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केन-बेतवा नदी जोड़ो परियोजना पर गहराया विवाद?

12/05/2020

प्रमोद भार्गव
कृत्रिम रूप से जीवनदायी नर्मदा और मोक्षदायिनी क्षिप्रा नदियों को जोड़ने के बाद केन और बेतवा नदियों को जोड़ने की मुहिम में पिछली शिवराज सिंह चैहान सरकार ने तेजी दिखाई थी। किंतु अब इन नदियों के जल-बंटवारे को लेकर मध्य-प्रदेश और उत्तर-प्रदेश के बीच विवाद गहराता दिख रहा है। जल संसाधन विभाग की समीक्षा बैठक के दौरान मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि प्रस्तावित केन-बेतवा परियोजना में मध्य-प्रदेश के ज्यादा गांव और हजारों हेक्टेयर जंगल व कृषि योग्य भूमि डूबेंगे इसीलिए उत्तर-प्रदेश सरकार की अधिक मात्रा में जल की मांग व्यावहारिक नहीं है। यह मांग तब की जा रही है, जब दोनों राज्यों के बीच एमओयू की सभी शर्तें तय हो चुकी हैं। लेकिन अब उप्र रबी फसल के सीजन में 900 मिलियन क्यूबिक मीटर पानी की मांग कर रहा है, जबकि शर्त के मुताबिक 700 मिलियन क्यूबिक मीटर पानी देने का निर्णय हुआ था। यह पानी भी तब दिया जाना तय हुआ है, जब मप्र अपने हिस्से के पानी का उपयोग कर चुका होगा। हालांकि विवाद के बावजूद 5500 अरब रुपए की इस परियोजना को पूरी कर लेने की उम्मीद चौहान ने जताई है। यदि ये नदियां सफलतापूर्वक जुड़ जाती हैं तो भविष्य में 30 अन्य नदियों के जुड़ने की मुहिम शुरू हो सकती है।
फिलहाल यह परियोजना जल-बंटवारे के अलावा अनेक आशंकाओं से घिरी दिख रही है। परियोजना में वन्य जीव समिति बड़ी बाधा के रूप में पेश तो आएगी ही, नहरों एवं बांधों के लिए जिस उपजाऊ भूमि का अधिग्रहण किया जाएगा, वह जलभराव क्षेत्र में आ जाने के कारण नष्ट हो जाएगी। इस भूमि पर फिलहाल जौ, बाजरा, दलहन, तिलहन, गेहूं, मूंगफली, चना जैसी फसलें पैदा होती हैं। इन फसलों में ज्यादा पानी की जरूरत नहीं पड़ती है। जबकि ये नदियां जुड़ती हैं, तो इस पूरे इलाके में धान और गन्ने की फसलें पैदा करने की उम्मीद जताई जा रही है। इन दोनों ही फसलों में पानी अत्याधिक लगता है। पूरे बुंदेलखंड क्षेत्र में 4000 से भी ज्यादा तालाब हैं, यदि इन सभी तालाबों को संवार लिया जाए तो नदियों को जोड़ने की जरूरत रह ही नहीं जाएगी, कई हजार करोड़ रुपए परियोजना पर खर्च होने से बच जाएंगे। परियोजना पूरा करने का समय 9 साल बताया जा रहा है लेकिन हमारे यहां भूमि अधिग्रहण और वन भूमि की स्वीकृति में जो अड़चनें आती हैं, उनके चलते परियोजना 20-25 साल में भी पूरी हो जाए तो मुश्किल है?
