभाव सेहत पर भी पड़ता है। देश में कृषि क्षेत्र में भी करीब नौ साल के शोध के बाद कृषि जैव प्रौद्योगिकीविदों ने अब रंगीन गेहूं की कुछ किस्में विकसित करने में सफलता हासिल की हैं, जिनमें मौजूद पोषक तत्व आपकी सेहत के लिए सामान्य गेहूं की तुलना में ज्यादा फायदेमंद हैं। 
दरअसल, गेहूं का सेवन तो विभिन्न रूपों में हम सभी करते ही हैं। यह हमारे शरीर को ऊर्जा देता है और अच्छी सेहत के लिए जरूरी भी है। यह भारतीय भोजन का एक महत्वपूर्ण अंग है। गेहूं से तरह-तरह के उत्पाद भी बनते हैं, जिन्हें हम अपने भोजन में शामिल करते हैं। लेकिन गेहूं के सेवन से कई तरह की बीमारियों को भी दूर भगाया जा सकता है, क्या आपने कभी ऐसा सोचा है? गेहूं का रंग हमेशा एक ही तरह का रहा है और कई बार किसी व्यक्ति के रंग-रूप के लिए गेहुंआ रंग की उपमा दी जाती है। लेकिन इससे हटकर अब गेहूं अलग-अलग रंगों में पैदा होगा। आपकी थाली में परोसी जाने वाली रोटी भी रंगीन होगी। अगर आप बाजार में सामान्य रंग के गेहूं से हटकर अलग रंग का गेहूं देखें तो चौंकियेगा मत। उसका रंग तो अलग होगा ही, उसकी कीमत भी अधिक हो सकती है। लेकिन उस गेहूं के गुण भी सामान्य गेहूं के गुण से अधिक हो सकते हैं। 
लगातार नौ साल के अनुसंधान के बाद हमारे वैज्ञानिक इस तरह के रंगीन गेहूं ईजाद करने में सफलता पा चुके हैं और अब धीरे-धीरे विभिन्न प्रदेशों में इसकी पैदावार बढ़ने लगी है। यह रंगीन गेहूं एक उन्नत किस्म का गेहूं है। इसमें पौष्टिक तत्वों की मात्रा सामान्य गेहूं की अपेक्षा अधिक है। अब वह दिन दूर नहीं जब बाजार में भी यह रंगीन गेहूं बिकने लगेगा और सामान्य लोग भी इसका सेवन कर सकेंगे। पंजाब के मोहाली में राष्ट्रीय कृषि-खाद्य जैव प्रौद्योगिकी संस्थान (एनएबीआई) के वैज्ञानिकों का दावा है कि रंगीन गेहूं में एंथोक्यानिन की जरूरी मात्रा आपको मिल सकती है। यह एक ऐसा तत्व है जिस में भरपूर मात्रा में एंटीऑक्सिडेंट होता है और यह रोगों से लड़ने में आपके शरीर की प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है तथा हृदय रोगों, मधुमेह और मोटापे जैसी जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों से भी निपटने में मददगार है।
रंगीन गेहूं परियोजना की प्रमुख वैज्ञानिक डॉ. मोनिका गर्ग के अनुसार एनएबीआई के एक अध्ययन में पता चला है कि काला गेहूं शरीर में वसा जमाव को रोकने में मदद कर सकता है। ग्लूकोज के स्तर को नियंत्रित कर सकता है। इंसुलिन सहिष्णुता और निम्न रक्त कोलेस्ट्रॉल में सुधार कर सकता है। इसमें एंथोक्यानिन होने के साथ ही प्रोटीन और जिंक भी काफी अधिक स्तर पर होता है। यह कुपोषित बच्चों और माताओं के लिए ज्यादा उपयोगी साबित होगा। इस गेहूं का उपयोग कैंसर रोगियों के लिए सकारात्मक खुराक के रूप में सफल पाया गया है। भोजन के तौर पर यह बेहतर विकल्प के रूप में सामने आया है। डायबिटीज रोगियों में काले गेहूं के उपयोग से सकारात्मक परिणाम सामने आये हैं। साथ ही हृदय रोगियों पर किये शोध में भी काले गेहूं का सार्थक परिणाम मिला है। एनएबीआई, मोहाली ने काले रंग के गेहूं को "नाबी एमजी" के नाम से पेटेंट करा लिया है।
