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वैदिक और पौराणिक कालीन बकुलाही नदी वरदान के साथ अभिशाप भी

18/06/2019

-रजनीश पाण्डेय 

रायबरेली, 18 जून (हि.स.)। नदियां हमारे जीवन की धारा है, न केवल यह जीवन दायिनी है बल्कि हमारी सांस्कृतिक औऱ आध्यात्मिक चेतना का स्रोत भी है। समय के साथ-साथ यह हमारे लिए गौड़ होती गई लेकिन भारतीय समाज के चिंतन में इनका महत्व हमेशा रहा है। आज विभिन्न पर्यावरणीय समस्याओं के कारण भी ये हमारे लिए पहले से ज्यादा प्रांसगिक हुई है। 

भारत में बहने वाली हजारों प्राचीन नदियों में रायबरेली से निकलने वाली बकुलाही नदी को भी समय के साथ हमने भुला दिया जिससे कई दुष्परिणाम भी देखने पड़े और लोगों ने इसे अपने लिए अभिशाप मानना शुरू कर दिया। हिन्दुस्थान समाचार ने इस अति प्राचीन और पौराणिक नदी के विभिन्न पहलुओं और को बारीकी से खंगाला। अति प्राचीन नदी बकुलाही नदी की प्राचीनता इस बात से आंकी जा सकती है कि इसका वर्णन वेदों में भी मिलता है। वेदों में इसे बालकुनी कहा गया है जो अवधी भाषा के कारण बाद में  संभवतः अपभ्रंश होकर बकुलाही हो गया। पुराणों और महाभारत में भी स्पष्ट तौर पर इस नदी का उल्लेख है। महर्षि वाल्मीकि रचित वाल्मीकि रामायण में भी भरत और हनुमान के संवाद में इस नदी का उल्लेख मिलता है। राजा भरत द्वारा हनुमान से यह पूछने पर कि उन्होंने क्या-क्या देखा तो हनुमान जी कहते हैं-'सो अपश्यत राम, तीर्थम च नदी बालकुनी तथा बरुठी, गोमती चैव भीमशालं' वनम तथा।' इसके अलावा कई धार्मिक ग्रंथों में भी इस अति प्राचीन नदी का उल्लेख मिलता है। 

धार्मिक और पौराणिक महत्व 
बकुलाही नदी का धार्मिक और पौराणिक महत्व रहा है। भगवान परशुराम के कर्मस्थलों से जहां यह गुजरती है वहीं इसी के तट पर प्रसिद्ध भयहरणनाथ धाम भी है जिसकी स्थापना भीम द्वारा की गई थी। भगवान शिव के धाम और नदी की महिमा का उल्लेख महाभारतकालीन कई ग्रंथों में मिलता है। इसके आलावा इस नदी के कई तटों पर प्राचीन मंदिर इसकी प्राचीनता और अध्यात्मिक महत्व को इंगित करते हैं। 

उदगम और प्रवाह
रायबरेली के सलोन तहसील में भरतपुर झील से निकली यह नदी सई की मुख्य सहायक नदी है।क़रीब 174 किमी लंबी यह रायबरेली और प्रतापगढ़ जनपदों के बीच बहती है। यह प्रतापगढ़ में ही खजुरनी गांव में सई में मिल जाती है। एक जीवन धारा को कैसे लोग अपने लिए अभिशाप मानने लगते हैं इसका उदाहरण बकुलाही नदी से मिलता है। लोगों ने स्वयं इस जीवनदायिनी को अपने लिए अभिशाप बना लिया क्योंकि जगह-जगह इसकी धारा को रोककर निर्माण कर लिए गए। उथले स्थानों पर बराबर कर खेती होने लगी। इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि यह अपनी मुख्य धारा से कटकर समस्या का कारण बन गई। बरसात के दिनों में हजारों हेक्टेयर फसल बर्बाद हो जाती है और सीपेज के कारण भूमि परती पड़ी रहती है।प्र तापगढ़ जिले में तो इस नदी का रास्ता ही बदल दिया गया और लोगों ने इसे काटकर छोटी  कर दिया।

कैसे अभिशाप से बनी वरदान
बकुलाही को अभिशाप मानने वालों को लिए यह अब वरदान भी है, हालांकि यह वरदान अभी तक कुछ ही क्षेत्रों तक सीमित है। इस प्रयास ने एक दिशा जरूर दी है और यह प्रयास कर दिखाया नदियों और प्राचीन जलाशयों के पुनरोद्धार में लगे प्रसिद्ध समाजसेवी समाज शेखर ने।करीब 21 किमी. विलुप्त हो चुकी इस नदी को उसके पुराने स्वरूप में शेखर ने समाज और सरकार के सहयोग से वापस कराया। नतीजा यह हुआ कि करीब 40 गांवों के लोग आज इस नदी को अपने लिये वरदान मान रहे हैं। 

फ़िर बन सकती है यह जीवनदायिनी
अभिशाप मान रहे लोगों के लिए यह प्राचीन नदी बकुलाही अभी भी कैसे जीवनदायिनी बन सकती है। इस संबंध में समाजसेवी समाज शेखर ने हिन्दुस्थान समाचार से कहा कि यदि समाज इसे अपनी नदी मान ले और इसके लिए प्रयास करे तो समस्या सुलझ सकती है। शेखर कहते हैं कि नदियों को स्वाभाविक प्रवाह की जरूरत होती है और हम अपने स्वार्थ में इसका अतिक्रमण करते रहते हैं जिसका दुष्प्रभाव हमारे ही जीवन में पड़ता है। बकुलाही नदी के विभिन्न तकनीकी और सामाजिक पहलुओं का अध्ययन कर रहे समाज शेखर ने कहा कि यह नदी रायबरेली और प्रतापगढ़ के लिए वरदान है, बस इसे समझने की जरूरत है। गांव के लोगों ने इसे साबित भी किया है। शेखर के अनुसार वह पूरी बकुलाही नदी के पुनरोद्धार की कार्ययोजना पर काम कर रहे हैं जिस पर जल्द ही अमल करने की प्रक्रिया शुरू हो जाएगी। अगर हम सब नदियों को भारतीय चिंतन की दृष्टि से देखें तो यह हमारे लिए केवल जीवनदायिनी ही है, जरूरत है केवल इसके अभिशाप से बचने की क्योंकि इस सबके आखिरकार जिम्मेदार हम ही हैं।

हिन्दुस्थान समाचार

     


 
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