दोनों प्रदेशों की सरकारें दावा कर रही हैं कि यदि ये नदियां परस्पर जुड़ जाती हैं तो मध्य-प्रदेश और उत्तर-प्रदेश के सूखाग्रस्त बुंदेलखण्ड क्षेत्र में रहने वाली 70 लाख आबादी खुशहाल हो जाएगी। यही नहीं नदियों को जोड़ने का यह महाप्रयोग सफल हो जाता है तो अन्य 30 नदियों को जोड़ने का सिलसिला शुरू हो सकता है। इस परियोजना के तहत उत्तर-प्रदेश के हिस्से में आने वाली पर्यावरण संबंधी बाधाओं को दूर कर लिया गया है। मध्य-प्रदेश में जरूर अभी भी पन्ना राष्ट्रीय उद्यान बाधा बना हुआ है और जरूरी नहीं कि जल्दी यहां से मंजूरी मिल जाए? वन्य जीव समिति परियोजना को इसलिए मंजूरी नहीं दे रही है, क्योंकि पन्ना राष्ट्रीय उद्यान बाघों के प्रजनन, आहार एवं आवास का अहम् वन क्षेत्र है। इसमें करीब 28 बाघ बताए जाते हैं। अन्य प्रजातियों के प्राणी भी बड़ी संख्या में हैं। हालांकि मध्य प्रदेश और केंद्र में एक ही दल भाजपा की सरकारें हैं, लिहाजा उम्मीद की जा सकती है कि बाधाएं जल्दी दूर हो जाएं।
केन नदी जबलपुर के पास कैमूर की पहाड़ियों से निकलकर 427 किमी उत्तर की और बहने के बाद बांदा जिले में यमुना नदी में जाकर गिरती है। वहीं बेतवा नदी मध्य-प्रदेश के रायसेन जिले से निकलकर 576 किमी बहने के बाद उत्तर-प्रदेश के हमीरपुर में यमुना में मिलती है। केन-बेतवा नदी जोड़ो योजना की राष्ट्रीय जल विकास प्राधिकरण; एनडब्ल्यूडीएद्ध की रिपोर्ट के अनुसार डोढ़न गांव के निकट 9000 हेक्टेयर क्षेत्र में एक बांध बनाया जाएगा। इसके डूब क्षेत्र में छतरपुर जिले के बारह गांव आएंगे। इनमें पांच गांव आंशिक रूप से और सात गांव पूर्ण रूप से डूब में आएंगे। कुल 7000 लोग प्रभावित होंगे इन्हें विस्थापित करने में इसलिए समस्या नहीं आएगी, क्योंकि ये ग्राम जिन क्षेत्रों में आबाद हैं, वह पहले से ही वन-सरंक्षण अधिनियम के तहत अधिसूचित हैं। इस कारण रहवासियों को भूमि-स्वामी होने के बावजूद जमीन पर खेती से लेकर खरीद-बिक्री में परेशानियों का सामना करना पड़ता है। इसलिए ग्रामीण यह इलाका मुआवजा लेकर आसानी से छोड़ने को तैयार हैं। ऐसा दावा प्राधिकरण की रिपोर्ट में किया गया है। जबकि सच्चाई यह है कि इन ग्रामों में कमजोर आय वर्ग और अनुसूचित व अनुसूचित जनजाति के लोग रहते हैं। इन लाचारों को समर्थों की अपेक्षा विस्थापित करना आसान होता है।
परियोजना के बहुआयामी होने के दावे किए जा रहे हैं। बांध के नीचे दो जल-विद्युत संयंत्र लगाए जाएंगे। 231 किलोमीटर लंबी नहरों का जाल बिछाया जाएगा। ये नहरें छतरपुर, टीकमगढ़ और उत्तरप्रदेश के महोबा एवं झांसी जिले से गुजरेंगी। जिनसे 60,000 हेक्टेयर कृषि भूमि की सिंचाई होगी। विस्थापन और पुनर्वास के लिए 213.11 करोड़ रुपए की आर्थिक मदद की जरूरत पड़ेेगी, जिसके मिलने की उम्मीद केंद्र सरकार से की जा रही है। चुनांचे हम जानते हैं कि धन भले ही कोई सरकार दे, विस्थापितों का पुनर्वास और मुआवजा किसी भी परियोजना में संतोषजनक नहीं रहा। नर्मदा बांध की डूब में आने वाले हरसूद के लोग आज भी मुआवजे और उचित पुनर्वास के लिए भटक रहे हैं। कमोबेश यही अन्याय मध्य-प्रदेश के ही कूनो-पालपुर अभ्यारण्य के विस्थापितों का है।