मोहाली में एनएबीआई के कृषि जैव प्रौद्योगिकीविदों ने न केवल बैंगनी, काले और नीले रंगों वाले गेहूं की किस्में विकसित की हैं बल्कि विभिन्न कंपनियों को यह प्रौद्योगिकी दी भी है। फिलहाल यह खेती पंजाब के पटियाला, जालंधर से लेकर के मध्य प्रदेश के विदिशा तक में कुल तकरीबन 700 एकड़ में हो रही है। एनएबीआई ने जापान से जानकारी मिलने के बाद 2011 से इसपर कार्य शुरू किया था। कई सीजन तक प्रयोग करने के बाद इसमें सफलता मिली है। रंगीन गेहूं को फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड ऑफ इंडिया (एफएसएसएआई) ने भी अपनी स्वीकृति दे दी है। इसमें सबसे बेहतर काले रंग के गेहूं को बताया गया है, जो शुगर की मात्रा को शरीर में नियंत्रित रखता है। काले गेहूं में एंथोसाइनिन नामक पिग्मेंट आम गेहूं से काफी ज्यादा होता है। आम गेहूं में जहां एंथोक्यानिन की मात्रा 5 से 15 पास प्रति मिलियन (पीपीएम) होती है, वहीं काले गेहूं में 140 पीपीएम पाई जाती है। यह शरीर से फ्री रेडिकल्स निकालकर हार्ट, कैंसर, डायबिटीज, मोटापा और अन्य बीमारियों की रोकथाम करता है। इसमें जिंक की मात्रा भी अधिक है। इसके बाद नीले रंग का गेहूं और फिर बैगनी रंग के गेहूं का नंबर आता है। नीले रंग के गेहूं में 80 और बैंगनी में 40 पीपीएम तक की मात्रा होती है। इस गेहूं की पैदावार सामान्य गेहूं की तुलना में काफी कम होती है।
हालांकि जहां सामान्य गेहूं 24 क्विंटल प्रति एकड़ की दर से पैदा होता है, वही रंगीन गेहूं 17 से 20 क्विंटल प्रति एकड़ की दर से पैदा होता है। इस वजह से बाजार में रंगीन गेहूं की कीमत ज्यादा होती है। एनएबीआई ने इसका उत्पादन गर्मी और सर्दी दोनों मौसम में किया है। सर्दी में यह फसल पंजाब के मोहाली के खेतों में उगाई गई, जबकि गर्मी में हिमाचल और केलोंग लाहौल स्पीति में। परियोजना प्रमुख डॉ. मोनिका गर्ग के अनुसार किसानों को आम गेहूं मंडियों में बेचने पर न्यूनतम समर्थन मूल्य करीब 1625 रुपये प्रति क्विंटल मिलता है जबकि रंगीन गेहूं का रेट 3250 रुपए दिया गया है।
रंगीन गेहूं पंजाब से लेकर मध्य प्रदेश तक करीब 700 एकड़ क्षेत्रफल में उगाया गया है। पहले साल इनकी खेती सिर्फ 80 एकड़ भू भाग पर मध्य प्रदेश में की गई, जहां अब यह रकबा बढ़कर 280 एकड़ हो गया है। फिलहाल पंजाब में 210 एकड़, उत्तर प्रदेश में 150 एकड़, हरियाणा में 65 एकड़, बिहार में 10 एकड़ तक उगाया जा रहा है। इसकी खेती के लिए इंडियन काउंसिल ऑफ एग्रीकल्चर रिसर्च (आईसीएआर) द्वारा परीक्षण किया जा रहा है ताकि इससे होने वाले और भी फायदों को लोगों तक पहुंचाया जा सके। साथ ही अगर इससे किसी भी तरह का नुकसान हो तो उसका भी पता लगाया जा सके। इसके बाद देशभर में इसकी खेती शुरू हो सकती है। उम्मीद की जानी चाहिए कि वह दिन दूर नहीं, जब देश के किसान सेहत के लिए ज्यादा फायदेमंद रंगीन गेहूं की खेती करने लगें और लोगों के लिए स्वास्थ्यवर्धक यह रंगीन गेहूं बाजार में अपनी अच्छी खासी जगह बना ले।
(लेखक हिन्दुस्थान समाचार से जुड़े हैं।)


 
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