डीपीआर के मुताबिक उत्तर-प्रदेश को केन नदी का अतिरिक्त पानी देने के बाद मध्य-प्रदेश करीब इतना ही पानी बेतवा की ऊपरी धारा से निकाल लेगा। परियोजना के दूसरे चरण में मध्य-प्रदेश चार बांध बनाकर रायसेन और विदिशा जिलों में नहरें बिछाकर सिंचाई के इंतजाम करेगा। ऐसा कहा जा रहा है कि इन प्रबंधनों से केन में अक्सर आने वाली बाढ़ से बर्बाद होने वाला पानी बेतवा में पहुंचकर हजारों एकड़ खेतों में फसलों को लहलहाएगा। मध्य-प्रदेश का यही वह मालवा क्षेत्र है, जहां की मिट्टी उपजाऊ होने के कारण सोना उगलती है। इस क्षेत्र में सिंचाई के लिए पर्याप्त पानी उपलब्ध हो जाता है तो इसमें कोई दो राय नहीं कि खेत साल में 2 से लेकर 3 फसलें तक देने लग जाएंगे लेकिन मालवा की जो बहुफसली भूमि, बांध और नहरों के निर्माण में नष्ट होगी, उससे होने वाले नुकसान का आकलन प्राधिकरण के पास नहीं है।
देश की विभिन्न नदियों को जोड़ने का सपना स्वतंत्रता प्राप्ति के तुरंत बाद देखा गया था। इसे डाॅ. मोक्षगुडंम विश्वेश्वरैया, डाॅ. राममनोहर लोहिया और डाॅ एपीजे अब्दुल कलाम जैसी हस्तियों का समर्थन मिलता रहा है। हालांकि परतंत्र भारत में नदियों को जोड़ने की पहली पहल ऑर्थर काॅटन ने बीसवीं शताब्दी के पहले दशक में की थी। लेकिन इस माध्यम से फिरंगी हुकूमत का मकसद देश में गुलामी के शिकंजे को और मजबूत करने के साथ, बहुमूल्य प्राकृतिक संपदा का दोहन था। क्योंकि उस समय भारत में सड़कों और रेल-मार्गों की संरचना पहले चरण में थी, इसलिए अंग्रेज नदियों को जोड़कर जल-मार्ग विकसित करना चाहते थे। हालांकि आजादी के बाद 1971-72 में तत्कालीन केंद्रीय जल एवं ऊर्जा मंत्री तथा अभियंता डाॅ. कनूरी लक्ष्मण राव ने गंगा-कावेरी को जोड़ने का प्रस्ताव भी बनाया था। राव खुद जवाहरलाल नेहरु, लालबहादुर शास्त्री और इंदिरा गांधी की सरकारों में जल संसाधन मंत्री भी रहे थे। लेकिन जिन सरकारों में राव मंत्री रहे, उन सरकारों ने इस महत्वाकांक्षी प्रस्ताव को कभी गंभीरता से नहीं लिया क्योंकि ये प्रधानमंत्री जानते थे कि नदियों को जोड़ना आसान तो है ही नहीं, यदि ये परियोजनाएं अमल में लाई जाती हैं, तो नदियों की अविरलता खत्म होने की आशंका भी इन दूरदृष्टाओं को थी।
करीब 13500 किमी लंबी ये नदियां भारत के संपूर्ण मैदानी क्षेत्रों में अठखेलियां करती हुईं मनुष्य और जीव-जगत के लिए प्रकृति का अनूठा और बहूमूल्य वरदान बनी हुई हैं। 2528 लाख हेक्टेयर भू-खण्डों और वन प्रांतरों में प्रवाहित इन नदियों में प्रति व्यक्ति 690 घनमीटर जल है। कृषि योग्य कुल 1411 लाख हेक्टेयर भूमि में से 546 लाख हेक्टेयर भूमि इन्हीं नदियों की बदौलत प्रति वर्ष सिंचित की जाकर फसलों को लहलहाती हैं। यदि नदियां जोड़ो अभियान के तहत केन-बेतवा जुड़ जाती हैं तो इनकी अविरल बहने वाली धाराएं टूट सकती हैं। उत्तराखण्ड में गंगा नदी पर टिहरी बांध बनने के बाद एक तरफ तो गंगा की अविरलता प्रभावित हुई है, वहीं दूसरी तरफ पूरे उत्तराखण्ड में बादल फटने और भूस्खलन की आपदाएं बढ़ गई हैं। गोया, नदियों को जोड़ने से पहले टिहरी बांध के गंगा पर पड़ रहे प्रभाव और उत्तराखण्ड में बढ़ रही प्राकृतिक आपदाओं का भी आकलन करना जरूरी है? इससे अच्छा है बुंदेलखण्ड में जो 4000 तालाब हैं, उन्हें और उनमें मिलने वाली जलधाराओं को संवारा जाए? इस काम में धन भी कम खर्च होगा और एक-एक कर तालाबों को संवारने में समय भी कम लगेगा। इनके संवरते ही पेयजल व सिंचाई की सुविधाएं भी तत्काल बुंदेलखण्डवासियों को मिलने लग जाएंगी क्योंकि ज्यादातर तालाब नहरों से पहले से ही जुड़े हुए हैं।
(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)


 
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